Friday, May 14, 2021
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CM योगी को लिखा प्रेस स्वतंत्रता पर, महाराष्ट्र में अर्णब-ठाकरे मामले पर घालमेल कर रहा था एडिटर्स गिल्ड

जिस प्रकार से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपने बयान में मुंबई पुलिस को आड़े हाथों लेने के बजाए रिपब्लिक टीवी की निंदा करने के लिए अधिक जगह दिया, उससे स्पष्ट होता है कि वैचारिक रूप से एडिटर्स गिल्ड किसके साथ है।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सोमवार (नवंबर 9, 2020) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े अहम मुद्दों की ओर ध्यान देने का अनुरोध किया और साथ ही रेखांकित किया कि हाल में ऐसी कई घटनाएँ सामने आईं हैं जो राज्य में स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए माहौल को लेकर ‘गहरी चिंता’ पैदा करती हैं। 

योगी को लिखे पत्र में गिल्ड की ओर से बिना रिपब्लिक टीवी का नाम लिए कहा गया कि मुंबई में एक टीवी चैनल के संपादक को जब गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने (आदित्यनाथ) प्रेस की स्वतंत्रता की बात उठाकर सही किया था लेकिन उत्तर प्रदेश में पत्रकारों को अधिकारियों द्वारा डराने-धमकाने और प्रताड़ित करने की और भी तकलीफदेह घटनाएँ हुई हैं और पत्रकारों को उनका काम करने से रोका गया है। 

गौरतलब है कि योगी ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी की निंदा की थी। पत्र पर एडिटर्स गिल्ड की अध्यक्ष सीमा मुस्तफा एवं अन्य पदाधिकारियों के हस्ताक्षर हैं। इसमें कुछ ऐसे मामलों की जानकारी भी दी गई है जिनमें पत्रकारों को कथित रूप से झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया गया। इसमें मलयालम समाचार पोर्टल अजीमुखम के दिल्ली में कार्यरत पत्रकार सिद्दकी कप्पन और वामपंथी वेबसाइट स्क्रॉल की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा आदि पत्रकारों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में दर्ज मामलों का उल्लेख किया गया है।

सवाल यह है कि क्या एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने ऐसा ही पत्र महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार को लिखा है? जहाँ पर एक मीडिया चैनल और उनके पत्रकारों को बुरी तरह से परेशान किया जा रहा है। हाँ, एडिटर गिल्ड ने मामले पर अपना बयान जरूर जारी किया। बयान में गिल्ड ने रिपब्लिक के पत्रकारों के खिलाफ मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज किए गए केस को चिंताजनक तो बताया, लेकिन साथ ही चैनल द्वारा टीआरपी में हेरफेर के लिए जारी पुलिस जाँच को जारी रखने और किसी भी तरह से कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करने की भी बात कही। 

कहने को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का दायित्व है प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत बनाना। लेकिन इन दिनों इस संगठन का वैचारिक पक्षपात खुलकर सामने आ रहा है। महीनों तक रिपब्लिक टीवी के खिलाफ चल रहे दमन चक्र पर मौन व्रत धारण करने के बाद जब आखिरकार एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपना बयान जारी किया, तो वह मुंबई पुलिस की निंदा करता कम, और रिपब्लिक टीवी की निंदा करता ज्यादा दिखाई दे रहा था।

मुंबई पुलिस द्वारा रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई के परिप्रेक्ष्य में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने हाल ही में एक बयान जारी किया। अपने बयान में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने बताया, “एडिटर्स गिल्ड मुंबई पुलिस द्वारा रिपब्लिक टीवी के विरुद्ध जारी अनगिनत FIR की निंदा करती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हालाँकि यह अर्थ नहीं है कि घृणा को भी बढ़ावा दिया जाए!”

