झारखंड में धर्मांतरण की वजह से डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत के फैलने और जनजातियों की संस्कृति, जीवन शैली नष्ट होने को लेकर चिंता जताई है। इसके बाद एक बार फिर जनजातीय परंपरा और उसपर ईसाई मिशनरी और घुसपैठियों के बढ़ते प्रभाव पर बहस हो रही है।
चंपई सोरेन का कहना है कि अगर सरकार ने जनजातियों के लिए आरक्षण जैसी सुविधाएँ दी हैं, तो ईसाई बनने वाले इसका लाभ कैसे उठा सकते हैं, क्योंकि धर्मांतरण के बाद ही वे अल्पसंख्यक बन जाते हैं। अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था और सुविधाएँ संविधान और सरकार ने दे रखी है। यही बात इस्लाम कबूलने वालों के साथ भी लागू है।
चंपई सोरेन ने अपनी बात को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ देते हुए समझाया कि झारखंड में हजारों सालों से प्रकृति पूजक जनजातियों और सनातनियों के बीच एक बेहद गहरा, आत्मीय और सह-अस्तित्व का संबंध रहा है। दोनों समुदाय सदियों से एक ही गाँव, एक ही परिवेश में भाईचारे के साथ रहते आए हैं। उनके बीच कभी भी धर्म या पूजा पद्धति को लेकर कोई दीवार खड़ी नहीं हुई। सनातन धर्म ने कभी भी जनजातियों की पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं की।
यही वजह है कि जनजातियों की मूल संस्कृति, पूजा पद्धति और बाकी खासियत बनी रही। अगर सनातनियों ने धर्मांतरण कराया होता तो जनजातीय समुदाय की संस्कृति कब का नष्ट हो जाती। इसी वजह से जनजातीय समाज को कभी भी हिंदू मंदिरों या सनातन परंपराओं से कोई आपत्ति या असुरक्षा की भावना नहीं हुई।
इस रिश्ते की खूबसूरती यह है कि सनातनी समाज के लोग जनजातीय लोगों के पवित्र स्थलों जैसे जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली और मांझी थान पर पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ जाते हैं और वहाँ के रीति-रिवाजों का सम्मान करते हैं। इसी तरह रांची के पास स्थित प्रसिद्ध दिउड़ी मंदिर और रंकिणी मंदिर जैसे अनगिनत ऐतिहासिक धार्मिक स्थल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
इन मंदिरों में जनजातीय समाज के लोग न केवल सिर झुकाते हैं, बल्कि सबसे बड़ी बात यह है कि इन मंदिरों के मुख्य पुजारी भी स्वयं जनजातीय समुदाय यानी आदिवासी पाहन या मुंडा से ही आते हैं। दोनों समुदाय एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में खुलकर शामिल होते हैं। जब आदिवासी भाई करमा या सरहुल मनाते हैं, तो सनातनी समाज उनके साथ झूमता है और जब सनातनी कोई उत्सव मनाते हैं, तो जनजातीय समाज उसका सहर्ष हिस्सा बनता है।
झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या पर मेरे बयान से काफी हंगामा हुआ। अपना धर्म बदल चुके कई लोग इस बात से परेशान हैं कि मैने सिर्फ चर्च की बात की, मंदिरों की नहीं। चलिए, आज इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं।
— Champai Soren (@ChampaiSoren) May 30, 2026
झारखंड के अधिकतर गांवों में आदिवासी-मूलवासी एक साथ… pic.twitter.com/lrKz5FgEwK
जनजातीय समुदाय झारखंड में मात्र 26 फीसदी
झारखंड में डेमोग्राफी का संकट कोई काल्पनिक डर नहीं है, बल्कि सरकारी आँकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राज्य में आदिवासियों का प्रतिशत लगातार घट रहा है, जबकि धर्मांतरित ईसाइयों और विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों की आबादी अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में जनजातियों की कुल संख्या लगभग 86.45 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 26.2% है।
