कई देशों में 'National day of mourning', अर्थात शोक का दिवस मनाया जाता है। फिर भारत के हिन्दू/सिख अपने साथ हुई त्रासदी व इसके गुनहगारों को क्यों न याद करें?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना के लिए हमेशा स्थान रहेगा और परंपरा के अनुसार विपक्ष प्रधानमंत्री के भाषण को एक निरुत्साह वाला भाषण भी बता सकता है पर एक आम भारतीय के लिए उनका संबोधन आशा देता है और उसे प्रेरित भी करता है।
हमें एक ऐसा संगठन दिखाई देता है जिसके लिए स्त्री एक योनि से अधिक कुछ है ही नहीं! वो इस बात की पैरोकारी करते हैं कि लड़कियों को शिक्षा भी नहीं दी जानी चाहिए।