डिफेंस दलालों के साथ राहुल गाँधी के रिश्तों का खुलासा: वाड्रा, जमीन से लेकर राफेल-यूरोफाइटर तक का है घालमेल

कहा जाता है कि राहुल गाँधी आज राफेल पर इसीलिए इतने हमलावर हैं क्योंकि यूरोफाइटर के साथ बंद कमरों में बैठकें चल रही थीं। संजय भंडारी और राहुल गाँधी के बीच क़रीबी सम्बन्ध होने का ख़ुलासा होने के बाद इस बात को और बल मिलता है।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पिछले काफी समय से राफेल सौदे पर सवाल पूछ रहे हैं। वह पूछ रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अनिल अंबानी को टोकरी भरकर पैसा क्यों दिया? ये आँकड़ा राहुल गाँधी के मूड के हिसाब से ₹1,30,000 करोड़ रूपए से लेकर ₹1,00,000 करोड़ और ₹30,000 करोड़ तक बदलते रहते हैं। ये आँकड़े स्पष्ट रूप से गलत हैं, क्योंकि राफेल सौदे में ऑफसेट कारोबार में रिलायंस की हिस्सेदारी केवल 800 करोड़ रुपए के आसपास है। वह बार-बार पूछते हैं कि विमानन क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं रखने वाले रिलायंस को राफेल सौदा क्यों मिला है? राहुल का यह दावा भी गलत है क्योंकि रिलायंस, जेट या उसके किसी भी हिस्से को नहीं बना रहा है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सरकार से जितने भी सवाल पूछ रहे हैं, वे सभी पूरी तरह से उनकी कल्पना पर आधारित है, जिसमें सच्चाई बिल्कुल भी नहीं है। लेकिन अब समय आ गया है कि टेबल को उलट दिया जाए, और राहुल गाँधी के कुछ सवालों के जवाब खुद दिए जाएँ।

हालाँकि अरूण जेटली ने संसद में इस बात का संकेत दिया था कि कॉन्ग्रेस शासन के दौरान जब MMRCA के लिए नीलामी प्रक्रिया चल रही थी, उसी समय समानांतर बैकरूम में यूरोफाइटर के लिए रिश्वत को लेकर सौदे की बात भी चल रही थी। राफेल और यूरोफाइटर टाइफून ने शुरुआती 6 दावेदारों में से, नीलामी प्रक्रिया के अंतिम दौर में प्रवेश किया था, जिसमें से आखिरकार, राफेल को 2012 में तकनीकी मानकों पर चुना गया था।

राहुल गाँधी को लेकर न केवल अफवाहें सामने आई थी कि वो जर्मनी में यूरोफाइटर अधिकारियों से मिले थे, बल्कि एक बार संजय भंडारी के साथ उनका लिंक सामने आने के बाद तो अनुत्तरित प्रश्न और भी बड़े स्तर पर पहुँच गए। बता दें कि संजय भंडारी, रॉबर्ट वाड्रा के करीबी दोस्त और हथियारों के सौदागर हैं। वर्ष 2012 से 2015 तक संजय भंडारी राफेल सौदे में ऑफ़सेट पार्टनर बनने की पैरवी कर रहे थे और दसौं (Dassault) ने उन्हें शामिल करने से मना कर दिया था। वास्तव में, 126 राफेल जेट की खरीद से संबंधित एक फाइल रक्षा मंत्रालय से गायब हो गई थी और यह बाद में सड़क पर पाई गई थी। संजय भंडारी पर ये आरोप है कि फाइल उन्होंने ही चुराई थी और वो इस फाइलों की फोटोकॉपी करवाकर रक्षा ठेकेदारों को देते थे।

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अब तक तो केवल लिंक केवल रॉबर्ट वाड्रा और संजय भंडारी के बीच जोड़ा गया था। मगर अब, ‘ऑपइंडिया’ ने कुछ संदिग्ध भूमि सौदों के माध्यम से राहुल गाँधी को संजय भंडारी से जोड़ने वाली जानकारी तक पहुँच बनाई है, जिससे सवालों के बादल और भी घने हो गए हैं।