वहीं पूरे देश की बात की जाए तो जनजातीय समुदाय की कुल जनसंख्या मात्र 10.45 करोड़ के आसपास है, जो देश की कुल आबादी का लगभग 8.6% है। झारखंड में कुल 32 जनजातियाँ हैं, जिनमें संथाल उरांव, मुंडा , कोल, माहली, हो प्रमुख हैं। संथाल यहाँ की सबसे बड़ी जनजाति हैं। संथाल परगना में इनकी आबादी सर्वाधिक है।
आजादी के समय और उसके बाद के दशकों के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पता चलता है कि झारखंड के गठन के समय जनजातीय लोगों की आबादी का जो अनुपात था, वह अब घटकर मात्र 26 फीसदी के आसपास सिमट गया है। इसके विपरीत ईसाई और मुस्लिम आबादी के विकास की दर सामान्य से कहीं अधिक रही है। अगर धर्मांतरण और घुसपैठ की रफ्तार यही रही, तो आने वाले कुछ दशकों में जनजातीय समाज अपनी ही गृह-भूमि पर अल्पसंख्यक बन जाएगा।
धर्मांतरण करा कर नष्ट किया जा रहा जनजातीय जीवन शैली
जनजातीय लोगों की जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक जीवनशैली खास तरह की होती है। जन्म, नामकरण, विवाह और दूसरे अहम पड़ावों पर सामाजिक प्रक्रियाएँ मांझी परगना, नायके, पाहन, मानकी, मुंडा, पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। इन मौकों पर जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली, मांझी थान जाकर मरांग बुरु, सिंगबोगा की पूजा की जाती है। हजारों सालों से ये चलता आ रहा है।
जब आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं तो झारखंड में 5,000+ चर्च क्यों बनाये गए हैं? वहां मरांग बुरु या सिंगबोंगा की पूजा होती है क्या? pic.twitter.com/4kzZfxmD6G
— Champai Soren (@ChampaiSoren) May 28, 2026
सनातन धर्म ने कभी भी इसमें हस्तक्षेप नहीं किया। अगर ऐसा होता तो जनजातीय परंपरा मिट चुकी होती। उनकी संस्कृति उजड़ गई होती। लेकिन 18वीं शताब्दी में आए मिशनरियों ने इसे काफी हद तक बदल दिया। धर्मांतरण की वजह से इन स्थानों पर जनजातीय आस्था कम हो गई है। गाँवों में नए-नए चर्च उग आए हैं। इसमें प्रार्थना होती है और भोले भाले जनजातीय लोगों को वहाँ बहला-फूसला कर धर्मांतरण कराया जाता है। आज जिस रफ्तार से इन क्षेत्रों में धर्मातरण कराया जा रहा है। अगर ये नहीं रुकी तो जनजातीय संस्कृति खत्म हो जाएगी।
हजारों सालों से जनजातीय- सनातन का रिश्ता आपसी मदद सहयोग और सह-अस्तित्व का रहा है। सनातनियों ने कभी भी लालच देकर या साजिश कर जनजातीय लोगों को धर्मांतरण के लिए मजबूर नहीं किया। ये खुद को जनजातीय नहीं बताते हैं और न ही आरक्षण समेत दूसरे सरकारी लाभ छीनने की कोशिश करते हैं। इनलोगों ने कभी भी जनजातीय अधिकार नहीं छीने। जल-जंगल-जमीन पर जनजातीय लोगों का ही वर्चस्व रहा।
मिशनरियों ने आस्था पर पहुँचाई चोट
ईसाई और जनजातीय संस्कृति में कोई समानता नहीं है। 1845 में मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत का प्रचार शुरू किया। इन 180 सालों में इनलोगों ने इनकी परंपरा और धार्मिक आस्था पर चोट किया। इनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की। यही वजह है कि झारखंड के कई हिस्सों में जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर ताला लग गया है। वहाँ धर्मांतरण की वजह से कोई पूजा करने नहीं जाता। यहाँ की जीवनशैली, रीति रिवाज, भाषा, संस्कृति जनजातीय पहचान सबकुछ बदल गया है।
कई अफ्रीकी देशों और लैटिन अमेरिकी देशों और आइलैंड में जनजातीय समुदाय की परंपरा और संस्कृति पूरी तरह बदल गई है। चाहे केन्या की संबुरु जनजाति हो या ब्राजील की वाई-वाई जनजाति, अयोरओ जनजाति सब अपनी सभ्यता-संस्कृति भूल चुके हैं और ईसाइयत के रंग में रंग गए हैं। मिशनरी भारत में भी यही करना चाहते हैं। धर्मांतरण कर पूरी जीवन शैली बदलना चाहते हैं।
