Sunday, April 18, 2021
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कुछ याद आ रहा है वो माह था दिसम्बर: जब मुस्लिम भीड़ें और वामपंथी देश को फूँकने के लिए साथ आए

जामिया दंगों के वो तीन दिन: हम यह बताते रहेंगे कि कैसे मानवाधिकारों की कविताओं, तिरंगे झंडे, भारत के नक्शे और मुस्लिम औरतों-बच्चों की आड़ में पूरे देश को जलाने की साजिश रची गई थी।

हमें भी जलवागाह-ए-नाज़ तक ले चलो मूसा
तुम्हे ग़श आ गया तो हुस्न-ए-जाना कौन देखेगा

यहाँ ‘जलवागाह-ए-नाज’ था जामिया नगर और ‘हुस्न-ए-जाना’ था आग की उठती लपटें, पत्थर बरसाती इस्लामी भीड़ और बदहवास दौड़ते आम नागरिक। 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन विधेयक कानून बन कर राष्ट्र के सामने आ चुका था, और इसी दौरान पूरे देश को दहलाने की साजिशें रची जा रही थीं। इसका अंत 23-24-25 फरवरी के दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों और नरसंहार के रूप में हुआ।

आज तमाम वामपंथी पोर्टल एक साल पहले की वारदातों को याद कर रहे हैं। साल भर पहले ‘हिन्दुओं से आजादी‘ के नारे लगाने से ले कर ‘अब गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’ कह कर, तब अनाम (और अब आरोपित) शरजील इमाम के मुँह से इस्लामवादियों की साजिशों का खुलासा हो रहा था कि उनके तथाकथित आंदोलन का मकसद ‘CAA’ नहीं है, बल्कि वो पूरे देश के पाँच सौ शहरों को बंद करना चाहते हैं, और पूरे उत्तरपूर्व को भारत से अलग करने की इच्छा रखते हैं।

यही वो समय था जब ऑल्ट न्यूज ने नासा प्रदत्त सॉफ्टवेयर द्वारा जामिया के मुस्लिम पत्थरबाजों के हाथ के पत्थरों को वॉलेट और फोन कह कर प्रपंच फैलाया था और आगजनी करने के बाद लाइब्रेरी में पनाह खोजती मुस्लिम भीड़ को सुरक्षा बलों ने कैम्पस में घुस कर पकड़ा था क्योंकि पेट्रोल बम और पत्थरों से लैस भीड़ यूनिवर्सिटी को आग लगाते या वहाँ की छात्राओं का रेप ही कर डालते, कोई नहीं जानता।

जामिया नगर और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में तीन दिन जो दंगे हुए, उस पर वामपंथी मीडिया ने लगातार प्रपंची रिपोर्टिंग शुरु कर रखी थी क्योंकि उन्हें आने वाले दंगों में मुस्लिम भीड़ों के सुनियोजित षड्यंत्रों को भी तो डिफेंड करना था। उन्होंने वही किया भी, लेकिन सत्य छुपता नहीं। ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, लदीदा, सफूरा, उमर खालिद, फारुक फैजल समेत कई चेहरों के साथ उत्तरपूर्व दिल्ली के मौजपुरी, जाफराबाद, चाँदबाग, करावलनगर, गोकुलपुरी, मोहनपुरी आदि इलाकों में पूरा घटनाक्रम स्मार्टफोन के दौर में लाइव स्ट्रीम हो रहा था।

जलवागाह-ए-नाज और हुस्न-ए-जाना की कहानी

जामिया नगर फूँका जा रहा था, बसों में आग लगाई गई ताकि उसके सीएनजी सिलिंडर फटें तो पूरे इलाके को अपने साथ ले कर बर्बाद हों। लेकिन दिल्ली पुलिस की बहादुरी की दाद देनी होगी कि तमाम नकारात्मक रिपोर्टिंग के बावजूद, उन्होंने हिम्मत के साथ उस आग पर काबू पाया, भले ही मनीष सिसोदिया जैसे लोग उनके द्वारा ढोए जा रहे पानी को पेट्रोल बता कर फेक न्यूज फैलाते रहे।

