Friday, April 3, 2026
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कर्नाटक के विज्ञापन का 69% हिस्सा सिर्फ कॉन्ग्रेस की नेशनल हेराल्ड को, रीडरशिप-O: जानें- कैसे जनता की गाढ़ी कमाई रिश्वतखोरी में उड़ा रही सिद्धारमैय्या सरकार

शिवकुमार खुद नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं, फिर भी सिद्धारमैया कॉन्ग्रेस से जुड़ी संस्था को सरकारी खजाने से पैसे पहुँचा रहे हैं।

कर्नाटक सरकार ने कथित तौर पर विवादित अखबार नेशनल हेराल्ड को किसी भी अन्य राष्ट्रीय दैनिक अखबार से ज्यादा विज्ञापन के लिए पैसे दिए हैं, जिससे जनता के पैसों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई जा रही है। आधिकारिक दस्तावेजों से पता चला है कि नेशनल हेराल्ड को सरकार के विज्ञापन बजट से करोड़ों रुपए मिले, जबकि राज्य में इसका डिस्ट्रीब्यूशन लगभग नहीं के बराबर है और पाठक संख्या भी लगभग शून्य है।

डेटा से सामने आया है कि नेशनल हेराल्ड को 2023–2024 में 1.90 करोड़ रुपए दिए गए और 2024–2025 में लगभग 1 करोड़ रुपए (यानी 99 लाख रुपए), जबकि प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबारों को काफी कम रकम मिली, कई को तो दिए गए राशि का आधा से भी कम मिला।

सरकार ने 2024–2025 में राष्ट्रीय प्रकाशनों पर विज्ञापन के लिए 1.42 करोड़ रुपए खर्च किए, जिसमें से अकेले 69% हिस्सा नेशनल हेराल्ड को दिया गया। वहीं, उसी समय प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक अखबार खाली हाथ रहे। पिछले तीन सालों में सरकार ने नेशनल हेराल्ड के लिए विज्ञापन पर 4.31 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए हैं, जो किसी भी राष्ट्रीय मीडिया पर हुए खर्च से सबसे ज्यादा है।

सरकार ने 2025–2026 के लिए पहले ही 99 लाख रुपए जारी कर दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि सूचना विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास है। पिछले दो वित्तीय वर्षों में नेशनल हेराल्ड राष्ट्रीय अखबारों में कर्नाटक के विज्ञापन बजट का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता रहा है, भले ही इसके पाठकों की संख्या बेहद कम हो।

खुली लूट, दिनदहाड़े डकैती: बीजेपी का हमला, कॉन्ग्रेस ने किया बचाव

कर्नाटक सरकार के इस कारनामे का खुलासा होने के बाद से राज्य में राजनीतिक हंगामा मच गया है। विपक्ष ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है, जबकि सत्ताधारी दल ने इसका बेबाकी से बचाव किया। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. सीएन अश्वथ नारायण ने इसे “टैक्सपेयर्स के पैसे की खुली लूट” करार दिया। उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड पहले से ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच के दायरे में है।

नारायण ने कहा, “कर्नाटक या कहीं और सर्कुलेशन न होने वाले अखबार को जनता का पैसा क्यों दिया जाए? ऐसी संस्था से, जो पहले से गंभीर आर्थिक जाँच का सामना कर रही है, सरकारी फंड क्यों जोड़े जाएँ?”

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी इसी तरह हमला बोला और कहा कि नेशनल हेराल्ड को किसी भी स्थापित अखबार से ज्यादा विज्ञापन राजस्व मिलना अपने आप में एक घोटाला है। उन्होंने कहा, “इस तथाकथित मालिक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी इस घोटाले में जाँच के दायरे में हैं और फिलहाल जमानत पर हैं।”

हालाँकि, कर्नाटक के मंत्री ईश्वर खंद्रे ने ईडी की जाँच को ही ‘एंटी-नेशनल’ बता दिया और सवालिया लहजे में पूछा, “नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन देने में क्या गलत है?” उन्होंने बीजेपी पर मामले को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया। हैरानी की बात ये है कि उन्होंने सीधे-सीधे लूट-खसोट के आरोपों को देशभक्ति से जोड़ दिया, जबकि सारी दुनिया को पता है कि नेशनल हेराल्ड के मालिकान कौन हैं और उन पर कैसे आरोप दर्ज हैं।

