अमेरिका अपनी मौद्रिक नीति और डॉलर के प्रभुत्व के दम पर दूसरे देशों में मुद्रास्फीति का बोझ लगातार बढ़ा रहा है। हालाँकि, अमेरिका को अपनी गलतियों का दोष दूसरों पर डालने की भी पुरानी आदत है। इसी क्रम में अमेरिकी सीनेटरों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक संशोधित विधेयक को पेश किया है , जिसमें भारत और चीन सहित रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों पर 100% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है।
रूस पर प्रतिबंध विधेयक: 500% से 100% तक, हथियार के रूप में टैरिफ का उपयोग
यह विधेक मूल रूप से दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने एक साल पहले पेश किया था, जिसे दोनों दलों रिपब्लिकन और डेमोक्रेट का समर्थन प्राप्त है।
ग्राहम का शनिवार को अचानक निधन हो गया, जिन्होंने मौत से एक दिन पहले यूक्रेन यात्रा के दौरान घोषणा की थी कि उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए समझौता कर लिया है।
अमेरिकी सीनेटरों ने 14 जुलाई 2026 को पहले के प्रस्तावों का एक संस्करण पेश किया। सीनेटर जीन शाहीन, रिचर्ड ब्लूमंथल और रोजर विकर सहित अन्य लोगों ने वाशिंगटन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि विधेयक को सीनेट का समर्थन प्राप्त है और यह अगस्त 2026 तक पारित हो जाएगा।
Breaking: US Senators – backed by Trump – propose hitting India and others with upto 100% tariffs for buying Russian oil
— Shashank Mattoo (@MattooShashank) July 15, 2026
BUT their new bill will exempt European allies for purchasing Russian natural gas pic.twitter.com/Swbar8klnV
ग्राहम ने ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’ प्रस्ताव में कहा था कि यूएस राष्ट्रपति को उन सभी वस्तुओं और सेवाओं पर टैरिफ कम से कम 500% तक बढ़ाना होगा जो रूस से पेट्रोलियम उत्पादों और यूरेनियम को खरीदने-बेचने में शामिल हैं।”

शुरुआत में रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले अधिनियम को ट्रंप प्रशासन ने समर्थन नहीं दिया। इसलिए ये ठंडे बस्ते में चला गया। लेकिन नया संशोधित प्रस्ताव रूसी तेल खरीदारों पर प्रतिबंध की बात करता है। इसमें रूसी तेल खरीदारों के खिलाफ 500 फीसदी के बजाए 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। इसका असर चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर पड़ेगा।
रिपोर्टों के अनुसार, पहले के मसौदों में भी इन देशों को टारगेट किया गया था और अब भी किया गया है। हालाँकि टैरिफ में कमी की गई है।
संशोधित विधेयक में रूस के वित्तीय, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों के बड़े हिस्से, अभिजात्य वर्ग और व्यापारियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को व्यक्तिगत रूप से निशाना साधने वाले प्रावधान भी शामिल हैं।
इसके अलावा, विधेयक में मौजूदा प्रतिबंधों से बचने के लिए रूसी टैंकरों के अवैध बेड़े को रोकने का भी प्रस्ताव है। विधेयक में वीजा प्रतिबंध, संपत्ति जब्त करने और रूसी अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव है। रूसी संघ का केंद्रीय बैंक समेत तमाम रूसी वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है। रूस की सबसे बड़ी सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं पर भी प्रतिबंध अमेरिका लगा देगा। इनमें यामल एलएनजी और आर्कटिक एलएनजी 1, 2 और 3 शामिल हैं।
अमेरिका का मकसद इन संशोधित विधेयक के माध्यम से रूस की आर्थिक ढाँचे को कमजोर करना है। वह रूसी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले देशों को दंडित करना चाहता है। अमेरिका का मानना है कि रूस इन पैसों का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में कर रहा है। प्रतिबंध लगने से उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कम होगी। यही वजह है कि प्रस्ताव में रूस की ऊर्जा, रक्षा और वित्तीय व्यवस्था पर भी नए प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।
हालाँकि संशोधित विधेयक में अमेरिका के राष्ट्रपति को देशहित में निर्णय लेने और प्रतिबंधों को खत्म करने का भी अधिकार है।
विधेयक का सबसे दिलचस्प प्रावधान प्राकृतिक गैस को लेकर है। लिंडसे ग्राहम की रूस जवाबदेही वाले प्रावधान में उन देशों को काफी हद तक छूट दी थी जो रूसी प्राकृतिक गैस का 15% से कम आयात करते हैं या लगातार रूसी गैस के आयात को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल ये काफी चालाकी से दी गई छूट है। इसे अमेरिका के अधिकांश यूरोपीय सहयोगियों को बचाने के लिए बनाया गया है।