ईसाईयों को अल्पसंख्यक का दर्जा भारत के संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत दिया गया है। उसके मुताबिक ये अपनी शिक्षण संस्थानों पर माइनॉरिटी संस्थान लिखते भी हैं। लेकिन जैसे ही फायदा लेने का वक्त आता है, ये खुद को जनजातीय कहने लगते हैं। जनजातीय आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी खाते हैं। उनकी दूसरी सुविधाओं का सुख भोगते हैं।
सबसे बड़ी बात है कि जनजातीय आरक्षित सीटों पर चुनाव भी लड़ते हैं। इस पर रोक लगाना जरूरी है। अगर किसी ने अपनी इच्छा से धर्मांतरण किया है, तो उसके ये पता होना चाहिए कि वे अब जनजातीय सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकते। उनकी कटैगरी ‘अल्पसंख्यक’ की है।
चर्च और मस्जिदों के निर्माण के लिए जमीन कैसे मिली
धर्मांतरण समाज के अस्तित्व से जुड़ा एक सामाजिक मुद्दा है। इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन हकीकत है कि वोटबैंक की राजनीति करने वाली पार्टियाँ इन्हें ऐसे ही चश्मे से देखती हैं और धर्मांतरण का विरोध नहीं करती। झारखंड का जनजातीय समुदाय बिरसा मुंडा, सिद्धू कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगग और वीर तेलंगा खड़िया जैसे महापुरुषों के दिखाए गए राह पर चलते हुए अगर अपनी पहचान नहीं बचा पाता है तो उसका अस्तित्व भी मिट जाएगा।
झारखंड में हजारों चर्च और मस्जिद बन गए हैं। जनजातीय समुदाय से जुड़ी सीएनटी-एसपीटी एक्ट के तहत जनजातीय लोगों की जमीन किसी को भी ट्रांसफर नहीं किया सकता। ऐसे में इनके गाँवों में चर्च और मस्जिद कैसे बन गए? आखिर इन्हें जमीन किसने दिए।
चंपई सोरेन का यह सवाल सीधे तौर पर शासन और प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है कि जब कानूनन जमीन का ट्रांसफर हो ही नहीं सकता, तो झारखंड के आदिवासी गाँवों में हजारों की संख्या में भव्य चर्च और विशाल मस्जिदें कैसे बन गईं? आखिर इन अल्पसंख्यक मजदही स्थलों के निर्माण के लिए जमीन किसने उपलब्ध कराई? यह विशुद्ध रूप से अल्पसंख्यक संस्थान हैं, जिनका आदिवासियों की मूल संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में जनजातीय समुदाय की सुरक्षित जमीन इन संस्थाओं के पास कैसे स्थानांतरित हो गई?
चंपई सोरेन ने माँग की है कि इस पूरे भू-घोटाले और जमीनों के अवैध हस्तांतरण की एक उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि इसके पीछे कौन सा बड़ा सिंडिकेट और प्रशासनिक मिलीभगत काम कर रही है।
1845 में झारखंड में आया ईसाई मिशनरी
झारखंड में ईसाई मिशनरियों का आगमन 1845 में हुआ था। रेवरेंड फादर गोस्नर के नेतृत्व में जर्मनी से चार मिशनरी रांची पहुँचे। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज-कल्याण का झाँसा देकर क्षेत्र में ईसाइयत का प्रचार-प्रसार शुरू किया। मुंडा, उरांव और दूसरे संथान जनजातियों को इनलोगों ने टारगेट किया।
इसके बाद एंग्लिकन SPG मिशनरी 1869 में छोटानागपुर में घुसा। इसके अलावा कैथोलिक (जेसुइट) मिशनरी 1868 में इन क्षेत्रों में आया। 1885 में फादर कॉन्स्टेंट लिवेन्स के आगमन के बाद धर्मांतरण में तेजी आई। 1873 में खुंटपानी में 6 मुंडा परिवारों के 28 लोगों का कोलकाता से आए आर्क बिशप स्टांइस ने बपतिस्मा कराया था। खुंटपानी झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिला का हिस्सा है।
यहाँ एक शिलापट्ट भी है, जिस पर उन लोगों के नाम दर्ज हैं जो पहली बार ईसाई बने। इसकी स्मृति में हर साल 8 नवंबर को यहाँ एक ‘तीर्थ मेला’ लगता है। इसमें झारखंड और आसपास के प्रदेशों के ईसाई धर्मांतरित लोगों का जमावड़ा ही नहीं लगता, बल्कि अच्छी-खासी संख्या में विदेशों से भी रोमन कैथोलिक धर्मावलंबी आते हैं।
झारखंड की तरह छत्तीसगढ़ भी बना धर्मांतरण का अड्डा