ईश्वर खंद्रे ने ही नहीं, कर्नाटक के एक और मंत्री ने भी सिद्धारमैय्या सरकार के इस फैसले का बचाव किया। कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सुपुत्र और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस तक को मामले में घसीट लिया। उन्होंने बीजेपी से ‘ऑर्गनाइजर’ मैगजीन की फाइनेंशियल डिटेल्स भी माँग ली।

खड़गे ने कहा, “बीजेपी को आरएसएस की मैगजीन ऑर्गनाइजर की फंडिंग के बारे में चिंता करनी चाहिए, न कि नेशनल हेराल्ड की। उनके पास बैंक अकाउंट्स नहीं हैं और वे रजिस्टर्ड तक नहीं हैं। यहाँ सब क्लियर है। नेशनल हेराल्ड नाम का संस्थान कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड है। उसे सरकारी और कॉरपोरेट संस्थान भी विज्ञापन देते हैं। ऐसे में इस तरह की बातों को लेकर क्या कोई कानून है कि नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन न दिया जाए। अगर ऐसा कोई कानून है, तो हमें भी बताया जाए कि हम कौन से कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।”

उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी बढ़ती आलोचना के बीच सरकार के फैसले का बचाव किया। उन्होंने जोर देकर कहा, “कोई भी सरकार किसी भी मीडिया संस्था को विज्ञापन दे सकती है जिसे वो अपना काम करते हुए लगे। हमने कई अन्य राज्यों को कन्नड़ अखबारों को विज्ञापन देते देखा है। वो क्या कर रहे हैं? क्या हम उनसे सवाल करेंगे? इसमें कुछ गलत नहीं है।”

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता ने इसका जवाब देते हुए कहा कि शिवकुमार खुद नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं, फिर भी सिद्धारमैया कॉन्ग्रेस से जुड़ी संस्था को सरकारी खजाने से पैसे पहुँचा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया, “कर्नाटक सरकार का विज्ञापन राजस्व नेशनल हेराल्ड की कुल कमाई का 69% बनता है, जबकि बाकी सभी स्रोतों से सिर्फ 31% योगदान है। यह दिनदहाड़े डकैती है।”

शिवकुमार ने पिछले साल माना था कि उन्होंने नेशनल हेराल्ड को 25 लाख रुपए दिए थे, यह दावा करते हुए कि यह पार्टी द्वारा संचालित प्रकाशन है। यह बयान तब आया जब उनके भाई डीके सुरेश और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को ईडी की चार्जशीट में शामिल किया गया।

बीजेपी ने फिलहाल सिद्धारमैया सरकार से अपने इस कदम का जवाब देने और विज्ञापन फंड वितरण के मानदंडों की पूरी व्याख्या करने की माँग की है।

इस बीच कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा (पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख भी हैं) ने कहा, “नेशनल हेराल्ड आजादी के समय से राष्ट्रीय धरोहर है। अगर मीडिया को ही फंड दिए जाते हैं तो मीडिया को क्या समस्या है।” यह बात उन्होंने सीएनएन-न्यूज18 को दिए इंटरव्यू में कही और पुरानी संस्थाओं को समर्थन देना उचित बताया।

नेशनल हेराल्ड का इतिहास और घोटाले की शुरुआत

नेशनल हेराल्ड प्रवर्तन निदेशालय की मनी लॉन्ड्रिंग जाँच के केंद्र में है, जो इसके मूल कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) से जुड़ी है। सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी इस मामले में आरोपित बनाए गए हैं, साथ ही अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम भी हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने 1938 में नेशनल हेराल्ड की स्थापना की थी, जो भारत की आजादी के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी का मुखपत्र बन गया। नेशनल हेराल्ड अखबार एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) द्वारा प्रकाशित किया जाता था। अप्रैल 2008 तक एजेएल पर कॉन्ग्रेस का 90.26 करोड़ रुपए का बकाया था। पार्टी ने समय-समय पर एजेएल को शून्य प्रतिशत ब्याज पर लोन दिए ताकि यह चलता रहे, लेकिन 2008 में यह अस्थिरता के कारण बंद हो गया।