यदि यह विधेयक पारित होकर कानून बन जाता है, तो इससे अमेरिकी प्रशासन को भारत, चीन समेत 5 रूसी तेल खरीदारों पर आर्थिक दबाव डालने के लिए नया बल मिलेगा। हालाँकि ट्रंप प्रशासन के नीतिगत निर्णय लेने में लगातार दिख रहे ढुलमुल रवैये को देखते हुए ये माना जा रहा है कि फिलहाल 100% टैरिफ का नियम लागू नहीं होगा। हालाँकि कानून बनने के बाद अमेरिकी सरकार रूस पर दबाव डालने के लिए अधिकतम टैरिफ लगाना चाहेगी।
भारत के अधिकांश मेनस्ट्रीम मीडिया टैरिफ को 500% से घटाकर 100% करने के प्रस्ताव को ‘राहत’ के रूप में पेश कर रहा है। जबकि चाहे 100%, 500%, 1000% या सिर्फ 10% ही क्यों न हो, रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिका जो टैरिफ लगा रहा है, वह भी भारत समेत कई देशों पर ‘दंड’ के रूप में, तो ये राहत भरा नहीं बल्कि मूर्खतापूर्ण और पाखंड है।
वैसे भी 500% टैरिफ कभी भी व्यावहारिक नहीं हो सकता। कई अमेरिकी सांसदों ने भी इसे अव्यवहारिक माना था। प्रस्तावित टैरिफ को 500% से घटाकर 100% करने के संशोधन ने नए विधेयक को कुछ हद तक व्यावहारिक बना दिया।
इस विधेयक को सीनेट के 80 फीसदी सदस्यों का समर्थन मिल रहा है। इसलिए इस पर जल्द ही मतदान हो सकता है।
गौरतलब है कि यदि नया रूसी प्रतिबंध विधेयक पारित हो जाता है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति को पांचों देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा। न तो यह खुद ब खुद लागू हो जाएगा और न ही यह अनिवार्य रूप से लागू होगा। दरअसल यह कानून राष्ट्रपति को शुल्क लगाने, छूट देने या पूरी तरह माफ करने का अधिकार देता है। यह व्यावहारिक भी है।
इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के दुनियाभर के देशों पर टैरिफ लगाने के प्रस्ताव को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने 1977 के आपातकालीन स्थितियों में लागू कानूनी शक्तियों का हवाला देते हुए कहा था कि दुनिया भर के लगभग हर व्यापारिक भागीदार पर टैरिफ लगाकर राष्ट्रपति ने अपने अधिकार का उल्लंघन किया है।
भले ही ट्रंप प्रशासन 100% टैरिफ न लगाए लेकिन अगर यह कानून पारित हो जाता है, तो टारगेट देशों के साथ बातचीत करते समय शर्तों को प्रभावित करने और उन पर दबाव डालने का यह एक हथियार बन जाएगा। भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए व्यापक बातचीत कर रहे हैं। अमेरिका के 100% टैरिफ लगाने से भारत पर दबाव पड़ेगा कि वह रूस से तेल की खरीद में कमी लाए, ताकि उसे छूट मिले।
हालाँकि, भारत सरकार सामरिक मुद्दों पर स्वायत्तता और किसी भी स्रोत से ऊर्जा खरीदने की स्वतंत्रता के मामले में दृढ़ता से अपने रुख पर कायम है, ऐसे में बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते में एक नया गतिरोध उत्पन्न हो सकता है। जब तक भारत पर टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है, तब तक राहत की उम्मीद करना बेमानी है।
भारत से रूसी तेल खरीदने का अनुरोध करने से लेकर ‘दंडित’ करने तक: अमेरिकी पाखंड जगजाहिर
तथ्य यह है कि 2022 में यूक्रेन में युद्ध छिड़ने के बाद भारत रियायती दरों पर रूसी तेल ज्यादा खरीद रहा है। हालाँकि इसमें कमी-ज्यादा होता रहा है। इसकी वजह अमेरिकी धमकियों या दबाव के कारण नहीं था, लेकिन अपनी जरूरत थी। दरअसल भारत ने हाल के वर्षों में अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाई है, और यूरोप ने भी ऐसा ही किया है, जो पहले रूसी ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर था।
अमेरिकी सीनेटरों ने जानबूझकर प्राकृतिक गैस को विधेयक से बाहर रखा, यह जानते हुए कि कटौती के बावजूद, यूरोपीय संघ रूसी एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। यह चयनात्मक टारगेट का स्पष्ट मामला है।
पिछले साल मई में भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने में अपनी काल्पनिक भूमिका के लिए भारत का समर्थन हासिल करने में विफल रहने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस और यूक्रेन के बीच युद्धविराम कराने में अपनी विफलता का गुस्सा भारत पर निकाला।
अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभालने के 24 घंटों के भीतर युद्ध समाप्त करने के वादे के बावजूद रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने में विफल रहने के कारण आलोचना और शर्मिंदगी का सामना करते हुए ट्रम्प ने पहले रेसिपोकल टैरिफ लगाए और भारत पर टैरिफ को दोगुना करके 50% कर दिया। 25% की यह बढ़ोतरी रूसी तेल खरीदने पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ के रूप में थी।