बता दें कि ये कागजात 3 मई 2017 और 4 मई 2017 को एक एच एल पाहवा पर किए गए ईडी की खोज से संबंधित हैं। ये भूमि सौदे राहुल गाँधी और एच एल पाहवा के बीच हैं, जिन्हें एक सी सी थम्पी द्वारा वित्त पोषित किया गया था, जिनके संजय भंडारी के करीबी वित्तीय संबंध हैं।

एचएल पाहवा के साथ राहुल गाँधी की लैंड डील

प्रवर्तन निदेशालय द्वारा एचएल पाहवा से जब्त की गई फाइल्स से पता चला है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने हसनपुर, पलवल में 6.5 एकड़ ज़मीन ख़रीद रखी है। इस ख़रीद का विवरण इस प्रकार है- रजिस्ट्रेशन डीड 4780, तारीख़- 3 मार्च, 2008, मूल्य- मात्र ₹26,47,000।इस ज़मीन को ₹ 24 लाख के चेक पेमेंट द्वारा ख़रीदा गया था। इस चेक पर 12 जनवरी 2008 की तारीख़ अंकित है। इसके अलावा ₹2,47,000 के एक अन्य चेक से भुगतान किया गया था। इस पर 17 मार्च 2008 की तारीख़ अंकित है।

सेल डीड का पेज-1
राहुल गाँधी और एचएल पाहवा के हस्ताक्षर सहित सेल डीड

लेकिन, जब्त की गई ईडी फाइलों के सी पेज 57 से पता चलता है कि इस लेन देन पर स्टांप शुल्क नकद में भुगतान किया गया था और पाहवा द्वारा इसे वापस नहीं लिया गया था। इससे ये बात साफ हो जाती है कि वो खरीदार कोई और नहीं, बल्कि खुद राहुल गाँधी थे। जिन्होंने स्टांप शुल्क का भुगतान किया था।

इन फ़ाइलों में एक और एक और खुलासा (फ़ाइल सी का पृष्ठ 60) यह हुआ है कि पाहवा यह जमीन ₹33,22,003 में बेचना चाहते थे, लेकिन वो इसे ₹26,47,000 में बेचने के लिए राजी हो गए।

एचएल पाहवा के साथ अन्य संदिग्ध लेन-देन

साल 2009 के हरियाणा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने फरीबाद के नव-निर्मित निर्वाचन क्षेत्र, तिगाँव से पहली बार रियाल्टर ललित नागर को खड़ा किया। इसके बाद 2012 में टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में खबर आई, “ललित नागर के भाई महेश नागर ने रॉबर्ट वाड्रा की ओर से न केवल हरियाणा में बल्कि राजस्थान में भी जगह खरीदी है।”

3 मार्च 2008 की यह डीड दर्शाती है कि हरियाणा के पलवल जिले के हसनपुर गाँव में 9 एकड़ ज़मीन को गुड़गांव निवासी एच एल पाहवा द्वारा रॉबर्ट वाड्रा को ₹36.9 लाख में बेचा गया था। इस डीड में, पाहवा के हस्ताक्षर भी है, लेकिन खरीददार में रॉबर्ट की जगह महेश के हस्ताक्षर हैं। यहाँ खरीददार के नाम में ‘Robert Vadra through Mahesh Nagar’ लिखा हुआ है, जो बताता है कि वाड्रा ने अपनी पॉवर ऑफ ऑटरनी महेश नागर में निहित की हुई थी।

