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भारत छोड़ने के लिए मोहम्मद हसन ने माँगी 15 दिन की मोहलत, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 3 हफ्ते की दी राहत: पढ़ने के लिए आया था, बीवी-बच्चों के साथ बस ही गया

यमन से आकर भारत में रह रहे खालिद गोमई मोहम्मद हसन, उनकी बीवी, बेटे और बेटी को उनके मूल देश यमन में 'जबरन निर्वासित' किए जाने से सुरक्षा प्रदान की, क्योंकि शरणार्थी परिवार ने कोर्ट को जानकारी दी थी कि वो ऑस्ट्रेलियाई वीजा के लिए आवेदन कर चुके हैं।

भारत में एक यमन परिवार लंबे समय से वीजा खत्म होने के बाद भी रह रहा था। कुछ दिन पहले पुणे पुलिस ने भारत छोड़ने को कहा तो मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचा। वहाँ कोर्ट ने भी फटकारते हुए कहा था कि वो भारत की उदारता का ज्यादा फायदा न उठाएँ और वीजा खत्म हो गया है तो देश छोड़ें। हालाँकि अब इसी मामले में खबर है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस यमनी परिवार को ‘जबरन निर्वासन’ से तीन हफ्ते की राहत प्रदान की है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति रेवती मोहिते-डेरे और न्यायमूर्ति पृथ्वीराज चव्हाण की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई की। उन्होंने यमन से आकर भारत में रह रहे खालिद गोमई मोहम्मद हसन, उनकी बीवी, बेटे और बेटी को उनके मूल देश यमन में ‘जबरन निर्वासित’ किए जाने से सुरक्षा प्रदान की, क्योंकि शरणार्थी परिवार ने कोर्ट को जानकारी दी थी कि वो ऑस्ट्रेलियाई वीजा के लिए आवेदन कर चुके हैं। इसमें बायोमेट्रिक्स, मेडिकल टेस्ट आदि प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी हैं। बस ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों की ओर से जवाब आना बाकी है इसलिए उन्हें 15 दिन की मोहलत दी जाए। यमन परिवार का अनुरोध सुनने के बाद उन्हें तीन सप्ताह का समय दिया गया यानी कि 21 दिन का।

उल्लेखनीय है कि यमन का परिवार पिछले एक दशक से अपने वीजा की अवधि से अधिक समय से भारत में रह रहा है और कुछ समय पहले उन्हें पुणे पुलिस से भारत छोड़ो नोटिस मिला था। इसी के बाद वह अपना आग्रह लेकर कोर्ट पहुँचे और माँग की कि उन्हें जबरन निर्वासन से सुरक्षा प्रदान की जाए, क्योंकि वे केवल ऑस्ट्रेलिया जाना चाहते थे।

मौजूदा जानकारी के अनुसार, ये लोग 2014-15 में उस समय भारत आए थे जब यमन में मानवीय संकट गहरा गया था और आंतरिक गृहयुद्ध की स्थिति के कारण 45 लाख नागरिक विस्थापित हो गए थे। हसन का परिवार भी इसी दौरान विस्थापित हुआ 2014 में पहले वो खुद छात्र वीजा पर भारत आए फिर उनकी पत्नी 2015 में मेडिकल वीजा पर। कुछ समय बाद दोनों के वीजा की अवधि समाप्त हो गई लेकिन इन्होंने भारत नहीं छोड़ा।

ऐसे में पुणे पुलिस ने उन्हें इस वर्ष पहली बार फरवरी में तथा उसके बाद अप्रैल में भारत छोड़ो नोटिस जारी किया था, जिसमें उन्हें नोटिस प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर भारत छोड़ने को कहा गया था। तब उन्होंने हाईकोर्ट की ओर रुख किया। अपनी याचिका में हसन ने कहा था, “अगर हमें जबरन यमन निर्वासित किया गया तो वहाँ शोषण होगा। उन्हें, उनकी बीवी-बच्चों को जान का खतरा है।”

वहीं पीठ ने  पुणे पुलिस का प्रतिनिधित्व करने वाले विशेष वकील संदेश पाटिल से सहमति जताई थी कि भारत के अलावा याचिकाकर्ता 129 अन्य देशों में जा सकता है जो शरणार्थी कार्ड धारकों को अनुमति देते हैं। फिर भी याचिकाकर्ता ने सुरक्षा पर जोर दिया। तब जस्टिस ने उन्हें मौखिक रूप से यहाँ तक कहा था, “आप पाकिस्तान जा सकते हैं, जो पड़ोस में है। या आप किसी भी खाड़ी देश में जा सकते हैं। भारत के उदारवादी रवैये का अनुचित लाभ न उठाएँ।”

हालाँकि बाद में याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों के समक्ष अपने पासपोर्ट प्रस्तुत किए। कोर्ट ने पाया कि वो 2025 तक वैध हैं। अब वह सिर्फ ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों की सकारात्मक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। उसके बाद वो वहाँ चले जाएँगे। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए केस की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए स्थगित कर दी है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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