वामपंथी पोर्टलों पर नैरेटिव बदलने की कोशिशें जारी हैं। वो यह सोच रहे हैं कि साल भर बाद हिन्दू समाज और रिसते घावों को चाटती दिल्ली भूल गए होंगे कि साल भर पहले उसके सीने पर छुरा मारने वाले, और कपड़ों पर आग लगाने वाले लोगों की पहचान क्या थी।
खुद को 'किसान का बेटा' बता इस्तीफा देने वाले DIG लखविंदर सिंह जाखड़ असल में घूसखोरी का आरोपित है, निलंबित किया जा चुका है। वाह-वाह करने वाली मीडिया के लिए यह कोई तथ्य नहीं है।
मध्य प्रदेश में दोस्तों की आपसी लड़ाई में देवराज अनुरागी की मौत हो गई। मीडिया इसे 'दलित युवक' को भोजन छूने पर 'ऊँची जाति के लोगों ने' पीट-पीटकर मार डाला, बताकर बेच रहा है।
“समस्या यह है कि पूरा तंत्र ऐसा बना हुआ है जिसमें देश विरोधी ताकतों को फलने-फूलने का मौक़ा मिलता है। इस भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध हमारी संख्या बहुत कम है लेकिन मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि एक न एक दिन बदलाव आएगा।"
द वायर सरीखे एजेंडापरस्त मीडिया समूहों के लिए इस श्रेणी का गिरगिटनुमा विश्लेषण या दावा कोई नई बात नहीं है। प्रोपेगेंडा ही इनका एकमात्र उद्देश्य है भले उसके लिए स्क्रीन पर कुछ अनर्गल ही क्यों न परोसना पड़े।