यही था वो जलवागाह जिस पर शरजीलों, खालिदों, लदीदाओं, जरगरों, हुसैनों को नाज था। जलवा यह था कि शहर को फूँकने की तैयारी थी, पाँच सौ शहरों के मुस्लिम नागरिकों को चैलेंज किया जा रहा था कि क्या वो सड़कों पर आ कर पूरा शहर जाम नहीं कर सकते। इस्लामी आतंकियों और दंगाइयों को लिए हिंसा और आगजनी ही तो सामाजिक खूबसूरती के पैमाने हैं।

शरीर पर बम लपेट कर फट जाना हो, या फिर शहरों को आग लगा देना हो, यही तो वो हुस्न-ए-जाना है, जिस पर ये आहें भरते हुए ‘तौबा-तौबा’ कह कर नजर लगने से बचाते हैं। इन दंगाइयों को आग से अत्यधिक प्रेम है, तभी तो इन्होंने अपने घरों पर पत्थर और पेट्रोल बमों की शीशियाँ इकट्ठा कर रखा था।

ऊपरी शेर में ‘हमें भी’ का जो सर्वनाम प्रयुक्त हुआ है, वो बकैत कुमार जैसों के लिए है जो इन दंगाइयों की हर करतूत को, कानून की जानकारी होने के बाद भी जायज ठहरा रहे थे कि यह तो ‘विरोध के स्वर’ हैं। जबकि विरोध का ‘स्वर’ आग बन कर बसों और घरों में घुस रहा था, वो नहीं दिखा। ये सारे प्रोपेगेंडाबाज लोग स्टूडियो से बैठकर इस पूरे प्रकरण में दंगाइयों को विद्यार्थी, पत्थर को वॉलेट, हिंसा को मतभिन्नता और आगजनी को ‘एक समाज के भीतर का गुस्सा’ कह कर जायज ठहराते रहे।

इस शेर में बकैत कुमार जैसे यही तो कहते हैं कि ‘हमें भी वहाँ तक ले चलो, कहीं दंगाइयों को गश्त लग गया तो जलते शहर को कौन डिफेंड करेगा!’ जाहिर सी बात है कि अगर आपके पास सत्य और घटना का विवरण नहीं हो तो आप प्रपंच ठीक से गढ़ नहीं पाएँगे। आपके पास जब जानकारी हो कि जब बस जल रहा था, तो पुलिस वाले भी वहीं थे, तो आप कह सकते हैं कि पुलिस वाले भी तो आग लगा सकते हैं। आपके पास जानकारी हो कि गोली चलाने वाला शाहरुख़ दाढ़ी रखता है, तभी तो आप उसे अनुराग मिश्रा बुलाएँगे।

बकैत कुमारों और उनके गिरोह को स्टेबल डेमोक्रेसी, यानी स्थिर लोकतंत्र अच्छा लग ही नहीं सकता क्योंकि लोकतंत्र में तो विरोध और आंदोलन होते रहना चाहिए। बकौल रवीश कुमार, विरोध का न होना मरे हुए लोकतंत्र की निशानी है। जबकि, यह जरूरी नहीं है कि लोकतंत्र को जीवित मानने के लिए बिना बात का विरोध चलता रहे।

अराजकतावादी वामपंथ और पत्थर-बम ले कर सड़कों पर अकारण उतरी मजहबी भीड़ वह कॉकटेल है, जिसकी तासीर आग की है। वामपंथियों का मूल लक्ष्य ही होता है कि हर जगह इतनी तबाही फैला दो कि सब कुछ बर्बाद होने के बाद तुम्हें ही एक विकल्प मान लिया जाए, क्योंकि तुम कभी अपनी लोकप्रियता के कारण सत्ता में आ ही नहीं सकते। तुम सत्ता में चुन कर इसलिए नहीं आ सकते क्योंकि तुम्हारी प्रवृत्ति में ही आगजनी, हिंसा और सरकारों के खिलाफ विद्रोह समाहित है।

वामपंथियों ने भारत में केरल और बंगाल में हिंसा का नंगा नाच करने के बाद, आगे बढ़ते लोकतंत्र में राष्ट्रव्यापी स्तर पर कुछ खास कर नहीं पाए हैं। चूँकि अब उनका सत्य हर जगह बाहर है, और उनके द्वारा चलाई गई सत्ताओं को वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने आँक लिया है, अतः उनके पास समर्थन में कोई बता नहीं।

