"अज्ञानी लोगों को इसकी जानकारी नहीं रहती है कि संसद से पारित होने के बाद कोई क़ानून किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं रहता, देश का क़ानून बन जाता है। जिन्हें न क़ानून का ज्ञान है और जिन्होंने न कभी संविधान पढ़ा है, उनकी अज्ञानता का कोई समाधान नहीं है। "
मौलाना अबुल कलाम का राष्ट्रीयता और भारतीयता में गहरा यकीन था। उन्होंने धर्म के आधार पर देश के विभाजन का विरोध किया था। पाकिस्तान परस्मुतों को चेताया था। शायद यही कारण है कि इरफान हबीब जैसे वामपंथी उनका नाम सुनते ही आपा खो बैठते हैं।
वरुण ग्रोवर की कविता 'कागज नहीं दिखाएँगे' को काटती बहुत अच्छी कविताओं में से एक कविता है ऊर्वी सिंह की। यह लखनऊ के एक कॉलेज में अंग्रेज़ी की सहायक अध्यापिका हैं। सुनिए उनकी कविता, उन्हीं की आवाज में, जो तोड़ती है छद्म लिबरलों और स्वघोषित बौद्धिकता का भाव पाले बैठे लोगों का घमंड।
पर्यावरण एक्टिविस्ट मेधा पाटेकर भी विरोध करने पहुँचीं, लेकिन पाक से आए हिन्दू शरणार्थियों ने उन्हें खदेड़ दिया। शरणार्थियों ने मेधा पाटेकर को खदेड़ते हुए कहा कि जो लोग CAA का विरोध कर रहे हैं, वो पाकिस्तान में रह कर दिखाएँ।
वामपंथी मंत्री ने एक्टिविस्ट बिंदु अम्मिणी पर हुए हमले को नाटक करार दिया। उन्होंने कहा कि ये सब पूर्व-नियोजित ड्रामा था। बता दें कि बिंदु सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने के लिए जा रही थीं, तभी किसी व्यक्ति ने उनपर मिर्ची स्प्रे से हमला कर दिया था।
वामपंथियों की पैदल सेना में सबसे ज्यादा लोग दिल्ली जैसी जगहों के कॉलेजों के नए बच्चे होते हैं। व्यवस्थित तरीके से उनके दिमाग में झूठ का सहारा ले कर खास धर्म और विचार के खिलाफ जहर भरा जाता है। रवीश और केजरीवाल से ले कर कामरा, राठी, बनर्जी, पीईंग ह्यूमन आदि इसकी पूरी योजना बनाते हैं।
पटना के इस हनुमान मंदिर का संचालन महावीर ट्रस्ट करता है। पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल इसके अध्यक्ष हैं। मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति के सामाजिक परिवर्तन में उनका बड़ा योगदान है। अयोध्या मामले से भी वे जुड़े रहे हैं।
बाबरी मस्जिद का टूटना भले ही भारतीय कानून की दृष्टि में एक आपराधिक घटना है, लेकिन हिन्दुओं के इतिहास के हिसाब से यह उस आस्था के साथ न्याय है जिसके मंदिर की दीवार पर मस्जिद खड़ी की गई थी।
कैम्पस नक्सलियों की हरकतों से ट्विटर पर कई प्रबुद्ध व्यक्तित्व बिफर उठे हैं। आदित्य राज कौल ने कहा है कि अवैध रूप से किसी को बंदी बनाना कानून के खिलाफ है। एएनआई सम्पादक स्मिता प्रकाश ने भी घटना की आलोचना की है। वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने जेएनयू को 'रिपब्लिक ऑफ़ जेएनयू' बताते हुए बेबस देश की......