ट्रम्प ने पीटर नवारो, स्कॉट बेसेंट और हावर्ड लटनिक सहित अपने अधिकारियों को भारत और भारतीय रिफाइनरियों पर हमले करने में लगाया और भारत के साथ रूसी ऊर्जा व्यापार को यूक्रेन-रूस से जोड़ने की कोशिश की और इसे ‘युद्ध के वित्तपोषक’ के रूप में चित्रित करने के लिए खुला छोड़ दिया।
यह बेबुनियाद निंदा और टैरिफ संबंधी बयानबाजी ऐसे समय में हुई जब उसी अमेरिका ने भारत से रूसी तेल खरीदने का अनुरोध किया था और यहाँ तक कि इसके लिए तारीफ भी की थी, हालाँकि वो वक्त जो बाइडेन के राष्ट्रपति काल का था। उस वक्त कहा गया कि भारत के रूसी तेल खरीदने से यूरोपीय संघ सहित अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आपूर्ति जारी रखने में मदद मिली और वैश्विक ऊर्जा कीमत को नियंत्रित करने में मदद मिली।
तत्कालीन अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि अमेरिका चाहता था कि भारत जी7 ने जो अधिकतम मूल्य निर्धारित किया है, उस पर रूसी तेल खरीदे। उन्होंने कहा, “उन्होंने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि हम चाहते थे कि कोई रूसी तेल को निर्धारित मूल्य पर खरीदे… यह कोई उल्लंघन नहीं था… बल्कि यह नीति का ही हिस्सा था क्योंकि… हम तेल की कीमतों में वृद्धि नहीं चाहते थे।”
यानी अमेरिका को वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारत की आवश्यकता थी, तब भारत का रूस से तेल खरीदना उचित और आवश्यक था। लेकिन अब उसे इसकी जरूरत नहीं महसूस नहीं हो रही है। रूस-यूक्रेन के युद्ध के इन 5 सालों में स्थायी युद्धविराम तो दूर, एक युद्धविराम का मौका भी नहीं आया है। इसके बावजूद अमेरिका ने बहुत आसानी से युद्ध के लिए रूस को आर्थिक मदद करने का ठीकरा भारत पर फोड़ दिया।
ऐसा तब है जब अमेरिका खुद लगातार रूस से उर्वरक, यूरेनियम, पैलेडियम और अन्य धातुओं का आयात करता रहा है। उस वक्त ये तर्क दिया जाता है कि ये उत्पाद अमेरिकी उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं और इनकी जगह कोई और उत्पाद नहीं ले सकता। OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि कैसे वही अमेरिका जिसने भारत पर रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफाखोरी का आरोप लगाया था, खुद इस लंबे युद्ध का सबसे बड़ा लाभार्थी है।
वास्तव में अमेरिका ने वैकल्पिक रणनीति, जैसे कि गुप्त टैंकर और बेड़ा, अधिक छूट आदि का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में अपनी विफलता का आरोप भारत पर मढ़ दिया।
हालाँकि, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत आगे बढ़ने के साथ ही दोनों देशों के बीच संबंध सुधरने लगे और फरवरी 2026 तक अमेरिका ने अधिकांश भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी टैरिफ दरें घटाकर 18% कर दीं और रूसी तेल खरीदने के नाम पर लगा रेसिपोकल 25% टैरिफ हटा दिया।
साथ ही, रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे कच्चा तेल खरीदने का लाइसेंस जारी किया और रूसी तेल खरीद पर प्रतिबंधों में छूट की घोषणा भी की। हालाँकि मोदी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका भारत को अनुमति दे या न दे, भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा।
हालाँकि, अमेरिकी नीति में यह बदलाव किसी तात्कालिक अंतर्दृष्टि से प्रेरित नहीं था, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों में आए परिवर्तनों के कारण हुआ था। जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला किया, तो पश्चिम एशियाई देश ने वैश्विक ऊर्जा संकट के केंद्र माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी कर दी। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने लगीं और अमेरिका को ऊर्जा संकट से निपटने की योजना बनाए बिना युद्ध शुरू करने के लिए घरेलू और वैश्विक आलोचना का सामना करना पड़ा।
अगर अमेरिका का नया प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो भारत-अमेरिका संबंधों में पहले से ही मौजूद अविश्वास को बढ़ावा मिलेगा । 100% टैरिफ के प्रस्ताव के साथ अमेरिकी नीति निर्माता एक बार फिर रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत में अपनी विफलता का दोष भारत और चीन पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
चूँकि सीनेटरों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्होंने ट्रंप प्रशासन के साथ इस विधेयक को वैध बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए समझौता कर लिया है, इसलिए यदि कॉन्ग्रेस इसे पारित कर देती है, और राष्ट्रपति इस पर साइन कर देते हैं तो ये कानून बन जाएगा। निस्संदेह, ट्रंप रूस और रूसी ऊर्जा के खरीदारों के खिलाफ भू-राजनीतिक हथियार के रूप में टैरिफ का उपयोग करने में खुशी महसूस करेंगे।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