तब ये लोग मुस्लिम छात्रों को, अज्ञानी मजहबी भीड़ों को अपना अजेंडा चलाने के लिए उकसाते हैं। पोस्टर ये बनाते हैं, नुक्कड़ नाटक ये करते हैं, भीड़ों को लिए जामिया में कंट्रोल रूम के विचार ये देते हैं, और पैदल सिपाही के तौर पर मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आती आवाज एक भीड़ को सड़क पर उतार देती है।

इसके दूसरे स्तर पर मीडिया का समर्थन मिल जाने से इन्हें यह उम्मीद रहती है कि वैसे भी हैं तो खलिहर और निकम्मे ही, जेल में भोजन का इंतजाम हो ही जाता है, दंगे करा देने से चर्चा में रहते ही हैं, और जेल में जब तक रहते हैं ‘एक्टिविस्ट’ और ‘छात्र’ का तमगा छाती पर चिपका ही रहता है। इन्होंने वो भी समाँ देखा है जब बाईस साल की कानूनी और अदालती प्रक्रिया के बाद फाँसी पर चढ़ाए गए मुसलमान आतंकी की बरसी यह कह कर मनाई जाती है कि ये तो एक्सट्राजुडिशियल किलिंग है!

इसी विश्वास के साथ दिसम्बर 2019 में PFI समेत अन्य इस्लामी संगठनों से फंडिंग और समर्थन के साथ, तीन तलाक, आर्टिकल 370, रामजन्मभूमि और NRC-CAA के झटकों से बिलबिलाए एक समुदाय ने दिसम्बर में दिल्ली समेत पूरे देश को दंगों की आग में झोंकने की योजना बनाई। भला हो हमारे वीर पुलिस जवानों का, जिन्होंने जामिया के दंगों को तीन दिन में बंद कर दिया, और फिर उत्तरपूर्व दिल्ली के दंगों को भी उतने ही दिन में समेट दिया।

वरना इन वामपंथी लम्पटों और इस्लामी भीड़ों की जिद और हिंसा की बलि कितने हिन्दू चढ़ते, और कितने जिले फूँके जाते, इसकी कल्पना रीढ़ में ठंढी सिहरन उतार देती है।

जामिया दंगों के एक साल

इसलिए, उन दिनों को याद करना आवश्यक है ताकि हम भूल न जाएँ कि इसके पीछे कौन थे, मीडिया में कौन इस हिंसा को डिफेंड कर रहा था, ये कैसे हुआ था, उस दिन क्या-क्या हुआ था। उन तीन दिनों की कहानी को विस्तार से याद करना आवश्यक है क्योंकि हिन्दुओं में त्वरित स्मृतिलोप की आवृत्ति देखी गई है।

(नीचे की सामग्री मेरी आने वाली, अप्रकाशित, पुस्तक से ली गई है)

15 दिसम्बर का दिन दिल्ली में बहुत बड़ी घटना को अंजाम देने के उद्देश्य से याद रखा जाएगा। जामिया नगर में, एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत, दंगाइयों ने दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की तीन बसों को आग लगा दिया। तीनों ही बसों में CNG के बड़े-बड़े सिलिंडर थे, जो कि अगर फट जाते तो उस सघन आबादी वाले इलाके का क्या हाल होता, यह आप सोच सकते हैं। इस घटना के साथ ही, दो और घटनाओं का जिक्र आवश्यक हो जाता है ताकि इनकी योजना पर से पर्दा हटे। 23-24-25 फरवरी के उत्तरपूर्व दिल्ली दंगो के दौरान भजनपुरा इलाके के पेट्रोल पम्प में आग लगाई गई थी, और चाँद बाग में हिन्दू की पुत्री के विवाह के रसोई घर में, जहाँ कई कमर्शियल सिलिंडर रखे हुए थे, उस पर पेट्रोल बम फेंके गए थे। हर जगह इन दंगाइयों ने शुरु से ही सिलिंडर या अतिप्रज्ज्वलनशील ईंधन के भंडारों को निशाना बनाया ताकि एक-दो पेट्रोल बम की बोतल से हजारों जानें ली जा सके!