इसके बाद 2010 में यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (वाईआईएल) नाम से एक नई कंपनी बनाई गई। इसमें सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, मोटीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे प्रमुख कॉन्ग्रेसी शामिल थे। पार्टी ने अपने 90 करोड़ रुपए के बकाए की वसूली के अधिकार इस नई कंपनी को मात्र 50 लाख रुपए में ट्रांसफर कर दिए, जिससे यंग इंडियन को एजेएल की बहुमत हिस्सेदारी मिल गई।

एजेएल अपने कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा और यंग इंडियन ने अधिकांश शेयर खरीदकर अंततः पूरी कंपनी हासिल कर ली। इसके परिणामस्वरूप सभी संपत्तियां गाँधी परिवार के नियंत्रण वाली संस्था के पास चली गईं। इसमें मुंबई, नई दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, पटना आदि प्रमुख शहरों में स्थित अचल संपत्तियाँ शामिल थीं, जिनकी कीमत 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जाती है।

यंग इंडियन ने बाद में घोषणा की कि अखबार प्रकाशित करना उसका उद्देश्य नहीं है, लेकिन फिर भी इस गैर-लाभकारी संस्था ने 2016 में डिजिटल फॉर्मेट में नेशनल हेराल्ड सहित तीन अखबार दोबारा प्रकाशित करना शुरू किया। 2011 में सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया कि गाँधी परिवार ने यंग इंडियन बनाकर एजेएल की अचल संपत्तियों पर कब्जा करने की योजना बनाई।

उन्होंने इस मामले को अदालत में ले जाकर राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी पर अपनी पार्टी को ठगने का आरोप लगाया। स्वामी ने कहा कि यंग इंडियन ने 90.26 करोड़ रुपए का कर्ज मात्र 50 लाख रुपए में खत्म कर दिया। उनके अनुसार, पार्टी का एजेएल को व्यावसायिक आधार पर ऋण देना गैरकानूनी था।

कई सालों से चल रही जाँच

साल 2014 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और अन्य को समन जारी किया। इसमें देखा गया कि यंग इंडियन एक ‘नकली ढाँचा’ लगता है जिसके जरिए सार्वजनिक संपत्तियों को निजी उपयोग में लाया गया। उसी साल ईडी और इनकम टैक्स विभाग ने अलग-अलग प्रारंभिक जाँच शुरू की। दिल्ली हाईकोर्ट ने गाँधी परिवार की अपील खारिज कर समन को बरकरार रखा। सोनिया और राहुल को कोर्ट में पेश होना पड़ा और जमानत मिली।

कुछ साल बाद, इनकम टैक्स विभाग की रिपोर्ट और स्वामी की शिकायत के आधार पर 2018 में ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत औपचारिक मामला दर्ज किया।

साल 2022 में जाँच और तेज हुई जब जुलाई में सोनिया से कई दौर की पूछताछ हुई और जून में राहुल से पाँच दिनों में 50 घंटे से ज्यादा पूछताछ की गई। यंग इंडियन और एजेएल से जुड़ी जगहों पर छापे मारे गए। 2022 में एक ट्रायल जज ने स्वामी की 2013 की शिकायत पर यंग इंडियन के खिलाफ इनकम टैक्स जाँच पर संज्ञान लिया, जिसके बाद ईडी ने पीएमएलए के आपराधिक प्रावधानों के तहत नया केस दर्ज किया।

साल 2023 में ईडी ने दिल्ली, मुंबई और लखनऊ में एजेएल की संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया, जिनकी अनुमानित कीमत 750 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। 2024 में कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों और पूर्व एजेएल कर्मचारियों से और पूछताछ हुई और एजेंसी ने एक और पीएमएलए शिकायत दर्ज की।

