पत्थलगड़ी हिंसा फैलाने वाले उपद्रवियों के ख़िलाफ़ सैंकड़ों मामले दर्ज हैं, जो चुनाव का मुद्दा भी बनी। कुल 19 मामलों में 172 नामजद आरोपित हैं। भाजपा के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का एक मुद्दा यह भी रहा। शिबू सोरेन ने कहा अगर उनकी सरकार बनती है तो सारे केस वापस ले लिए जाएँगे।
व्याख्याता परीक्षा का मुद्दा राजस्थान में गरमा गया है। छात्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री इसे इगो का मुद्दा बना रहे हैं। गौर करने लायक बात यह है कि ज्यादातर नाराज़ छात्र मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक हैं।
संबित पात्रा के साथ गौरव वल्लभ के टीवी डिबेट का एक वीडियो सोशल मीडिया में खूब चला था। इससे उत्साहित होकर कॉन्ग्रेस ने गौरव को झारखंड के चुनावी मैदान में उतार दिया। लेकिन, जमशेदपुर पूर्वी सीट पर उनका गणित बुरी तरह गड़बड़ा चुका है।
झारखंड से चुनाव लड़ने वाले दो ही उम्मीदवार पीएचडी हैं। इनमें एक लुइस मरांडी हैं। दुमका में कभी सहायक शिक्षिका रहीं लुइस कैसे बनी झारखंड की 'The Giant Killer'?
रवीश बार-बार यह बात भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में एक आम आदमी के वोट की कीमत वही होती है जो उनके जैसे परम ज्ञानियों के वोट की है। शायद यही अभिजात्यता और घमंड उन्हें हर मतदान के बाद यह कहने पर मजबूर कर देता है (भाजपा की जीत की स्थिति में) कि युवाओं को रोजगार से मतलब नहीं।
हेमंत सोरेन को महज 3492 वोट मिले हैं, वहीं लुइस मरांडी 9821 वोटों के साथ उनसे काफ़ी आगे दिख रही हैं। दुमका में सोरेन परिवार की प्रतिष्ठा दाँव पर है, क्योंकि ये 'गुरुजी का गढ़' रहा है। शिबू सोरेन यहाँ से 8 बार सांसद रह चुके हैं।
सरयू राय की बगावत और मुख्यमंत्रियों से झारखंड की जनता के पुराने वैर ने जमशेदपुर पूर्वी सीट को हॉटकेक बना रखा है। पॉंच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री रघुवर दास क्या नया इतिहास बनाने में कामयाब होंगे?
बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आया झारखंड 19 साल के सफर में ही राजनीति के इतने मोड़ देख चुका है कि उसकी सियासी चालों पर हमेशा पूरे देश की नजर रहती है। क्या इस बार भी विधानसभा चुनाव के नतीजे नए सियासी पन्ने खोलेंगे?
31 वर्षीय वरुण पर सीएए के विरोधियों ने धारदार हथियार से हमला किया। हमला काफ़ी क्रूर तरीके से किया गया। उनके सिर में गहरी चोट आई है। बेंगलुरु साउथ के सांसद व युवा भाजपा नेता तेजस्वी सूर्या ने हॉस्पिटल में जाकर उनका हालचाल जाना।
"उपद्रवियों में दो तरह के लोग हैं। एक वो जिनकी राजनीति दशकों तक झूठ फैलाने पर ही टिकी हुई है। दूसरे वो लोग जो समझते थे कि वो ही सरकार हैं और वो जो इतिहास बताएँगे, वही सच माना जाएगा। ख़ुद को भारत भाग्य विधाता मानने वालों ने अब बाँटो और राज़ करो वाली नीति पर काम करना शुरू कर दिया है।"