अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने रवांडा और कांगो के बीच शांति करा दी, लेकिन हकीकत उलट है। जुलाई 2025 में रवांडा समर्थित एम23 विद्रोहियों ने कांगो के नॉर्थ किवु में 14 गाँवों में 140 से 319 लोगों को मार डाला।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रवांडा और कांगो के बीच जिस शांति की बात ट्रंप कर रहे हैं, वहाँ खून की नदियाँ बह रही हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र (UN) की ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि जुलाई 2025 में 140 से 300 से ज्यादा लोग मारे गए। रवांडा समर्थित एम23 विद्रोही समूह ने नॉर्थ किवु प्रांत में नरसंहार मचाया, जिसमें बच्चों और औरतों को भी नहीं बख्शा गया। लोगों को कुल्हाड़ियों से काट डाला गया, लाइन में बैठा कर गोलियों से भून डाला गया।
हमले के चश्मदीद तीन किसानों ने इसकी जानकारी देते हुए बताया है कि 10-11 जुलाई को जब वे लोग कुछ सामान लेने घर से बाहर गए थे, उस वक्त एम 23 विद्रोहियों ने हमला किया था। एक किसान ने बताया कि वे कुछ दूर से छिप कर अपने परिवार के लोगों को देख रहे थे, जिन्हें विद्रोहियों ने गोलियों से भून डाला। उनकी पत्नी और तीन बच्चों को मौत के घाट उतार दिया।
एक और चश्मदीद ने बताया कि 11 जुलाई को किसेगुरु कस्बे से करीब 18 किलोमीटर दूर एक खेत में उन्हें एक 47 साल के व्यक्ति और उसके चार बच्चों के शव मिले। बच्चों की उम्र 11 से 17 साल के बीच थी। इन लोगों को दफनाने वाले एक व्यक्ति ने कहा, “हमने खेत में सिर कटे इन लोगों की लाश मिली। उन सभी को छुरों से मारा गया था। उनके गले काटे गए थे।”
ह्यूमन राइट्स वॉच ने 300+ मौतों की दी जानकारी
ह्यूमन राइट्स वॉच ने हमले की जानकारी देते हुए कहा है कि रवांडा-नियंत्रित एम23 विद्रोहियों ने जुलाई 2025 में पूर्वी कांगो के विरुंगा नेशनल पार्क के पास कम से कम 14 गाँवों के 140 से अधिक नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये लोग हुतु समुदाय के हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई से अब तक इस क्षेत्र में मारे गए लोगों की संख्या 300 से अधिक हो सकती है। इन पर हमला करना वाला एम23 संगठन 2021 से काफी सक्रिय है।
ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्च फेलो क्लेमेंटाइन डी मोंटजॉय ने कहा, “जब तक इन हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं मिलती, ये अत्याचार और बढ़ेंगे। उनका कहना है कि इस हमले में रवांडा के कई अधिकारी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को इन हमलों में शामिल लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए और युद्ध में शामिल रवांडा के सैन्य कमांडरों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। साथ ही यूएन को इस मामले की जाँच करनी चाहिए।”
हमलों में रवांडा की सेना भी शामिल
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट तो और भी भयावह आँकड़ा देती है, जिसमें 9 से 21 जुलाई के बीच 319 लोगों के मारे जाने की बात कही गई है। M23 विद्रोहियों ने कांगो के लोगों पर जुल्म की हर हद पार कर दी। एम23 ने कई लाशों को रुशुरु नदी में फेंक दिया, जिसमें औरतों और बच्चों की लाशें भी शामिल थीं। लोगों को लाशें दफनाने की इजाजत नहीं दी गई।
विद्रोहियों ने कहा कि लाशों को खेतों में ही छोड़ दो या दफना दो, लेकिन अंतिम संस्कार करने की मनाही थी। एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हम अपने अपनों को दफनाने भी नहीं जा सकते थे। वो हमें धमकाते थे कि अगर हमने कोशिश की तो हमें भी मार देंगे।” बता दें कि रुत्शुरु नदी से बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों के शव बरामद हो चुके हैं।
इन हमलों में ज्यादातर हुतू समुदाय के लोग निशाना बने। एम23 का कहना है कि ये हमले डेमोक्रेटिक फोर्सेस फॉर द लिबरेशन ऑफ रवांडा (एफडीएलआर) के खिलाफ थे, जो 1994 के रवांडा नरसंहार में शामिल हुतू समुदाय के लोग हैं। लेकिन हकीकत में आम लोग, औरतें और बच्चे इस हिंसा का शिकार बने।
संयुक्त राष्ट्र ने एम23 और रवांडा डिफेंस फोर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। इन संगठनों का कहना है कि जिम्मेदार लोगों पर प्रतिबंध लगाए जाएँ और युद्ध अपराधों की जाँच हो। लेकिन रवांडा इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि हत्याएँ किसी और समूह ने कीं।
क्या है रवांडा और कांगो का विवाद?
रवांडा और कांगो का ये संघर्ष 1994 के रवांडा नरसंहार से शुरू हुआ, जिसमें हुतू समुदाय ने तुत्सी समुदाय के लाखों लोगों को मार डाला था। नरसंहार के बाद हुतू उग्रवादी कांगो भाग गए और वहाँ एफडीएलआर जैसे समूह बनाए। तुत्सी समुदाय का एम23 ग्रुप रवांडा का समर्थन पाता है और एफडीएलआर के खिलाफ लड़ता है।
कांगो का कहना है कि रवांडा एम23 को हथियार और सैनिक देता है, जबकि रवांडा इससे इनकार करता है और कहता है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए कांगो में है। इस इलाके में सोना, कोल्टन और कोबाल्ट जैसे कीमती खनिजों की खदानें हैं, जो इस संघर्ष को और भड़काती हैं।
रवांडा-कांगो के बीच शांति समझौता
27 जून 2025 को ट्रंप की मौजूदगी में वॉशिंगटन में रवांडा और कांगो के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें रवांडा को अपनी सेना वापस बुलाने और कांगो को एफडीएलआर को खत्म करने का वादा करना था। लेकिन इस समझौते के बाद भी हिंसा रुकी नहीं। जुलाई में हुए नरसंहार ने साफ कर दिया कि ये समझौता कागजों तक ही सीमित है।
कांगो के विदेश मंत्रालय ने कहा, “इन हत्याओं ने वॉशिंगटन समझौते और दोहा वार्ताओं की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।” दोहा में कांगो सरकार और एम23 के बीच अलग से बातचीत चल रही थी, लेकिन वहाँ भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। एम23 ने कहा कि कांगो ने समझौते का पालन नहीं किया, जबकि कांगो का कहना है कि एम23 ने ही हमले किए।
ट्रंप भले ही शांति की बात करें, लेकिन नॉर्थ किवु के खेतों और नदियों में बहता खून बता रहा है कि शांति अभी कोसों दूर है। कांगो-रवांडा में जारी इस हिंसा ने ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही व्हॉइट हाउस के उन दावों पर भी… जिसमें ट्रंप द्वारा बीते 7 माह में 7 जंगों को रोकने का दावा किया था।


