मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद विश्वविद्यालय में राजनीतिक प्रयोगों का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसके तहत ही कुछ महीने पहले दिलीप मंडल और मुकेश कुमार की अनुबंध पर नियुक्ति हुई थी। आरोप है कि दोनों प्रोफेसर छात्रों के बीच जातिगत भेदभाव कर माहौल खराब कर रहे हैं।
अपने ही प्रोफेसरों से प्रताड़ित माखनलाल के छात्रों के साथ बीते दिनों पुलिस ने भी जोर-जबर्दस्ती की थी। बावजूद इसके जब ये भोपाल की सड़कों पर निकले तो कोई शोर-शराबा नहीं हुआ। न सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुॅंचाया गया।
जातिगत भेदभाव के आरोपों में घिरे प्रोफेसर दिलीप मंडल और मुकेश कुमार जॉंच पूरी होने तक माखनलाल यूनिवर्सिटी के कैंपस में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। लेकिन, उससे पहले छात्रों के साथ जो कुछ हुआ वह हतप्रभ करने वाला था। पीड़ित छात्रों की जुबानी सुनिए उस रात की प्रताड़ना।
अगर कोई अपनी व्यक्तिगत कुंठा के कारण छात्रों से सौतेला व्यवहार करे तो क्या ऐसे किसी शिक्षक को शिक्षा देने का हक़ होना चाहिए? जब शिक्षा के मंदिर में ही छात्रों से भेदभाव हो। उनके बीच के आपसी सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश हो! जातिगत राजनीति हो तो भला छात्र पढ़ने कहाँ जाएँ? क्या पार्लियामेंट में या सड़क पर?
कुलपति ने मामले की जाँच के लिए एक कमेटी भी बना दी है, लेकिन छात्र चाहते हैं कि इन दोनों प्रोफ़ेसरों की सेवाएँ तत्काल प्रभाव से निलंबित की जाएँ। साथ ही छात्रों ने कहा कि उनके विरोध प्रदर्शन के बारे में गलत अफ़वाहें भी उड़ाई जा रहीं हैं।