‘वाशिंगटन पोस्ट’ की खबर हो या 'गार्डियन' का संपादकीय, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का कवरेज हो या ‘सीएनएन’ की कवरेज, ये सभी बस 'व्हाइट मेन्स बर्डन सिंड्रोम' का ज्वलंत उदाहरण है।
हिन्दू लाशों के जलने की तस्वीरें शेयर कर के दानिश सिद्दीकी ने पूरी दुनिया में भारत की ऐसी छवि बनाने का प्रयास किया है, जैसे कोरोना वायरस संक्रमण के लिए हिन्दू ही जिम्मेदार हों और वही मर रहे हों।
गिद्धों की पाँत फिर से वैसे ही बैठ गई है। फिर से हेडलाइन के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह के सहारे वक्तव्य दिए जा रहे हैं। नेताओं द्वारा फ़र्ज़ी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। शायद फिर उसी आकाँक्षा के साथ कि भारत कोरोना के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई हार जाएगा।
कोरोना महामारी की शुरुआत में भले ही भारत सरकार ने पूरे देश में एक साथ हर राज्य में लॉकडाउन लगाया, मगर कुछ ही समय में सरकार ने हर राज्य को अपने हिसाब से फैसले लेने का अधिकार भी दे दिया।
न्यूज़लॉन्ड्री ने जहाँ 88 साल के ई श्रीधरन के साथ बदतमीजी की, वहीं केरल की वामपंथी मंत्री केके शैलजा को रॉकस्टार बता गुणगान किया। यही है 'निडर पत्रकारिता'?