जामिया नगर में जब उपद्रवियों ने इन बसों को आग के हवाले कर दिया तब उसमें ड्राइवर और अन्य कर्मचारी मौजूद थे। सारे स्टाफ किसी तरह अपनी जान बचा कर भागे। ये बहुत बड़े स्तर पर हो रही हिंसा का एक बड़ा हिस्सा था। पत्थरबाजी, पेट्रोल बम फेंकना और लाठी-डंडों से पुलिस पर लगातार हमले हो रहे थे। तब, पुलिस ने उपद्रवियों को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले छोड़े। जामिया के छात्रों ने बसों को जलाए जाने में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया और कहा कि वो सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के पक्षधर थे, उनका हिंसा से कोई लेना-देना नहीं थ।

इसी समय, दिल्ली सरकार की तरफ से एक फेकन्यूज को हवा दी गई जिसमें दंगाइयों से निपटते पुलिसकर्मियों के बारे में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्विटर पर कुछ फोटो शेयर कर दावा किया कि ‘दिल्ली पुलिस भाजपा के इशारों पर बसों को आग के हवाले कर रही है।’ ये दावा उन्होंने एक वीडियो को शेयर कर के किया जिसमें एक पुलिसकर्मी पीले रंग के डब्बे में कोई तरल पदार्थ ले कर जाते हुए दिखता है जो वो जलती हुई बस पर डालता है। सिसोदिया ने बड़ी ही चालाकी से उस तरल पदार्थ को तेल/पेट्रोल मान लिया और कहा कि पुलिस ही आग लगा रही है ताकि जामिया के बच्चों को फँसाया जा सके। इसी से संबंधित एक और खबर आई कि जहाँ ये वारदात हुई, उसी इलाके में मनीष सिसोदिया की पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह भी वहाँ देखे गए थे।

इसी दिन जामिया मिल्लिया इस्लामिया इलाके में चल रही नारेबाजी का एक वीडियो सामने आया। इसमें जामिया के छात्रों की भीड़ बहुत ही स्पष्ट स्वरों में हिन्दुओं के खिलाफ नारेबाजी करते सुने जा सकते थे। हिन्दूघृणा से लबालब इन नारों का एक राजनैतिक मसले के विरोध में क्या औचित्य था शायद जामिया का ही कोई पीएचडीधारक बता पाएगा। वीडियो में जामिया के छात्र सामूहिक तौर पर, पहले से ही हिन्दूघृणा से सने ‘आजादी’ के नारे लगा रहे थे, और उसी में आगे उन्होंने वह छलावा भी त्याग दिया और सीधे-सीधे ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगाने लगे।

13 और 15 दिसम्बर को जामिया इलाके में जो हुआ, उस पर जब दिल्ली पुलिस ने जून 4, 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया, तो पूरी योजना सामने आ गई। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा एक सुनियोजित घटना थी। क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

तैयारी का आलम यह था कि 17 दिसम्बर को इस हिंसा के बारे में खुलासा करते हुए साउथ ईस्ट दिल्ली के एडिशनल डीसीपी कुमार ज्ञानेश ने कहा, “पुलिस ने जब आँसू गैस के गोले छोड़े, तब उससे बचने के लिए प्रदर्शनकारियों ने भींगे हुए कम्बलों का प्रयोग किया। ये उनके पास बड़ी तादाद में थे। इससे पता चलता है कि वो पूरी तैयारी के साथ आए थे।” उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं था, बल्कि जो कुछ भी हिंसक वारदातें हुईं उसकी पहले से योजना बनाई गई थी। यह भी बयान जारी किया गया कि जामिया हिंसा के दौरान कम से कम दस हार्डकोर अपराधी वहाँ मौजूद थे। जाहिर है कि स्थानीय लोगों/विद्यार्थियों के समर्थन या सहयोग के बिना न तो 750 फर्जी पहचानपत्र बनाए जा सकते हैं, न ही PFI के 150 कट्टरपंथी छुपे रह सकते हैं।

