90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार पहली बार नहीं हुआ था। 14वीं शताब्दी में सूफी संतों से मिली सीख पर सिकंदर बुतशिकन ने इस काम को धड़ल्ले से किया था।
कश्मीरी पंडितों से नेहरू ने कहा - "या तो शेख अब्दुल्लाह के साथ रहो, या जहन्नुम में जाओ।" राजीव गाँधी बोले - "फारूक मेरे दोस्त हैं, क्या करें।" पीड़ितों से सुनिए अनसुनी दर्द की दास्ताँ।
काशी में रंगभरी एकादशी 358 वर्षों से अपने भव्यतम स्वरूप में निरंतर निभाई जा रही है। इसके पहले कहा जाता है कि मुग़लों के शासन में लम्बे समय तक यह परंपरा बाधित रही।