Tuesday, June 25, 2024
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4 बीवी नहीं रख पाएँगे मुस्लिम, प्रॉपर्टी में बेटियों का भी होगा बराबर का अधिकार: समान नागरिक संहिता लागू होने पर ऐसे खत्म होगा ‘शरिया का शासन’

समान नागरिक संहिता के लागू होने से जो सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, वह है न्यायालयों पर दबाव में कमी। अलग-अलग धर्मों से जुड़े मामलों के कारण न्यायालयों को दबाव पड़ता है और समय पर अधिक लगता है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (MHA Amit Shah) ने मध्य प्रदेश के भोपाल में कहा था कि भाजपा के घोषणा-पत्र में किए गए वादों के अनुसार राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370, तीन तलाक का काम पूरा हो गया और अब समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की बारी है। उन्होंने यह भी कहा कि इसे सभी भाजपा शासित राज्यों में लागू किया जाएगा और फिलहाल उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Uttarakhand CM Pushkar Singh Dhami) के नेतृत्व में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जा रहा था।

समान नागरिक संहिता की जरूरत देश को क्यों है, सबसे पहले इसे समझना आवश्यक है। देश में हिंदू और मुस्लिमों के अलग-अलग सिविल लॉ होने की वजह से न्यायालयों में भी कई बार असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में कई हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने देश में समान नागरिक संहिता की वकालत की है। संविधान का अनुच्छेद 44 भी देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कहता है। 

क्या है समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता एक ऐसा कानून है, जो देश के हर समुदाय पर समान रूप लागू होता है। व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, जाति का हो या पंथ का हो, सबके लिए एक ही कानून होगा। अंग्रेजों ने आपराधिक और राजस्व से जुड़े कानूनों को भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) 1872, भारतीय अनुबंध अधिनियम (ICA) 1872, विशिष्ट राहत अधिनियम 1877 आदि के माध्यम से सारे समुदायों पर लागू किया, लेकिन शादी-विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति, गोद लेने आदि से जुड़े मसलों को धार्मिक समूहों के लिए उनकी मान्यताओं के आधार पर छोड़ दिया।

आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हिंदुओं के पर्सनल लॉ को खत्म कर दिया, लेकिन मुस्लिमों के कानून को ज्यों का त्यों बनाए रखा। हिंदुओं की धार्मिक प्रथाओं के तहत जारी कानूनों को निरस्त कर हिंदू कोड बिल के जरिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू नाबालिग एवं अभिभावक अधिनियम 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956 लागू कर दिया गया। ये कानून हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख आदि पर समान रूप से लागू होते हैं।

मुस्लिमों का कानून पर्सनल कानून (शरिया), 1937 के तहत संचालित होता है। इसमें मुस्लिमों के निकाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, संपत्ति का अधिकार, बच्चा गोद लेना आदि आता है, जो इस्लामी शरिया कानून के तहत संचालित होते हैं। अगर समान नागरिक संहिता लागू होता है तो मुस्लिमों के निम्नलिखित कानून बदल जाएँगे।

मुस्लिमों में चार शादियों पर रोक

मुस्लिम पर्सनल लॉ, जिसे शरिया कानून भी कहा जाता है, इस्लामिक किताब कुरान और हदीसों पर आधार है। कुरान में मुस्लिमों को चार शादियाँ करने को वैध माना गया है। इसके आधार पर मुस्लिम चार निकाह को वैध मानते हैं। वहीं, सामान्य भारतीय कानून के तहत कोई भी व्यक्ति सिर्फ एक शादी कर सकता है। विशेष परिस्थितियों में दूसरी शादी की इजाजत दी जा सकती है। समान नागरिक संहिता लागू होने पर इसका सीधा असर मुस्लिमों की वैवाहिक स्थिति पर पड़ेगा।

गुजारा भत्ता एवं तलाक के बाद एकमुश्त राशि

केंद्र की मोदी सरकार ने साल 2019 में मुस्लिम महिलाओं के लिए अभिशप्त बने तीन तलाक को खत्म कर दिया था। वहीं, घरेलू हिंसा सहित कई मामलों में न्यायालय ने मुस्लिमों को भत्ता देने का निर्णय इस आधार पर दिया है कि ये सिविल दायरे में नहीं, बल्कि आपराधिक मामले के तहत आते हैं। हालाँकि, मुस्लिमों में तलाक के बाद जो एकमुश्त राशि दी जाती है, यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद उसमें भी बदलाव आएगा।

मुस्लिमों में निकाह के दौरान मेहर की रकम देने का रिवाज है। ये मेहर बेहद ही मामूली होते हैं। कई मामले में तो ये 2-3 हजार तक सीमित होते हैं। ऐसे में जब मुस्लिमों को शरीयत के तहत तलाक दी जाती है तो एकमुश्त गुजारा भत्ता (Alimony) के रूप में उसी मेहर की रकम को लौटा दिया जाता है, जो एक या दो महीने के खर्च के बराबर भी नहीं होता है। ऐसे में एक समान नागरिक संहिता लागू होता है तो एकमुश्त राशि या उचित मासिक गुजारा भत्ता देना होगा।

इस मामले में 1985 का शाह बानो केस अहम है। 60 साल की शाह बानो को उसके पति ने तीन तलाक कहकर घर से निकाल दिया। इसके बाद वह कोर्ट पहुँची। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि शाह बानो तलाक के बाद अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के कड़े विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने संसद के जरिए इस फैसले को पलट दिया था।

