Wednesday, September 22, 2021
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भारतीय लिबरलों की बंदर बैलेंसिंग यूॅं ही नहीं, हिंदूफोबिया के काटों का नया आका है तालिबान

दरअसल ये लिबरल सराहना से लेकर आलोचना तक, कुछ भी विशुद्ध नहीं कर सकते। केवल एक बात इनकी विशुद्ध रहती है और वह है बेशर्मी।

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा कोई खास आश्चर्य लेकर नहीं आया। पिछले कई महीनों में जो वातावरण तैयार हुआ था उससे लगभग तय लग रहा था कि देर-सबेर यही होना है। अफगानिस्तान के भीतर और बाहर कुछ लोगों को शायद यह आशा थी कि राष्ट्रपति अशरफ गनी की सेना तालिबान का मुकाबला करेगी पर वह नहीं हुआ।

गनी के भागते ही सेना ने हथियार डाल दिए। देश पर तालिबान के कब्जे के समय को लेकर जो अनुमान लगाए गए थे, उससे काफी पहले तालिबान ने अपना काम खत्म कर लिया। मानवता पर आई नई त्रासदी से दुःखी लोग इस तरह से चिंता प्रकट कर रहे हैं मानो तीन दिन पहले तक अफगानिस्तान में बड़ा मजबूत लोकतंत्र था। उप राष्ट्रपति सालेह अभी तक अपने बयानों की सहायता से लड़ रहे हैं पर यह तय है कि बयानों से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकेगी। सालेह ललकार कर जिन्हें नींद से जगाना चाहते हैं, वे पहले से ही जाग रहे हैं।

भारत में भी लोग जाग रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस चल रही हैं। भारत को क्या करना चाहिए, भारत को क्या नहीं करना चाहिए, भारत को वहाँ रहने वालों हिंदुओं और सिखों को तुरंत देश में लाना चाहिए या नासमझी की वजह से भारत ने अफगानिस्तान में अपने निवेश का सत्यानाश कर लिया, जैसे ख़ास विश्लेषण आम हो चले हैं। कुछ लोगों का मानना है कि केवल हिंदुओं और सिखों को ही नहीं, भारतीय सरकार को चाहिए कि वहाँ के मुसलमानों को भी आने दे। यही मानवता का तकाजा है।

कुछ प्रतिक्रियाएँ यह भी बताती हैं कि पहले सोवियत रूस और फिर अमेरिका को हराने के बाद तालिबान अब भारत की ओर न केवल रुख करेगा बल्कि उसे भी हराकर रहेगा। यह सोच लिबरल भारतीय से लेकर पाकिस्तानी सुरक्षा विशेषज्ञों तक की है। कुल मिलाकर लगातार जागने वालों ने अपने शोर को नई आवाज दे दी है। यह बात अलग है कि इस्लाम के एक धड़े ने दूसरे की जगह ली है।

वैसे भारतीय ‘लिबरल’ अभी भी सो रहे हैं। इनकी नींद में खलल बस उस दबाव की वजह से है जिसमें इन्हें तालिबान के खिलाफ कुछ बोलना ही है। यह समय इनके लिए बड़ा कठिन होता दिख रहा है। ऐसे कठिन समय में तालिबान या इस्लामिक आतंकवाद की आलोचना गले से निकालें भी तो कैसे? उलाहना से पैदा होनेवाला दबाव बढ़ता है तो इन्हें आतंकवाद की आलोचना भी करनी पड़ती है। पर तालिबान की इस आलोचना की शुरुआत ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आलोचना से करते हैं। इन्हें कहना पड़ता है कि तालिबान की आलोचना करना हो तो साथ संघ की भी आलोचना होनी चाहिए। तालिबान यदि आतंकवादी हैं तो संघ के लोग भी आतंकवादी हैं।