रॉबर्ट वाड्रा के सेल डीड का पेज-1
रॉबर्ट वाड्रा का सेल डीड

इसी तरह, राजस्थान के बीकानेर जिले की एक डीड इस बात को बताती है, कि बस्ती गाँव की गंगानगर तहसील में 4.63 एकड़ की जमीन को अप्रैल 2009 में 42 साल की सरिता देवी बोथारा द्वारा रियल अर्थ एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को बेचा गया था। खास यह है कि इस कंपनी के डायरेक्टर रॉबर्ट वाड्रा थे और इस जमीन की खरीदादरी को भी वाड्रा की ओर से महेश नागर ने ही किया था।

इसके अलावा प्रियंका गाँधी भी एचएल पाहवा से कुछ समय पहले जमीन की खरीदारी कर चुकी हैं। जिसके बारे में हम पहले बता चुके हैं कि किस तरह 28 अप्रैल 2006 को, प्रियंका गाँधी वाड्रा ने एचएल पाहवा से 2 चेक में ₹15,00,000 देकर जमीन खरीदी थी। और फिर 17 फरवरी 2010 को, इसे वापस एचएल पाहवा को कई चेक के माध्यम से ₹84,15,006 में बेच दिया। एच एल पाहवा ने प्रियंका गाँधी को 22 मई 2009 से 11 सितंबर 2009 के बीच में 5 किश्तों में पैसे दिए। इसके पीछे का कारण पैसों की कमी को बताया गया।

हैरान करने वाली बात यह है कि एक व्यक्ति जो आए दिन जमीनों की खरीद-बिक्री करता है और अपनी ही जमीन को बेचकर दोबारा उसे 5 गुना अधिक दामों पर खरीदता है, उसके पास देने के लिए पैसे नहीं होंगे क्या?

प्रियंका गाँधी वाड्रा की सेल डीड

यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि एचएल पाहवा ने अक्सर जमीनों को नकद में खरीदा था और ऐसे मामले भी देखे गए हैं जहाँ उसने नेगेटिव कैश बैलेंस होने के बावजूद भी जमीन की खरीददारी की। अब आश्चर्य होगा कि पाहवा ने जमीन की खरीददारी कैसे की जब उसपर नेगेटिव कैश बैलेंस था? तो बता दें कि प्रवर्तन निदेशालय की फाइलों ने बताया है कि पाहवा को सीसी थम्पी द्वारा ₹54 करोड़ दिए गए थे।

कौन है सीसी थम्पी?

हाल ही में रॉबर्ट वाड्रा से सीसी थम्पी के साथ उनके संबंधों को लेकर पूछताछ की गई थी। प्रवर्तन निदेशालय को शक है कि 2009 में हुए एक पेट्रोलियम करार के लिए एक शारजाह स्थित कम्पनी के माध्यम से डील फाइनल किया गया था। इस कम्पनी के संयुक्त अरब अमीरात स्थित एनआरआई व्यवसायी सीसी थम्पी द्वारा नियंत्रित होने की बात सामने आई थी। वाड्रा से सीसी थम्पी और संजय भंडारी के साथ लंदन में बेनामी संपत्ति रखने के बारे में भी पूछताछ भी की गई थी। संयुक्त अरब अमीरात में थम्पी की स्काईलाइट्स नाम की कम्पनी है और भारत में स्काईलाइट्स प्राइवेट लिमिटेड के वाड्रा के साथ सम्बन्ध की बात सामने आई है। राजस्थान के बीकानेर में एक अवैध ज़मीन सौदे को लेकर भी ये कम्पनी प्रवर्तन निदेशालय के रडार पर है। इसकी जाँच चल रही है।

सीसी थम्पी पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के उल्लंघन का मामला चल रहा है। यह मामला सैंकड़ों करोड़ रुपयों की हेराफेरी से जुड़ा है। ईडी ने पिछले साल 288 करोड़ रुपये से अधिक के सौदों में दिल्ली-एनसीआर और उसके आसपास कृषि और अन्य भूमि के अवैधअधिग्रहण के लिए उसे कारण बताओ नोटिस दिया था। सीसी थम्पी, रॉबर्ट वाड्रा और संजय भंडारी ‘क़रीबी दोस्त’ हैं।

