Homeरिपोर्टअंतरराष्ट्रीय1 करोड़ के पार ना हो आबादी… स्विटजरलैंड में 'जनसंख्या कैपिंग' पर होने जा...

1 करोड़ के पार ना हो आबादी… स्विटजरलैंड में ‘जनसंख्या कैपिंग’ पर होने जा रहा जनमत संग्रह, जानें- किस संकट से जूझ रहा यूरोपीय देश

14 जून को स्विट्जरलैंड के वोटर एक अहम राजनीतिक और आर्थिक सवाल का जवाब देंगे। वे तय करेंगे कि देश की आबादी 2025 तक के लिए 10 मिलियन यानी 1 करोड़ तक सीमित किया जाए या नहीं।

खूबसूरत घड़ियों के लिए दुनियाभर में मशहूर स्विट्जरलैंड 14 जून को एक जनमत संग्रह करने जा रहा है। इसमें स्विस मतदाता ये तय करेंगे कि देश की आबादी को 2050 तक 10 मिलियन यानी 1 करोड़ तक सीमित रखना है या नहीं। इस प्रस्ताव को परंपरावादी स्विस पीपुल्स पार्टी का समर्थन मिला हुआ है।

देश में प्रवासियों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या वृद्धि को लेकर चिंता जताई जा रही है। अगर जनमत संग्रह जनसंख्या कैपिंग के पक्ष में आता है, तो स्विटजरलैंड दुनिया का पहला देश होगा, जो जनसंख्या कंट्रोल के लिए ऐसी कैपिंग लगाएगा। हालाँकि इसे पास होने के लिए ‘डबल बहुमत’ की जरूरत है, यानी राष्ट्रीय स्तर पर वोटों का पूर्ण बहुमत और देश के 26 कैंटन (राज्यों) में से ज्यादातर का समर्थन। शुरुआती ओपिनियन पोल से पता चलता है कि ‘हाँ’ और ‘ना’ में करीब का टक्कर है।

स्विटजरलैंड की जनसंख्या करीब 91 लाख है। जनमंत संग्रह में प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद देश की जनसंख्या 95 लाख से ऊपर जाते ही सरकार इसे रोकने के लिए अहम कदम उठाएगी। सरकार शरणार्थियों और प्रवासियों के प्रवेश पर रोक लगा सकती है। जनसंख्या को बढ़ावा देने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर पुनर्विचार कर सकती है, जिसमें यूरोपीय यूनियन के साथ लोगों की बेरोकटोक आवाजाही की गारंटी देने वाला अहम समझौता भी शामिल है।

संघीय परिषद जनसंख्या कैपिंग के विरोध में हैं

देश के संघीय परिषद ने चेतावनी दी है कि यह प्रस्ताव स्विटरलैंड की आर्थिक समृद्धि को नुकसान पहुँचाएगा। इससे लेबर मार्केट के खुलेपन और यूरोपीय संघ के साथ संबंधों पर असर पड़ेगा, जिससे लंबी अवधि की विकास दर को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। हालाँकि देश फिलहाल मैक्रो-इकोनॉमिक रूप से मजबूत स्थिति में है। यहाँ विकास दर स्थिर है, महँगाई कम है और वैश्विक घटनाक्रम का निकट भविष्य में सीमित असर पड़ने की संभावना है। लोगों का जीवन स्तर दुनिया में सबसे अच्छा है।

लेकिन, सबसे अहम है स्विस लेबर मार्केट के खुलेपन पर रोक, जिसने हाल के दशकों में देश की आर्थिक ग्रोथ को आगे बढ़ाया है। 2022 से EU और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के सदस्य होने के नाते स्विटरलैंड में इन संगठनों के देशों के नागरिकों को स्विट्जरलैंड में रहने और काम करने का अधिकार है।

फेडरल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस के अनुसार, 2002 और 2024 के बीच लोगों की बेरोकटोक आवाजाही की वजह से स्विट्जरलैंड में प्रति व्यक्ति आय में करीब 24% की बढ़ोतरी हुई, इसलिए इमिग्रेशन ने स्विट्जरलैंड को एक छोटी खुली अर्थव्यवस्था में स्किल की कमी को दूर करने और प्रोडक्टिविटी को सपोर्ट करने की फ्लेक्सिबिलिटी दी है, जो हाई वैल्यू-एडेड इंडस्ट्रीज पर निर्भर है।