इस बंदर बैलेंसिंग में ये बस यह नहीं बता पाते कि संघ ने कब और कहाँ किसी का तख़्त पलटा? कब महिलाओं पर अत्याचार किया, उन्हें गोली मारी या उन्हें सार्वजनिक तौर पर सजा सुनाई? पर हाल यह है कि ये लानत भी भेजते हैं तो उस गोली पर जो तालिबान के असॉल्ट राइफल से निकलती है। शिकायत भी करते हैं तो भारत से उसने अफगानिस्तान में निवेश क्यों किया? इस बार तो हाल यह है कि दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने वाले तालिबान को ये मॉडरेट तालिबान बताने पर तुले हुए हैं, उस पकिस्तानी ‘जनरैल’ की तरह जिसने पहली बार दुनिया के सामने ‘गुड तालिबान’ और ‘बैड तालिबान’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।

दरअसल ये लिबरल सराहना से लेकर आलोचना तक, कुछ भी विशुद्ध नहीं कर सकते। केवल एक बात इनकी विशुद्ध रहती है और वह है बेशर्मी। ये यह कहकर बेशर्मी दिखाने की औकात रखते हैं कि तालिबान ने अफगानिस्तान के लोगों पर जुल्म भले किया पर वे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। ये यह भी कहते हैं कि भारत में फासीवाद बढ़ गया है और भारत रहने लायक नहीं रहा पर पता नहीं कौन सी मज़बूरी के तहत अफगानिस्तान के मुसलमानों को भारत ले आने की भी माँग करते हैं। अब यह विशुद्ध बेशर्मी नहीं है तो और क्या है? ये चाहते हैं कि भारतीय सरकार अफगानिस्तान के मुसलामानों को भारत ले आए, बिना यह सोंचे कि वे यहाँ आना चाहते हैं या नहीं? वैसे भी अफगानिस्तान के मुसलमान यदि आना ही चाहते हैं तो वे सरकार से सीधी अपील करेंगे कि इन लिबरल की माँगों का इंतजार करेंगे?

दरअसल इन लिबरल में से कुछ की खुशी छिपाए नहीं छिप रही। और ऐसा क्यों न हो? आखिर जिस इमरान खान को इन्होंने कभी स्टेट्समैन घोषित किया था, उसके अनुसार; तालिबान द्वारा सत्ता पर कब्जे के बाद अफगानिस्तान के लोगों की दिमागी जंजीरें टूट गई हैं। इनकी आदर्श चीनी सरकार के विदेश मंत्री पहले से ही तालिबान से न केवल मुलाकातें कर रहे हैं, बल्कि उन्हें मान्यता भी दे चुके हैं। हाल यह है कि दुनिया में कहीं भी इस्लामिक आतंकवाद को लेकर इनकी प्रतिक्रिया लगातार खतरनाक स्तर की ओर जा रही है। सत्ता पर तालिबान के दोबारा कब्जे को उपमहाद्वीप के अधिकतर मुसलमान इस्लाम की जीत मानते हैं। दूसरी तरफ ये भारतीय लिबरल अफगानिस्तान में घटी इस घटना को यह कहकर सेलिब्रेट कर रहे हैं कि तालिबान ने औरतों को शरिया के तहत उनका अधिकार सौंपने का वादा किया है। कुछ तो यहाँ तक कहते हुए मिल रहे हैं कि सोवियत संघ और अमेरिका जैसी ताकतों को हराने वाले तालिबानी अब भारत को हराएँगे।

भारतीय लिबरलों का यह मानसिक दिवालियापन खुलकर सामने आ गया है। वैसे भी वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति अपनी घृणा में ये इतने नीचे चले जाते हैं कि इन्हें अपने सार्वजनिक आचरण का भान नहीं रहता। इस्लामिक आतंकवाद के समर्थन और उसके कुकृत्यों पर चूना पोतने के अपने पुराने एजेंडे पर काम करते समय इन्हें मानवता पर आई किसी त्रासदी या इनकी अपनी नैतिकता में लगातार हो रही गिरावट से जरा भी समस्या नहीं है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें हम कभी इनसे सार्वजनिक तौर पर भी नैतिकता की आशा नहीं कर सकते। इन भारतीय लिबरल का आचरण इस बात को बल देता है कि आज इस्लामिक आतंकवाद के साथ वैचारिक कन्धा मिलाकर खड़ा होने में जिन्हें शर्म नहीं, वे भविष्य में सामरिक कंधा देने के लिए खड़े हो जाएँ तो आश्चर्य न होगा।

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