मेरी सहेली का बॉयफ़्रेंड संघी, इसलिए शादी-बर्थडे में नहीं बुलाई: दुःखी हैं The Print की स्तम्भकार!

बिना किसी सिर-पैर के दावा किया कि दिल्ली की आवासीय कॉलोनियों में 'एंटी-मुस्लिम' भावनाएँ भड़काईं जा रहीं हैं।

The Print की स्तम्भकार और स्वघोषित कॉन्ग्रेस ‘फैन‘ ज़ैनब सिकंदर ने ट्विटर पर दुःख जताया है कि उनकी दस साल से ज्यादा की फ्रेंड के संघी बॉयफ़्रेंड ने उन्हें शादी और बर्थडे पार्टी में नहीं आने दिया। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी दोस्त दिल्ली के ‘पॉश’ इलाके में रहती है।

निखिल वागले के प्रलाप में मिलाया सुर

दरअसल ट्विटर पर निखिल वागले ने हफिंगटन इंडिया की एक रिपोर्ट शेयर की थी, जिसमें बिना किसी सिर-पैर के दावा किया गया है कि दिल्ली की आवासीय कॉलोनियों में ‘एंटी-मुस्लिम’ भावनाएँ भड़काईं जा रहीं हैं।

इसी के सुर में सुर मिलाते हुए ज़ैनब ने उस ट्वीट को रीट्वीट किया। साथ में बताया कि उनकी दस साल से ज्यादा दोस्त रह चुकी लड़की ने, जो उच्च-मध्यम वर्ग की थी, उन्हें अपने बर्थडे की पार्टी में नहीं बुलाया क्योंकि उस दोस्त के नए-नए बने ‘संघी’ बॉयफ्रेंड को मुस्लिम पसंद नहीं थे। ज़ैनब के अनुसार उस दोस्त ने खुद यह कबूल किया। साथ ही ज़ैनब ने दावा किया कि उन्हें उस दोस्त की शादी में भी नहीं बुलाया गया।

पवित्र किताब पर सन्नाटा

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश में बढ़ती नफ़रत के लिए ज़िम्मेदार बताने वालीं ज़ैनब को जब ‘पवित्र किताब’ के कुछ विवादित हिस्सों की याद दिलाई गई तो वह सन्नाटा मार कर बैठ गईं। लेखक संक्रांत सानु ने उनके ट्वीट पर तंज़ करते हुए ‘पवित्र किताब’ के मूल, अरबी रूप में से स्क्रीनशॉट पोस्ट किया और कहा कि यह असहिष्णु किताब भी “संघियों” ने ही लिखी होगी! उन्होंने यह भी लिखा कि एकेश्वरवाद में दूसरों के ‘नकली देवताओं’ से नफ़रत ज़रूरी है, जो एकेश्वरवादी पंथों के ‘ईश्वर का आदेश’ है, कोई आकस्मिक चीज़ नहीं।

उन्होंने ‘लोग सही तरह से समझे नहीं’ के प्रोपेगंडा को भी ठेंगा दिखाते हुए याद दिलाया कि आइएस का मुखिया बगदादी इस्लामिक स्टडीज़ में पीएचडी था, तालिबान के नेताओं ने अपनी पूरी ज़िंदगी ‘पवित्र किताब’ को पढ़ने में लगा दी थी। इसके बाद उनके द्वारा निकाले गए निष्कर्ष अगर गलत हैं, तो यह तो बड़ी समस्या की बात है।

अंत में उन्होंने ज़ैनब को सलाह दी कि उनके जैसे ‘लिबरल’ मुस्लिम अगर इस्लामी असहिष्णुता के ख़िलाफ़ लड़ने में अपना वक्त खपाएँ, बजाय ‘संघियों’ को कोसने के, तो वे समाज में एक सकारात्मक योगदान करेंगे।

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"हिन्दू धर्मशास्त्र कौन पढ़ाएगा? उस धर्म का व्यक्ति जो बुतपरस्ती कहकर मूर्ति और मन्दिर के प्रति उपहासात्मक दृष्टि रखता हो और वो ये सिखाएगा कि पूजन का विधान क्या होगा? क्या जिस धर्म के हर गणना का आधार चन्द्रमा हो वो सूर्य सिद्धान्त पढ़ाएगा?"

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