इसी दिन, जामिया यूनिवर्सिटी की दीवारों पर पीएम मोदी की तुलना हिटलर से करते हुए चित्र बनाए गए थे और उनके ख़िलाफ़ घृणित नारे लिखे गए। वहीं, अमित शाह के मरने की दुआ करते हुए कैंपस की दीवारों पर लिखा गया कि ‘अमित शाह दुनिया छोड़ो’। ये बात और है कि जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा यही कहता पाया गया कि जो भी हुआ उसमें, या जामिया की हिंसा में छात्र-छात्रा मौजूद नहीं थे, ये बाहरी लोगों का काम है। रविवार (15 दिसंबर) को जामिया के जनसम्पर्क अधिकारी अहमद अज़ीम ने कहा, “विश्वविद्यालय परिसर में न तो प्रदर्शन हुआ और न ही यह विरोध जामिया का था। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने इसमें भाग लिया। हमने छात्रों के साथ बातचीत की, अब वे शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे हैं।”

उसी दिन (15 दिसंबर) को एक नई नौटंकी ने जन्म लिया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के छात्रों को एक बहाना मिल गया कि वो भी ‘विरोध प्रदर्शन’ करें। इस तरह के विरोध कि ‘हम जामिया के छात्रों के साथ हैं’ कई यूनिवर्सिटी में होने लगे, लेकिन कहीं भी ये हिंसक नहीं हुए। वामपंथी गैंग का मकड़जाल इतना व्यापक है कि वो ह्यूस्टन और MIT तक में तख्तियों के साथ चार बच्चों को खड़े कर के अपने विरोध को वैश्विक ही नहीं ब्रह्मांड के स्तर का विरोध बना लेते हैं। ख़ैर, AMU में भी विरोध का मुद्दा यही था कि दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई पुलिस कार्रवाई गलत और बर्बरतापूर्ण थी।

इस पर आक्रोश जताते हुए प्रदर्शन के लिए निकली छात्रों की भीड़ परिसर का मुख्य गेट तोड़कर AMU सर्किल पर आ गई। पुलिस ने इन्हें पानी की बौछार कर रोकने की कोशिश की, लेकिन छात्रों ने रुकने के बजाय पुलिस पर पथराव किया। हालाँकि, जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने लाठीचार्ज कर छात्रों को दौड़ाने का प्रयास किया। मगर इस बीच छात्र पथराव के अलावा गोली भी चलाने लगे। इस हिंसक और उन्मादी प्रदर्शन में प्रॉक्टोरियल टीम, DIG डॉ. प्रीतेंदर सिंह, SP (सिटी) अभिषेक कुमार के अलावा RAF व पुलिस के 20 जवान घायल हो गए। इसके अलावा 30 छात्रों को भी चोटें आई। हालात काबू में पाने के लिए पुलिस आँसू के गोले छोड़ते हुए कैंपस में अंदर घुस गई। रात 11 बजे तक चले इस टकराव के बाद पुलिस ने एएमयू के अंदर से 8 युवकों को गिरफ्तार किया और देखते ही देखते पूरा कैंपस छावनी में बदल गया।

15 की रात को AMU की ताजातरीन नौटंकी से प्रभावित हो कर लखनऊ के नदवा कॉलेज में भी ‘जामिया के छात्रों के समर्थन में’ के नाम पर भी माहौल बिगड़ने की खबर आई। कॉलेज के छात्रों ने भारी पथराव किया और रविवार की देर रात गेट पर खड़े होकर नारेबाजी भी की थी। हालाँकि उस समय सूचना मिलते ही आधा दर्जन थानों की पुलिस ने मौक़े पर पहुँचकर सभी छात्रों को तुरंत गेट के अंदर कर दिया था। मगर 16 दिसंबर की सुबह फिर बड़ी तादाद में छात्र इकट्ठा हुए और वापस पथराव किया। इसके बाद मौक़े पर मौजूद पुलिस कॉलेजों के गेट को बंद कर दिया, और कुछ समय में स्थिति को नियंत्रण में लिया।