खुंटपानी की तरह ही मदकू द्वीप पर भी ईसाइयत का मेला लगता है। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का यह द्वीप शिवनाथ नदी की जलधारा से घिरा है। इसी द्वीप पर माण्डूक्य ऋषि ने ‘मुण्डकोपनिषद्’ की रचना की जिससे ‘सत्यमेव जयते’ निकला। हर साल फरवरी में इस द्वीप पर सबसे बड़ा जमावड़ा लगता है। यह जमावड़ा सप्ताह भर चलने वाले ‘मसीही मेला’ को लेकर लगता है। यह मेला साल 1909 से लग रहा है।
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के खड़कोना गाँव में भी एक शिलापट्ट लगी हुई है, जिस पर 56 लोगों के नाम हैं। 21 नवंबर 1906 को बपतिस्मा हुआ था। इस गाँव में धर्मांतरित लोगों का सालाना कार्यक्रम होता है। अब ये हाल है कि जिले का हर चौथा व्यक्ति ईसाई है। डेमोग्राफी काफी बदल चुका है। इस क्षेत्र में राजपरिवार दिलीप सिंह जूदेव के परिवार का काफी असर है इसके बावजूद धर्मांतरण काफी तेजी से हुआ है। राज परिवार के विरोध और घर-वापसी अभियानों के बावजूद मिशनरियों ने पैसे और रसूख के बल पर यहाँ की पूरी डेमोग्राफी बदल कर रख दी है।
आपदा में भी अवसर तलाश लेते हैं ईसाई मिशनरी
बाइबिल का हर भाषा में अनुवाद करने वाली अनफोल्डिंग वर्ल्ड नाम की मिशनरी के सीईओ डेविड रीव्स ने 2021 में कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए थे। उन्होंने बताया था कि कोरोना काल में करीब 1 लाख लोगों को ईसाई बनाया गया। हर चर्च को 10 गाँवों में प्रार्थना आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। महामारी के दौरान जब लोगों का मिलना-जुलना नहीं था तो फोन और व्हाट्सएप्प से उन तक प्रार्थनाएँ पहुँचाई गईं।
रीव्स के अनुसार भारत में 25 साल में जितने चर्च बने थे, उतने अकेले कोरोना काल में बनाए गए। भाजयुमो से जुड़े अभिषेक गुप्ता ने ऑपइंडिया को बताया था, “ईसाई मिशनरी इसी तरह लैंड जिहाद करती है। जहाँ खाली जगह दिखी ये क्रॉस गाड़ देते हैं। चर्च बना लेते हैं। कुछ समय बाद प्रशासनिक मिलीभगत से वहाँ जाने का रास्ता तैयार हो जाता है और फिर प्रार्थना होने लगती है। बाद में आप जितना विरोध कर लें प्रशासन कब्जा नहीं हटाता।”
अमेरिका का एक और संगठन जोशुआ प्रोजेक्ट की शुरुआत 1995 में हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार यह संगठन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में जनजातीय लोगों को धर्मांतरित कर उनकी जमीन पर चर्च बना रहा है। 2011-12 में इन चारों राज्यों में लगभग 12,000 चर्च थे जो अब बढ़कर 25,000 को पार कर चुके हैं। यह सब उन इलाकों में हो रहा है जहाँ बाहरी व्यक्ति जमीन तक नहीं ले सकते, लेकिन मिशनरियाँ लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं।
जोशुआ प्रोजेक्ट केवल जनजातीय समूह तक ही नहीं सिमटा हुआ है। भारत की अलग-अलग जातियों और जनजातीय समूहों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट के पास देश की 2272 जातियों-जनजातियों के आँकड़े हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट बताता है कि वह इनमें से अभी 2041 जातियों तक नहीं पहुँच सका है। वहीं 103 जातियों में ईसाइयत का प्रभाव डालने में यह सफल रहा है। इनमें एक छोटी संख्या में लोग ईसाइयत को मानने लगे हैं। वहीं 128 जाति समूह ऐसे हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर ईसाइयत की घुसपैठ हो गई है।
जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा बताता है कि उसने कई जातियों में 10%-100% तक ईसाइयत में धर्मांतरण करवाया है। जिन जातियों में बड़ी संख्या में ईसाइयत में धर्मांतरण हुआ है, उनको अलग नाम दे दिया गया है। तेलंगाना के मडिगा और माला समुदाय में 21000 की आबादी को ईसाइयत में बदल कर उसे ‘आदि क्रिश्चियन’ का नाम दिया गया है। बोडो समुदाय की 15.7 लाख आबादी में से लगभग 1.5 लाख आबादी को ईसाइयत में लाया गया गया है।