सीसी थम्पी और संजय भंडारी के बीच के सम्बन्ध

  1. कम्पनी सिन्टैक, जिसमें संजय भंडारी की अच्छी-ख़ासी हिस्सेदारी है- एक पेट्रोलियम करार और एक रक्षा सौदे को लेकर जाँच के दायरे में है। रक्षा सौदा यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान 2005 में फाइनल किया गया था जबकि पेट्रोलियम करार 2009 में यूपीए के दूसरे कार्यकाल के दौरान मंज़ूर हुआ था।
  2. ऐसी 4 अन्य सम्पत्तियाँ भी हैं जो जाँच के दायरे में हैं। इन सम्पत्तियों को दो करारों के दौरान यूके की एक कम्पनी से मिले अवैध रुपयों से ख़रीदा गया था। करार फाइनल कराने के लिए मिली घूस की इस राशि को ‘किकबैक’ कहा जाता है।
  3. ‘किकबैक’ की राशि $49,99,969 है। GBP 19,22,262.44 की राशि 10 दिसंबर 2009 को यूके स्थित
    सिन्टैक के बैंक खाते में हस्तांतरित कर दी गई थी। पेट्रोलियम करार ठीक होने के तुरंत बाद ऐसा किया गया था। यह वह धन था जिसका उपयोग लंदन में वर्टेक्स के शेयरों के माध्यम से घर ख़रीदने के लिए किया गया था।
  4. वास्तव में, जाँच एजेंसियों ने पाया है कि घर खरीदने के तुरंत बाद वाड्रा ने भंडारी के एक रिश्तेदार के साथ मकान का नवीनीकरण कराने की शुरुआत की और भंडारी ने उस कार्य के लिए धन उपलब्ध कराया। इस कार्य के लिए GBP 60,000 की राशि उपलब्ध कराइ गई थी।
  5. मकान के जीर्णोद्धार के बाद वाड्रा ने उस संपत्ति को बेचा जो उनके पास वर्टेक्स और सीसी थम्पी के मालिकाना हक़ वाली स्काईलाइट्स एफजेडई के माध्यम से आई थी। वर्टेक्स द्वारा प्राप्त किए गए ‘sale Consideration’ को 30 जून 2010 को वापस साइन्टैक को हस्तांतरित कर दिया गया था। इस राशि को फिर फ्यूचर की ट्रेडिंग कम्पनी, चॉइस पॉइंट ट्रेडिंग और जैन ट्रेडिंग को भुगतान किया गया था।
  6. स्काइलाइट्स इंवेस्टमेंट्स की कोई व्यावसायिक गतिविधि अब तक सामने नहीं आई है और इसका बैंक खाता 31 सितंबर 2009 को खोला गया था। हालाँकि, कंपनी ने दिसंबर 2010 में अपने निवेश के रूप में विला ई-74 और फ्लैट 12 एलर्टन हाउस, लंदन का खुलासा किया था।
  7. भले ही स्काईलाइट इन्वेस्टमेंट की कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं थी, लेकिन दुबई में विला ई-74 और एलर्टन हाउस, लंदन की ख़रीद से पहले उसके खाते में एक बड़ी राशि जमा की गई थी।

ये रहा निष्कर्ष

जो तथ्य सामने आए, वे हैं:

  1. राहुल गाँधी ने कथित रूप से कम कीमत पर एचएल पाहवा से जमीन खरीदी।
  2. रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा भी एचएल पाहवा से जमीन खरीदी गई थी। कई मामलों में, एचएल पाहवा द्वारा इन्हीं ज़मीनों को बढ़े हुए मूल्य पर वापस खरीदा गया था। वो भी तब जबकि पाहवा का कैश बैलेंस निगेटिव में था।
  3. इस खरीद पर साफ-सुथरा दिखाने के लिए, एचएल पाहवा ने सीसी थम्पी से पैसे लिए थे।
  4. सीसी थम्पी और संजय भंडारी करीबी दोस्त हैं। उनके बीच कई वित्तीय लेनदेन भी हुए थे।
  5. संजय भंडारी एक हथियार डीलर है और रॉबर्ट वाड्रा का करीबी दोस्त भी। उसे रक्षा सौदे और पेट्रोलियम सौदे में कमिशन (किकबैक) भी मिला था।
  6. कमिशन (किकबैक) की इसी राशि से संजय भंडारी ने रॉबर्ट वाड्रा से बेनामी संपत्ति खरीदी थी, यहाँ तक ​​कि उसने इन संपत्तियों के नवीनीकरण (रेनोवेशन) के लिए भी भुगतान किया था।
  7. इस संपत्ति को फिर सीसी थम्पी को बेचा गया था।
  8. फिलहाल ईडी थम्पी के साथ रॉबर्ट वाड्रा की निकटता की जाँच कर रहा है।
  9. ये सभी सौदे कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान हुए थे।
  10. संजय भंडारी एक हथियार डीलर है। 2012 से 2015 के बीच राफेल सौदे में ऑफ़सेट पार्टनर बनने की पैरवी संजय भंडारी कर रहा था लेकिन राफेल बनाने वाली कंपनी दसौं ने उसे अपने साथ करने से मना कर दिया था।
  11. 126 राफेल जेट की खरीद से संबंधित फाइल रक्षा मंत्रालय से गायब हो गई थी और बाद में इसे सड़क पर पाया गया था। आरोप है कि भंडारी ने फाइल चुराई थी। आरोप यह भी है कि भंडारी महत्वपूर्ण फाइलों की फोटोकॉपी करता था और जिन डिफेंस कॉन्ट्रैक्टरों के साथ उसके संबंध अच्छे थे, उन्हें वो कॉपी उपलब्ध करवाता था।
  12. अरुण जेटली ने आरोप लगाया था कि जब कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान राफेल को अंतिम रूप दिया जा रहा था, तो यूरोफाइटर के बारे में बैकरूम बातें हुआ करती थीं।
  13. ऐसी अफवाहें भी हैं कि राहुल गाँधी जर्मनी में यूरोफाइटर के प्रतिनिधियों से मिले थे।
राहुल गाँधी और हथियार डीलर संजय भंडारी के बीच लिंक का कच्चा-चिट्ठा

ऊपर की हर कड़ी को जोड़ कर देखें तो यह निष्कर्ष निकालना आसान है कि रॉबर्ट वाड्रा की तरह राहुल गाँधी भी हथियार डीलर संजय भंडारी से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। संजय भंडारी जो न केवल गाँधी परिवार का करीबी है, बल्कि राफेल सौदे में जिसे दसौं ने फटकार भी लगाई थी। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में संजय भंडारी को कथित तौर पर रक्षा और पेट्रोलियम सौदों में कमिशन (किकबैक) भी मिला था।

आरोप है कि राहुल गाँधी फिलहाल राफेल सौदे पर इसलिए हमलावर हुए जा रहे हैं, क्योंकि हथियारों के डीलर संजय भंडारी और राहुल गाँधी के सीधे संपर्क के कारण यूरोफाइटर के साथ बैकरूम चर्चा UPA सरकार के दौरान और भी अधिक तेज हो गई थी। हाल ही में, यह भी पता चला है कि क्रिश्चियन मिशेल, जो कि अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले में एक बिचौलिया था, वो भी यूरोफाइटर की पैरवी कर रहा था और राफेल डील के खिलाफ था। डिफेंस डील में परत-दर-परत खुलते राज और फिलहाल राहुल गाँधी द्वारा राफेल सौदे पर जोर-शोर से हमला करना, कॉन्ग्रेस को उस ओर ले जा रहा है जहाँ वो खुद राहुल गाँधी के हथियार डीलर संजय भंडारी संग रिश्ते की बात और सच्चाई पर खुलासा करने को मजबूर करेगी।


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