वहीं, पश्चिम बंगाल में तीसरे दिन (16 दिसंबर को) भी मजहबी उन्माद के शिकार दंगाइयों ने रेलवे संपत्ति को अपना निशाना बनाना जारी रखा। उन्होंने 16 को मुर्शिदाबाद के पास रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ और आगजनी की, पटरियों पर टायर जला कर ट्रेनों को रोका और पथराव किया। मौक़े पर पहुँची पुलिस के वाहन को भी फूँक दिया। अगले दिन, रेलवे ने बंगाल में इन तीन दिनों में हुई हिंसा, लूटपाट, आगजनी से हुए नुकसान को ₹250 करोड़ का बताया, जिसके और भी बढ़ने की आशंका जताई गई। 17 दिसंबर को ईस्टर्न रेलवे ने बताया कि उसके 15 स्टेशनों को तबाह कर दिया गया। कई स्टेशनों पर कैश बॉक्स को लूट लिया गया। कई इलाक़ों में ‘रेल रोको अभियान’ और बंद का आयोजन किया गया, जिससे साउथ-ईस्ट रेलवे को 16 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ।

13 और 15 के दंगों के बाद भी, जामिया का माहौल सामान्य नहीं हो पा रहा था। अब यहाँ के प्रदर्शनकारियों ने मीडिया को निशाना बनाना शुरू किया। इसमें समाचार एजेंसी ANI के दो कर्मचारियों पर 16 दिसंबर की दोपहर को हमला कर दिया गया, जब वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों को कवर करने गए थे। उसी दिन ABP न्यूज़ की पत्रकार से बदसलूकी का भी वीडियो सामने आया था। इसके पहले भी जब 13 दिसंबर को प्रदर्शन शुरू हुए थे तो एक समूह ने पत्रकारों पर हमला कर दिया था, घेर लिया था और उनके काम में बाधा डालने की भरपूर कोशिश की थी- उनके कान पर खड़े हो कर चिल्ला रहे थे, ताकि पत्रकार न अपने फ़ोन पर बात कर पाए, न ही माइक में कुछ बोल पाए। इसके अलावा ज़ी न्यूज़ के पत्रकार राहुल सिन्हा ने दावा किया था कि अन्य दो मीडिया कर्मियों को मारने-पीटने के बाद उनके चैनल के पत्रकारों को बाकायदा निशाना बनाकर ढूँढ़ा जा रहा था।

इसी हिंसक दौर में आपको शाहीन अब्दुल्लाह का नाम याद कर लेना चाहिए। ये वही आदमी है, या फिर छात्र कह लीजिए, जो पुलिस से बचते हुए वहीं जाकर छिपता है जहाँ लदीदा और आयशा रहती है। लदीदा और आयशा खुल्लमखुल्ला जिहाद और इस्लामी युद्ध की चेतावनी देने वाली वो जिहादनें हैं जिन्होंने सीधा कहा कि इस ‘प्रदर्शन’ का नारा सेकुलर हो ही नहीं सकता और जिन्हें उनके सहयोग में आना है उन्हें इस्लामी नारे लगाने ही होंगे।

17 दिसंबर को एक जहरीला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो का चेहरा उस दिन किसी को पता नहीं चल पाया, लेकिन बाद इसकी पहचान शरजील इमाम के रूप में हुई। शरजील इमाम शाहीन बाग का मास्टरमाइंड भी कहा जाता है। इसके कुछ विषैले वीडियो जिसमें विशुद्ध हिन्दूघृणा, महात्मा गाँधी को फासीवादी कहना, संविधान और न्यायपालिका को इस्लामविरोधी होने की बातें कही गई हैं, वो दिल्ली दंगों की पृष्ठभूमि में वैचारिक ईंधन प्रदान करने वाला बन कर सामने आया। हालाँकि, 28 जनवरी को जहानाबाद (बिहार) से गिरफ्तारी के बाद, जिसमें उस पर उन्मादी भाषण और देशद्रोह की धाराएँ लगी थी, शरजील ने यह आरोप लगाया कि उसके वीडियो से छेड़छाड़ हुई है। 29 जुलाई, 2020 को सुबह खबर आई कि सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री ने शरजील के वीडियो में उसी की आवाज होने की बात कही है।