एडिटर्स गिल्‍ड ने बयान में रिपब्लिक टीवी की कवरेज पर भी सवाल उठाए। फिर क्या था, एडिटर्स गिल्ड ने अपनी असलियत जगजाहिर की, और कुछ पंक्तियों में मुंबई पुलिस की निंदा के पश्चात रिपब्लिक टीवी की धज्जियाँ उड़ाते हुए बाकी का बयान समर्पित कर दिया, चाहे वह सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की कवरेज हो, या फिर बॉलीवुड का ड्रग्स कनेक्शन।

गिल्‍ड ने मुंबई हाई कोर्ट की टिप्‍पणी का जिक्र करते हुए कहा कि चैनल की ‘खोजी पत्रकारिता’ को लेकर काफी आपत्तियाँ दर्ज की गई हैं। संस्‍था ने न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स एसोसिएशन (NBA) के चैनल की रिपोर्टिंग से इत्तेफाक न रखने का भी जिक्र किया है। गिल्‍ड ने कहा है कि वक्‍त आ गया है कि चैनल जिम्‍मेदारी से व्‍यवहार करे और अपने पत्रकारों की सुरक्षा के साथ-साथ मीडिया की साख से समझौता न करे। गिल्‍ड ने पुलिस से भी यह सुनिश्चित करने को कहा है कि उसकी जाँच चैनल के पत्रकारों को नुकसान न पहुँचाए और गिरफ्तारी न हो।

बयान के अनुसार, “TRP की धाँधली के आरोपों के अलावा, इस बात से बिलकुल नहीं इनकार किया जा सकता कि रिपब्लिक टीवी ने सुशांत सिंह राजपूत की असामयिक मृत्यु से संबंधित जो कवरेज की है, उससे रिपोर्टिंग के तौर तरीकों और मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर भी गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाते मुंबई हाईकोर्ट ने चैनल के वकील से अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के विषय में सवाल पूछते हुए एक उचित प्रश्न पूछा, “क्या जो आप करते हो वो भी इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म का हिस्सा है? जनता से क्या यह जानना जरूरी है कि किसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए?” ऐसी ही चिंताएँ न्यूज ब्रॉडकास्टर असोसिएशन ने भी व्यक्त की।

इस पत्र को पढ़ने के बाद आप भी इस बात को भूल जाएँगे कि यह पत्र असल में मुंबई पुलिस के FIR की निन्दा करने के लिए जारी किया था, क्योंकि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने रिपब्लिक टीवी को ही अपनी हद में रहने का निर्देश दिया।

जिस प्रकार से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपने बयान में मुंबई पुलिस को आड़े हाथों लेने के बजाए रिपब्लिक टीवी की निंदा करने के लिए अधिक जगह दिया, उससे स्पष्ट होता है कि वैचारिक रूप से एडिटर्स गिल्ड किसके साथ है। यदि कश्मीर टाइम्स के विषय पर इनके बयान पर ध्यान दिया जाए, तो आपको समझ में आ जाएगा कि एडिटर्स गिल्ड कितना पक्षपाती है।

आपातकाल के बाद से ये पहली बार है कि कोई सरकार प्रेस की आजादी का इस तरह मखौल उड़ा रही है। चाहे प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह द्वारा बोला जा रहा सफेद झूठ हो, या फिर रिपब्लिक से मुंबई पुलिस द्वारा माँगे जा रहे सारे वित्तीय रिकॉर्ड्स का ब्योरा हो, ये स्पष्ट है कि मुंबई पुलिस रिपब्लिक टीवी, विशेषकर अर्णब गोस्वामी के विरुद्ध हाथ धोकर पड़ी हुई है। 

ऐसे में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का महाराष्ट्र प्रशासन के अत्याचारों पर मौन रहना ये स्पष्ट जताता है कि वह किस प्रकार से अप्रत्यक्ष रूप से महाराष्ट्र प्रशासन के दमनकारी कार्यों का समर्थन कर रही है। अब इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं – या तो एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया वामपंथी विचारधारा वाले लोगों से भरी हुई हैं, या फिर वे अर्णब के समर्थन में बयान देकर उद्धव ठाकरे का प्रकोप नहीं झेलना चाहते।

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