राजधानी ज्यूरिख के पास रुशलिकॉन में ‘बेल्वोइर’ और थैलविल में ‘सेडार्टिस’ जैसे लग्जरी होटलों के CEO मार्टिन वॉन मूस ने कहा, “एक स्विस नागरिक के तौर पर, मुझे हमारे देश के भविष्य और उसकी समृद्धि की बहुत चिंता है।”

उन्होंने कहा, “अगर हमारे सभी विदेशी कर्मचारी चले गए, तो होटल चल ही नहीं पाएगा।” उन्होंने बताया कि उनके 115 कर्मचारियों में से लगभग आधे स्विट्जरलैंड के बाहर से हैं।”

यही वजह है कि स्विस नियोक्ता संघ ने कहा है कि देश का भविष्य प्रवासी मजदूरों पर निर्भर रहेगा। संगठन ने चेतावनी दी है कि मजदूरों की कमी की वजह से कंपनियाँ दूसरे देश में शिफ्ट हो सकती हैं। सबसे अहम बात यह है कि यह ‘बूढ़ों का देश’ बनता जा रहा है।

स्विस सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, 2055 तक स्विट्जरलैंड में 20 से 64 साल की उम्र के लोगों की आबादी का हिस्सा 60% से घटकर 56% हो जाएगा। वहीं, 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी का हिस्सा अभी के 21% से बढ़कर 27% हो जाएगा।

इस सीमा (कैप) का विरोध करने वालों का तर्क है कि कई नए आने वाले लोग उद्यमी रहे हैं, जिन्होंने स्विस अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया है। वे नेस्ले, स्वैच और ABB जैसी जानी-मानी कंपनियों का उदाहरण देते हैं, जिन्हें पूरी तरह या आंशिक रूप से विदेशियों ने शुरू किया था।
एवेनिर सुइस (Avenir Suisse) की 2023 की एक स्टडी के अनुसार, स्विट्जरलैंड में कंपनियों के मालिकों में से 39% विदेशी थे।

क्या है जनमत संग्रह के नियम

स्विटरजलैंड में डायरेक्ट डेमोक्रेसी है यानी वे चुनाव के अलावा रेफरेंडम के जरिए किसी भी कानून पर खुद वोट करते हैं कि संसद को कोई काम करना चाहिए या नहीं। इसके लिए पूरे देश में वोटिंग होती है। यहाँ एक नियम यह भी है कि किसी मुद्दे पर डेढ़ महीना पहले यानी करीब 18 महीने के अंदर एक लाख लोग दस्तखत कर दें तो उस मुद्दे पर वोटिंग होती है। यहाँ संसद फैसला नहीं लेती, बल्कि पूरा देश मिलकर जनमत संग्रह के माध्यम से फैसला लेता है।

दरअसल यहाँ की SVP पार्टी देश की संस्कृति की रक्षा के नाम पर प्रवासियों का लगातार विरोध कर रही है और ‘जिससे हमें प्यार है उसे बचाना है’ के नारे लगा रही है। फिलहाल देश की करीब 27 फीसदी आबादी प्रवासियों की है। इसी तरह का एक प्रस्ताव 2014 में पारित हुआ था, लेकिन इसे कभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

नेहरू से राहुल तक आ गई कॉन्ग्रेस, पर राम मंदिर से खत्म नहीं हो रही घृणा: ‘इमाम-ए-हिंद’ वाली राजनीति को कभी स्वीकार नहीं करेंगे...

जैसे ही चुनाव सिर पर आते हैं, तब कॉन्ग्रेसी 'इच्छाधारी सनातनी' बन जाती है। कभी राम को काल्पनिक बताती है, तो कभी 'इमाम-ए-हिंद' कहती है।

1973 का इजरायल-अरब युद्ध, तेल का संकट और ब्राजील का गन्ना मॉडल: कैसे दुनिया को मिला पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का फॉर्मूला, भारत भी...

एथेनॉल ब्लेंडिंग नया प्रयोग नहीं है। ब्राजील ने 1970 के तेल संकट के बाद इसे अपनाया और भारत ने भी दो दशक पहले इसकी शुरुआत की। विस्तार से पढ़ें।
- विज्ञापन -