बाद में एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इद्दत की अवधि के बाद मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता दिए जाने का फैसला सुनाया है। इद्दत तलाक के बाद की वो अवधि होती है, जिसमें मुस्लिम महिला दूसरी शादी नहीं कर सकती। हालाँकि, शरिया कानून के तहत इद्दत के बाद गुजारा भत्ता देना हराम है।

संपत्ति में बेटियों को देना होगा बराबर का अधिकार

भारतीय संविधान एवं कानून के तहत पैतृक संपत्ति पर जितना अधिकार पुरुषों का है, उतना ही महिलाओं का भी है। यदि कोई महिला अपने पैतृक संपत्ति में दावा करती है तो उसे बराबर का हिस्सा देना होगा। वहीं, शरिया कानून में इसके उलट है। शरिया कानून के तहत, पैतृक संपत्ति में पुरुष के अधिकार का आधा महिलाओं का हिस्सा होता है। यानि महिलाओं को बराबर का हिस्सेदार नहीं नहीं माना जाता।

वहीं, ससुराल पक्ष में मुस्लिम महिला का संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। उसे निकाह के दौरान मिली मेहर की राशि, मिले उपहार, पिता की तरफ से मिले धन पर ही उसका अधिकार होता है। अगर वह तलाक लेती है तो सिर्फ इन्हीं संपत्तियों को वह शरिया कानून के तहत पाने की अधिकारी है। अगर शौहर चाहे तो अपनी इच्छा के आधार पर उसे कुछ दे सकता है।

मुस्लिमों द्वारा गोद लिए बच्चे भी होंगे संपत्ति के वारिस

हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956, के तहत दत्तक पुत्र को गोद लेने वाले माता-पिता की संपत्ति में एक सामान्य पुत्र की तरह अधिकार होता है। वहीं, मुस्लिम शरिया कानून के तहत ऐसा नहीं है। इस्लाम में गोद लिए गए बच्चों को संपत्ति में अधिकार नहीं होता।

दारुल उलूम देवबंद ने भी इस संबंध में फतवा जारी किया था। शरिया कानून के आधार पर देवबंद ने कहा था कि गोद लिए गए बच्चे का अधिकार असली बच्चे के समान नहीं होगा। उसे संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा और ना ही उसे किसी मामले में वारिस बनाया जा सकता है। इसमें आगे कहा गया है कि सिर्फ गोद ले लेने से वास्तविक बच्चे का अधिकार उस पर लागू नहीं हो जाते। परिपक्व होने के बाद उसे शरिया का पालन करना होगा।

शरिया कानून के अनुसार, दत्तक बच्चे को हिबा (उपहार) दिया जा सकता है, लेकिन वारिस नहीं बनाया जा सकता। इस्लाम के अनुसार, गोद लिया जाने वाले बच्चे को लेकर ‘महरम’ का सवाल खड़ा हो जाता है। इस्लाम में महरम उसे कहते हैं, जिससे शादी नहीं की जा सकती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी कोर्ट में कहा था कि इस्लामी कानून गोद लिए बच्चे को जन्म दिए गए बच्चे के समान नहीं मानता।

तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी

हिंदू कानून के मुताबिक माता-पिता के तलाक की स्थिति में बच्चे की कस्टडी हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप ऐक्ट 1956 के तहत निर्धारित होती है। तलाक के वक्त अगर बच्चे की उम्र 5 साल से कम है तो उसे उसके माँ के हवाले किया जाएगा। अगर बच्चा है 9 साल से ऊपर का हो गया है तो वह कोर्ट में बता सकता है कि वह अपनी माँ के साथ जाना चाहता है या अपने पिता के साथ। इसके आधार पर उसे माँ या पिता की कस्टडी में दी जाएगी।

वहीं, मुस्लिम शरिया कानून के तहत बच्चे की उम्र 7 साल होने तक उसकी कस्टडी माँ के पास होती है। अगर माँ उसे रखने या उसका पालन पोषण करने में असमर्थ है तो उस बच्चे की कस्टडी उसके अब्बू को दे सकती है। वहीं, ईसाइयों में कस्टडी को लेकर कोई नियम निर्धारित नहीं है।

दारुल कजा या शरिया कोर्ट का अंत

इस्लाम में शरिया कानून के आधार पर महिला, घरेलू एवं संपत्ति से संबंधित विवादों को दारूल कजा या शरिया अदालत के माध्यम से निपटाने का प्रचलन है। हाल के वर्षों में मुस्लिमों के सिविल मामलों से संबंधित विवादों का निपटारा करने के लिए शरिया कोर्ट देश के हर जिले में स्थापित करने की बात भी सामने आई थी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसकी घोषणा की थी। हालाँकि, घोषणा की साथ ही देश भर में बवाल हो गया था।

अगर देश में समान नागरिक संहिता लागू होता है कि इन शरिया अदालतों की कोई वैल्यू नहीं रह जाएगी और इन पर पूरी तरह लगाम लग जाएगा। अन्य समुदायों के तरह ही मुस्लिमों के आपराधिक और सिविल मामलों का हर निर्णय अदालतों के तहत ही मान्य होंगे, जो कि अभी भी मान्य हैं।

न्यायपालिका पर से बोझ की कमी

समान नागरिक संहिता के लागू होने से जो सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, वह है न्यायालयों पर दबाव में कमी। अलग-अलग धर्मों से जुड़े मामलों के कारण न्यायालयों पर भारी दबाव पड़ता है और मामले का निपटान करने में समय भी अधिक लगता है। अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद अदालतों में लंबित पड़े मामलों को निपटाने में आसानी होगी।

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सुधीर गहलोत
सुधीर गहलोत
इतिहास प्रेमी

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