पिछले साल ईडी ने दिल्ली की स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट में सोनिया और राहुल को मुख्य आरोपित बनाते हुए पीएमएलए चार्जशीट दाखिल की। ईडी ने दिल्ली पुलिस के इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) को भी पत्र लिखकर नई एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया।

इसके बाद आधिकारिक शिकायत दर्ज हुई जिसमें सोनिया और राहुल के साथ कॉन्ग्रेस नेता सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और अज्ञात व्यक्तियों के नाम शामिल थे। हालाँकि, दिल्ली कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप खारिज कर दिए क्योंकि वे स्वामी की निजी शिकायत पर आधारित थे।

कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस के ईओडब्ल्यू ने औपचारिक शिकायत दी है और जज ने ईडी के दावों की सत्यता पर विचार करना उचित नहीं समझा। फिर भी, कोर्ट ने कहा कि केंद्रीय एजेंसी अपनी जाँच जारी रख सकती है क्योंकि दिल्ली पुलिस ने औपचारिक शिकायत दर्ज की है।

यह ध्यान देने योग्य है कि नेशनल हेराल्ड मामले में आपराधिक साजिश, पार्टी फंड का दुरुपयोग, मनी लॉन्ड्रिंग, टैक्स चोरी, सार्वजनिक रूप से पट्टे पर दी गई जमीन का व्यावसायिक दुरुपयोग, धोखाधड़ी से कब्जा और जमीन हड़पने जैसे गंभीर आरोप हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए कैश काउ बना कर्नाटक

कॉन्ग्रेस ने न केवल कर्नाटक के संसाधनों को अपनी सत्ता बरकरार रखने वाली मुफ्तखोरी की राजनीति के लिए खाली किया है, बल्कि राज्य की संपत्तियों का इस्तेमाल नेशनल हेराल्ड जैसी भ्रष्ट संस्था को सहारा देने के लिए भी किया है। यह सरकार द्वारा निजी हितों के लिए कमजोर खजाने का फायदा उठाने का एक और संदिग्ध कदम बनकर उभरा है।

कॉन्ग्रेस द्वारा ‘धरोहर संस्था’ कहा जाने वाला यह प्रकाशन तब तक शायद ऐसा कहलाने लायक होता, यदि कॉन्ग्रेस की भ्रष्ट प्रथाओं का इतिहास न होता। लेकिन अब गंभीर आरोपों के चलते यह उससे बहुत दूर हो चुका है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी नेशनल हेराल्ड के भीतर की चालाकी पर प्रकाश डाला था, जिसे नेहरू ने हमेशा की तरह खारिज कर दिया। इस मामले में भी ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने साबित कर दिया है कि “जितना बदलाव होता है, उतना ही सब कुछ पहले जैसा रहता है।”

इसके अलावा कॉन्ग्रेस नेताओं ने इस कदम का बचाव किया और आरएसएस को घसीटने की कोशिश की, यह भूलकर कि आरएसएस का प्रकाशन ‘ऑर्गनाइजर’ न तो किसी भ्रष्टाचार में फंसा है और न ही ऐसे किसी आरोप का सामना कर रहा है।

कॉन्ग्रेस से निष्पक्षता और ईमानदारी की उम्मीद करना यूनिकॉर्न की तलाश करने जैसा है। लेकिन उस पौराणिक जीव को ढूँढने की संभावना इससे ज्यादा है जितनी कॉन्ग्रेस से ईमानदारी की। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार से भरे ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए ये कदम हैरान करने वाले नहीं हैं।

वह पार्टी जो कभी ‘Iron Hand’ से शासन करती थी, 2014 में अपने घोटालों की भयानक मात्रा के कारण सत्ता से बाहर हो गई और तब से देश के कुछ ही हिस्सों तक सीमित रह गई है। अब यह जहाँ-जहाँ सत्ता में है, वहाँ से अपनी भ्रष्ट विरासत को बनाए रखने के लिए जो कुछ कर सकती है, कर रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade. Nearing three years in the profession.

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