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जिस हिंदू की हत्या हुई, अपराधी भी वही: वाह रे सपाइयों तुम्हारें आगे तो गिरगिट भी शरमा जाए, असद के खिलाफ बोलने में जबान कटती है क्या?

हमने अमीक की प्रोफाइल भी खँगाली कि क्या उन्हें सूर्या की हत्या का कोई दुख था, क्या उन्हें असद से कोई नाराजगी थी। जवाब है- नहीं। असद के खिलाफ, या सूर्या की निर्मम हत्या पर अमीक ने कुछ भी नहीं लिखा है।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सूर्या चौहान की कट्टरपंथियों ने बकरीद के दिन बेरहमी से हत्या कर दी। उसकी चिता की आग अभी ठंडी भी ना हुई थी कि समाजवादी पार्टी ने उस पर राजनीतिक करनी शुरू कर दी। राजनीति, फिर भी संयमित शब्द लगता है, अगर साफ शब्दों में कहें तो सपा ने हत्यारों के लिए ही बैटिंग करनी शुरू कर दी। सपा ने ये दिखाने की कोशिश की जो मारा गया, वो इसलिए मारा गया क्योंकि मारा जाना ही उसकी नियति थी। ऐसे लोगों के लिए हिंदुओं की नियति मारा जाना ही है।

खैर, वापस मुद्दे पर लौटते हैं और समझते हैं कि सपा ने किस तरह झूठ के सहारे एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है। सपा के प्रवक्ता अमीक जामेई ने X पर एक पोस्ट किया। अमीक ने लिखा, “असद का एनकाउंटर हुआ सूर्य (सूर्या) के परिवार को बेशक न्याय मिला जो मिलना चाहिए था।” अब ये पढ़कर आपको लगेगा कि सपा ने तुष्टिकरण करना छोड़ दिया है लेकिन अगली ही लाइन में अमीक ने जो लिखा, उसे पढ़कर आपको शायद इस सपाई सोच से घिन आएगी।

अमीक ने लिखा, “पर जाँच हो तो पता चलेगा कि गाजियाबाद में नाबालिग असद और सूर्य दोस्त थे, एक ही गली मे रहते थे, सूर्य (सूर्या) के असद की बहन से दोस्ती थी। जो असद को पसंद न था जिसे लेकर विवाद चल रहा था। जिसके बाद असद के परिवार ने मुहल्ला बदल लिया पर दोस्ती का सिलसिला न रुका यह मुद्दा सूर्य (सूर्या) की जान पर बन आया।”

अमीक ने मनगढ़ंत कहानी के जरिए झूठ परोसने की पूरी कोशिश की। या यूँ कहें कि यह दिखाने की कोशिश की कि हिंदू युवक ने एक मुस्लिम युवती से दोस्ती कैसे कर ली? अमीक ने साफ तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि यह मामला ‘कथित दोस्ती’ या व्यक्तिगत विवाद से जुड़ा था, मानो इससे हत्या की गंभीरता किसी तरह कम हो जाती हो। लेकिन क्या यह हत्या को जायज ठहराने की कोशिश नहीं है?

मान लीजिए, तर्क के लिए ही सही कि यदि किसी युवक और युवती के बीच संबंध थे तो क्या इसका अर्थ यह हो जाता है कि किसी की जान ले ली जाए? यदि किसी परिवार या व्यक्ति को किसी संबंध पर आपत्ति थी, तो उसके लिए कानूनी रास्ते मौजूद थे। बातचीत, शिकायत, पुलिस, कानून देश में इन सबकी व्यवस्था है। लेकिन किसी युवक को निर्ममता से चाकूओं से गोदकर मार देना? यह कैसे जायज हो सकता है। यह कट्टरता का चरम है और अमीक ने इसे भी जायज बताने की कोशिश की है।

सिर्फ इतना ही नहीं, इस पोस्ट में अमीक ने एक और झूठ भी परोसा है। अमीक ने लिखा, “हम देखते है की उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार हत्यारा PDA यानि दलित हो मुसलमान हो ब्रह्मण या यादव हो तो उसे मीडिया द्वारा खूब हेट का मुद्दा बनाया जाता है क्या यह सही नहीं की असद को पुलिस ने डिटेन कर रखा था बाद मे उसका फुल एनकाउंटर हुआ?”

यानी जो ‘पाप’ अमीक ने पहली लाइन में ‘न्याय’ लिखकर किया था अब वो उसको पूरी तरह धो रहे हैं। पुलिस भी अमीक के लिए झूठी हो गई है। हमने अमीक की प्रोफाइल भी खँगाली कि क्या उन्हें सूर्या की हत्या का कोई दुख था, क्या उन्हें असद से कोई नाराजगी थी। जवाब है- नहीं। असद के खिलाफ, या सूर्या की निर्मम हत्या पर अमीक ने कुछ भी नहीं लिखा है।

असद के एनकाउंटर की पूरी कहानी पुलिस खुद ही बता चुकी है जिसे आप नीचे लिंक में पढ़-सुन सकते हैं।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुए सूर्यप्रताप उर्फ सूर्या चौहान हत्याकांड और उसके मुख्य आरोपी असद के पुलिस एनकाउंटर के बाद अब इस मामले पर गंभीर राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता अमीक जामेई द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, जिसमें अमीक जामेई के बयान को विभाजनकारी बताया जा रहा है।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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