इस वीडियो के बारे में उस वक्त लिखा गया था कि एक शख्स (जिसकी पहचान नहीं हो पाई है) मुसलमानों को सड़कों पर आने और दिल्ली में चक्का जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखाई दे रहा था। वीडियो में शरजील इमाम छात्रों की एक भीड़ को ललकारते और दुत्कारते हुए कहता है, “हमारी ख्वाहिश और हमारी आरजू ये है कि दिल्ली में चक्का जाम हो। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में, जहाँ मुसलमान कर सकता है। मुसलमान हिन्दुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। अब उसमें रोड ब्लॉक करने वाला कौन है? वो भाजपा नहीं है, वो कॉन्ग्रेस नहीं है, वो है जमीयत उलेमा-ए-हिंद, वो है जमात-ए-इस्लामी।”

आगे वीडियो में शरजील इमाम उनके मुस्लिम होने पर लानतें भेजते हुए कहता है, “क्या मुसलमानों की इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद किया जा सके। यूपी में शहरी मुसलमानों की आबादी 30 फीसदी से ऊपर है। क्या आपको शर्म नहीं आती? अरे भाई शर्म करो, आप यूपी में चक्काजाम क्यों नहीं कर सकते? कैसे चल रहा है वह शहर? बिहार का वह इलाका जहाँ से मैं आता हूँ, वहाँ ग्रामीण मुस्लिम आबादी 6% है, जबकि शहरी मुस्लिम आबादी 24% है। हिन्दुस्तान का मुसलमान शहरी है। वो शहर में रहता है। शहर बंद कीजिए और जो रास्ते में आता है, उसे मना कीजिए, उसे भगाइए।” उसने कुरान का हवाला देते हुए कहा था कि जो उन्हें (मुसलमानों को) अपने घर से निकाले, उसे वो अपने घर से निकाल दें।

17 दिसंबर को ही सीलमपुर में दोपहर एक बजे से एक उन्मादी भीड़ सड़कों पर उतर आई और नए नागरिकता (संशोधन) कानून को हटाने की माँग करने लगी। तात्पर्य यह है कि ऊपर से विरोध और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का चोला पहना था। लेकिन, थोड़ी देर देखते ही देखते प्रदर्शन ने उग्र रूप से ले लिया। इसके बाद पथराव शुरू हो गया। उग्र भीड़ ने छोटे बच्चों से भरे स्कूल बस को भी नहीं छोड़ा। बस में मौजूद स्टाफ ने जान पर खेल कर बच्चों की रक्षा की वरना यह मजहबी उन्माद से ग्रस्त भीड़ उनका क्या करती यह आप समझ सकते हैं। सीलमपुर से जाफराबाद जाने वाली ‘66 फुटा रोड’ पर आवागमन को पूरी तरह से बंद कर दिया। स्थिति बिगड़ते देखकर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आँसू गैस के गोले दागे। ‘इंडिया टुडे’ से बातचीत में दिल्ली एक एक उपद्रवी ने कहा: “हमारे क्षेत्र में कई दिनों से अनाउंसमेंट हो रही थी कि कि मंगलवार को इतने बजे एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होगा। कई लोगों को पहले से ही पता था और जिन्हें नहीं पता था, उन्होंने मस्जिदों से अनाउंस कर के कहा गया कि आप सड़क पर उतरो।”

यहाँ भी ‘प्रदर्शन’ का तरीका बिलकुल उसी चरणबद्ध प्रक्रिया से संचालित हो रहा था जैसा कि बाकी जगह में हुआ: पत्थर इकट्ठा कर के रखना, पेट्रोल बम तैयार रखना, पुलिस दिखे तो हमला करना, DTC की बसों को फूँकना/क्षति पहुँचाना। ये सारी चीजें सड़क पर चलती भीड़ स्वतः इकट्ठा नहीं कर सकती। पुलिस के कई अधिकारियों ने, इन दंगों पर बात करते हुए, और दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की योजना पर चार्जशीट में भी, लिखा है कि इस तरह की वस्तुएँ (जो हथियार की तरह, इस बड़ी मात्रा में प्रयोग में आती हैं) वो कोई राह चलते न तो इकट्ठा कर सकता है, न चुन सकता है, न बोतल में पेट्रोल डाल कर बना सकता है।

