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जस्टिस मुरलीधर चाहते हैं कि हिंदुओं का होता रहे धर्मांतरण, कानून को बता रहे- दलित और चुनाव की आजादी के विरुद्ध: गौतम नवलखा जैसे ‘अर्बन नक्सल’ पर भी की थी ‘कृपा’

मुरलीधर ने कहा कि ये दलितों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं। जैसे, कोई दलित बौद्ध धर्म अपनाए तो उसे मजिस्ट्रेट को बताना पड़ेगा, जो प्राइवेसी और धर्म की आजादी के खिलाफ है।

‘अर्बन नक्सल’ गौतम नवलखा को घर में नजरबंदी से रिहा करने वाले पूर्व जज एस मुरलीधर अब धर्मांतरण विरोधी कानूनों के खिलाफ बोल रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि लालच और जोर-जबरदस्ती से धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया कानून ‘पसंद की आजादी’ के खिलाफ है। उन्होंने देश के अलग-अलग राज्यों में बने धर्मांतरण विरोधी कानूनों के मुद्दे पर एक पैनल डिस्कशन के दौरान 28 फरवरी 2025 को ये बातें कही।

उड़ीसा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद से रिटायर हुए एस मुरलीधर ने कहा, “ये धर्मांतरण विरोधी कानून किसी जोर-जबरदस्ती के धर्मांतरण के खिलाफ कानून की तरह नहीं, बल्कि ‘फ्रीडम ऑफ च्वॉइस’ के कानून के खिलाफ है।” उन्होंने कहा, “ये कानून जबरदस्ती धर्म बदलवाने से रोकने के लिए कम, बल्कि लोगों की आजादी छीनने के लिए ज्यादा हैं। इन कानूनों में ये मान लिया जाता है कि अगर कोई अपने जन्म के धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपनाता है, तो इसके पीछे जरूर कोई डर या दबाव होगा।”

उनका कहना था कि इन कानूनों में ये साबित करने की जिम्मेदारी उस शख्स पर डाल दी जाती है, जिस पर किसी को जबरदस्ती धर्म बदलवाने का इल्जाम है। उनका आरोप है कि ये कानून दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं।

मुरलीधर ने कहा, “अब अगर कोई दलित बौद्ध धर्म अपनाना चाहे, तो उसे जिला मजिस्ट्रेट को बताना पड़ेगा कि वो ऐसा क्यों कर रहा है। पहले उसे पूरी दुनिया को बताना होगा। प्राइवेसी के हक वाले पुट्टस्वामी फैसले के बाद ऐसा कानून कानूनी जाँच में टिक नहीं सकता, क्योंकि ये सीधे पसंद की आजादी, निजता और धर्म चुनने के अधिकार को ठेस पहुँचाता है।”

उन्होंने ये भी कहा कि जबरदस्ती धर्म बदलवाने की शिकायत सिर्फ पीड़ित को ही करनी चाहिए, लेकिन ये कानून किसी को भी शिकायत करने की इजाजत देता है – जैसे कोई रिश्तेदार या दूर का चचेरा भाई। इससे कुछ गुँडागर्दी करने वाले ग्रुप सक्रिय हो गए हैं, जो नोटिस बोर्ड या दफ्तरों में देखते हैं कि कौन अंतर-धार्मिक शादी या धर्म बदलना चाहता है और फिर उस शख्स को डराते-धमकाते हैं।

ये बातें तब सामने आईं, जब अरुणाचल प्रदेश में ‘फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट’ को लेकर बहस चल रही है। ये कानून वहाँ की मूल जनजातियों को बचाने के लिए है, लेकिन ईसाई मिशनरी ग्रुप इसका विरोध कर रहे हैं।

इन्हीं जस्टिस मुरलीधर ने दी थी अर्बन नक्सल गौतम नवलखा को रिहाई

बता दें कि इन्हीं जस्टिस एस मुरलीधर ने दिल्ली हाईकोर्ट में जज रहते ‘अर्बन नक्सल’ गौतम नवलखा की जेल से रिहाई के आदेश दिए थे। ये मामला भीमा कोरेगांव हिंसा केस से जुड़ा था, जिसमें अगस्त 2018 को पुणे पुलिस ने गौतम नवलखा और 4 अन्य ‘अर्बन नक्सलों’ को गिरफ्तार किया था। पुलिस का कहना था कि ये लोग ‘जाति विरोधी’ इवेंट के बहाने लोगों को भड़काना चाहते थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे। इसके बाद इन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया था।

नवंबर 2018 में जस्टिस एस मुरलीधर की अगुवाई वाली दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने महाराष्ट्र पुलिस को नवलखा को पुणे ले जाने की इजाजत देने वाले निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। उनका कहना था कि गिरफ्तारी CrPC नियमों के मुताबिक नहीं थी। इसके बाद नवलखा को घर में नजरबंदी से रिहा कर दिया गया।

बताया जाता है कि नवलखा 2010-11 के बीच तीन बार अमेरिका गए थे और उन्होंने एक अमेरिकी जज को चिट्ठी लिखकर ISI और पाकिस्तान सरकार से पैसे लेने के आरोपित फैयाज की सजा माफ करने की माँग की थी।

यही नहीं, गौतम नवलखा से न्यूजक्लिक फंडिंग केस में 31 दिसंबर 2023 को दिल्ली पुलिस मुंबई में पूछताछ भी कर चुकी है। गौतम नवलखा से न्यूजक्लिक के फाउंडर प्रबीर पुरकायस्थ और कंपनी में उनकी हिस्सेदारी के बारे में सवाल पूछे गए थे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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