ईसाई मिशनरियाँ भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भी ठीक इसी भयावह पैटर्न को दोहराना चाहती हैं। धर्मांतरण के कारण आज झारखंड के कई गाँवों में सदियों पुराने जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर सन्नाटा पसर गया है, कई जगहों पर तो ताले लग चुके हैं क्योंकि वहाँ अब पूजा करने वाला कोई बचा ही नहीं है। जनजातीय लोगों की पारंपरिक जीवनशैली, उनकी अनूठी भाषा, लोकगीत, रीति-रिवाज और उनकी मूल पहचान को ईसाइयत के चर्च तंत्र ने पूरी तरह निगल लिया है।
पहले ईसाई धर्मांतरण, अब मुस्लिमों की घुसपैठ
ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में झारखंड का संथाल परगना है। इतना प्रभावित कि इस क्षेत्र में ST से ईसाई बने लोगों का जन प्रतिनिधि चुना जाना सामान्य सी बात है।
संथाल परगना इस समय बांग्लादेशी-रोहिंग्या मुस्लिमों की घुसपैठ से डेमोग्राफी बदलाव को लेकर चर्चित है। इस क्षेत्र से सरना (जनजातीय समाज का धार्मिक स्थल) विलुप्त हो रहे हैं, मस्जिद-मजार उग रहे हैं। जनजातीय समाज अपनी जमीन-रोजगार से लेकर बेटी तक गँवा रहे हैं।
घुसपैठिए पहले गाँव में आते हैं। किसी तरह रहना शुरू करते हैं। किसी जनजातीय महिला को प्रेमजाल में फँसा कर निकाह करते हैं और फिर उसकी संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं। हर गाँव में इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है और बढ़ रहा है मस्जिदों-मदरसों की संख्या। ईसाइयत से प्रभावित झारखंड में अब इस्लाम का जनजातीय क्षेत्रों में भी तेजी से फैलाव हो रहा है।
केंद्र सरकार ने जनजातीय समुदाय की विशिष्ट संस्कृति, उनकी अनोखी परंपराओं और उनके व्यक्तिगत कानूनों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्हें समान नागरिक संहिता (UCC) के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया है। जब असम में इसे लागू किया गया, तो वहाँ भी जनजातीय समुदायों को विशेष छूट दी गई। सरकार का यह कदम यह दिखाता है कि देश के कानून निर्माता भी आदिवासियों की विशिष्ट जीवनशैली को संरक्षित करना चाहते हैं।
लेकिन चंपई सोरेन का कहना है कि एक तरफ तो सरकारें कानून बनाकर आदिवासियों को संरक्षित कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर पैठ बनाकर जिस तरह से मिशनरियों और घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों का धड़ल्ले से धर्मांतरण कराया जा रहा है, उससे कानून का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो रहा है। अगर यह धर्मांतरण नहीं रुका, तो वह दिन दूर नहीं जब कागजों पर तो कानून रहेगा, लेकिन जमीन पर अपनी विशिष्टता बचाने वाला कोई मूल आदिवासी बचेगा ही नहीं।
झारखंडी अस्मिता का सबसे बड़ा सवाल
यह मुद्दा किसी दलगत राजनीति या वोटबैंक का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर ‘झारखंडी अस्मिता’ और इस वीर भूमि के महान स्वतंत्रता सेनानियों भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगत और वीर तेलंगा खड़िया की विरासत को बचाने का है।
यदि आज का जनजातीय समाज इन महापुरुषों के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अपनी मूल पहचान, अपनी सरना संस्कृति और अपनी प्रकृति पूजक जीवनशैली को नहीं बचा पाता है, तो आने वाले समय में झारखंड से आदिवासियों का नामोनिशान और उनका गौरवशाली अस्तित्व हमेशा के लिए मिट जाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने इसी संजीदगी और दूरदर्शिता के साथ इस मुद्दे को उठाकर पूरे देश का ध्यान झारखंड के इस गंभीर संकट की ओर खींचा है।