इसी दिन एक वीडियो आया था जिसमें सीलमपुर में हुए दंगों के बीच एक उन्मादी ने पेट्रोल बम फेंकने के क्रम में अपना ही हाथ उड़ा लिया। वो बम फेंक रहा था लेकिन शायद उचित प्रशिक्षण न मिल पाने की वजह से जब तक वो उसे फेंक पाता, वो हाथ ही में फट गया, और उसके हाथ के चीथड़े उड़ गए। इस उन्मादी दंगाई की पहचान रईस के रूप में हुई। पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से रईस ने अपनी पहचान छिपाई हुई थी और जीटीबी अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा था। लेकिन, तलाश में जुटी पुलिस को उसकी जानकारी मिल गई। जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया।

(पुस्तक के अंश यहाँ समाप्त होते हैं)

तीन दिनों में एक पायलट प्रोजेक्ट कर लिया गया था

इन तीन दिनों की हिंसा के बाद पूरे देश में पुलिस सचेत हो चुकी थी। 18 दिसंबर को देश के कुछ इलाकों में सावधानी के तौर पर पहले ही हिंसा न हो, इसकी तैयारी कर ली गई थी। ख़ुफ़िया सूत्रों से बंगलुरु प्रशासन को सूचना मिली कि देश के कई हिस्से में हो रहे विरोध प्रदर्शन की तरह ही, यहाँ भी कुछ असामाजिक तत्व विरोध की आड़ में हिंसा फैला सकते हैं। दिल्ली-यूपी में हुए उपद्रव और दंगाइयों के उन्मादी हिंसा की घटनाओं के बाद के बाद बेंगलुरु पुलिस अतिरिक्त सतर्कता बरतने पर विवश थी। पूरे बंगलुरु में 3 दिनों के लिए धारा-144 लागू कर दिया गया ताकि कहीं भी भीड़ के रूप में इकट्ठे होकर प्रदर्शन न कर सके। इसका परिणाम यह रहा कि आने वाले दिनों में बंगलुरु से किसी भी तरह की बड़ी हिंसक घटना की खबर नहीं आई।

इसके बाद भी उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में हिंसा का दौर रुक-रुक कर कई दिनों तक चला, लोगों की जानें भी गईं, लेकिन दंगाइयों को दामाद और जीजा बना चुके स्टूडियो एंकरों और वामपंथी लम्पटाधीशों ने इन्हें जायज कहना जारी रखा। हर तरह की हिंसा के सबूत मुस्लिम भीड़ों के होने की कहानी कहती रही, लेकिन उन्हें ‘पीड़ित समुदाय’, ‘अल्पसंख्यकों को विश्वास में नहीं ले पा रही हैं सरकार, जैसे जुमलों के सहारे ‘ये उनका गुस्सा है, मजबूरी है क्योंकि उन्हें लगता है उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा’ के नाम पर बचाया जाता रहा।

आज भी कमोबेश वही हो रहा है। वामपंथी पोर्टलों पर नैरेटिव बदलने की कोशिशें जारी हैं। वो यह सोच रहे हैं कि साल भर बाद हिन्दू समाज और रिसते घावों को चाटती दिल्ली भूल गए होंगे कि साल भर पहले उसके सीने पर छुरा मारने वाले, और कपड़ों पर आग लगाने वाले लोगों की पहचान क्या थी। लेकिन, जिस तरह दंगों के थमते ही ऑपइंडिया ने लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हुए उसकी सच्चाई बताई, वैसे ही हम हर साल, हर संबंधित मुद्दों पर, इन दंगों की याद करते रहेंगे।

हम यह बताते रहेंगे कि कैसे मानवाधिकारों की कविताओं, तिरंगे झंडे, भारत के नक्शे और मुस्लिम औरतों-बच्चों की आड़ में पूरे देश को जलाने की साजिश रची गई थी। हम यह बताते रहेंगे कि मरने वालों की संख्या और मजहब इन दंगों की विभीषिका की असली कहानी नहीं कहता, बल्कि मृतकों को मारने का तरीका बताता है कि तैयारी किसने की थी, और वो बर्बर, आतंकी, हिंसक तरीका किस मजहब का है जो अंकित शर्मा को चार घंटों तक चाकुओं से गोदती है, दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर जलती आग में फेंक देती है, कॉन्स्टेबल रतनलाल को खींच ले जाती है।

न भूले हैं, न भूलेंगे, न भूलने देंगे।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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