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पढ़ाई छूटी, केस लड़ते-लड़ते मर गए माँ-बाप… जब SC/ST एक्ट में निर्दोष साबित होकर जेल से निकला आकाश, तब तक बर्बाद हो गए जिंदगी के अहम साल

एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग मामला फिर सामने आया, जिसमें एक लड़की की आत्महत्या मामले में आकाश पांडेय को 3 साल की जेल हुई। जाँच हुई तो पता चला कि मामला झूठा है और लड़की हत्या हुई थी और उसके पिता ने की थी। लेकिन सवाल है कि कोर्ट ने बरी तो कर दिया, लेकिन 3 साल जीवन जेल में बर्बाद हुआ, उसका क्या?

एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, जहाँ झूठे आरोपों में फँसाए जाने से लोगों की जिंदगी तबाह हो जाती है। ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के झाँसी से सामने आया है, जहाँ आकाश पांडेय नाम के युवक को एक झूठे मामले में 3 साल से ज़्यादा जेल में बिताना पड़ा। आकाश पांडेय पर आत्महत्या का झूठा केस किया गया।

इस दौरान आकाश के माता-पिता की मौत हो गई और उसकी पढ़ाई-लिखाई सब छूट गई। अब कोर्ट ने उसे निर्दोष करार दिया है, लेकिन सवाल यह है कि बर्बादी के इस कगार पर पहुँची जिंदगी की भरपाई कैसे होगी?

क्या है पूरा मामला?

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 8 जून 2018 की है, जब मातादीन अहिरवार की बेटी का शव फाँसी के फँदे से लटका मिला। मातादीन ने कोर्ट के आदेश पर आकाश पांडेय और उसके ममेरे भाई अंकित मिश्रा पर छेड़छाड़, आत्महत्या के लिए उकसाने, SC/ST एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत FIR दर्ज कराई थी।

पुलिस की जाँच में आकाश का भाई सचिन निर्दोष पाया गया, लेकिन आकाश और अंकित को जेल भेज दिया गया। आकाश 3 साल से ज़्यादा जेल में रहा, जबकि अंकित एक साल बाद जमानत पर छूट गया।

जेल में बीता जीवन, माता-पिता की मौत और बर्बाद हुआ करियर

ट्रायल के दौरान आकाश के माता-पिता दोनों की मौत हो गई। संभवतः वो बेटे के जेल जाने के सदमे को झेल नहीं पाए। अब 7 साल बाद, कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर दोनों को निर्दोष करार दिया है। कोर्ट ने पाया कि लड़की ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उसकी हत्या की गई थी, जिसे उसके पिता और परिवार के सदस्यों ने मिलकर अंजाम दिया था।

स्पेशल जज ने पिता मातादीन के खिलाफ झूठे सबूत पेश करने और मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि लड़की की मौत के बाद परिवार को मिला मुआवजा भी वसूला जाएगा।

न्याय मिला, पर जिंदगी की भरपाई कैसे?

कोर्ट के फैसले के बाद आकाश और अंकित फूट-फूटकर रो पड़े। लेकिन, उनके आंसू केवल न्याय मिलने की खुशी के नहीं थे, बल्कि खोए हुए सालों और बर्बाद हुए जीवन पर भी थे। आकाश का कहना है कि ‘जिंदगी क्या बदली है, बस जेल से बाहर आ गए हैं। लोगों की निगाहें हर रोज आपसे सवाल करती हैं। जवाब नहीं होते।’ उसकी पढ़ाई छूट गई, खेत बिक गए और जमा-पूँजी भी खत्म हो गई।

फिल्हाल आकाश 6 हजार रुपए महीने की नौकरी कर रहा है, जबकि ITI पूरी हो जाती तो अच्छी सैलरी मिल सकती थी। अंकित, जो डिफेंस की तैयारी कर रहा था, उसकी पढ़ाई भी छूट गई। उसे नौकरी से भी निकाल दिया गया।

विष्णु तिवारी का मामला: 20 साल जेल के बाद मिली आजादी

इसी तरह, इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद विष्णु तिवारी करीब 20 साल बाद जेल से बाहर आए हैं। उन पर 1999 में रेप का झूठा आरोप लगाया गया था। इस दौरान उनके परिवार के कई सदस्यों की मौत हो गई और उन्हें पैरोल पर भी रिहा नहीं किया गया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की थी।

ये दोनों मामले दर्शाते हैं कि कैसे न्याय मिलने में देरी या झूठे आरोप जीवन को पूरी तरह तबाह कर सकते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या विष्णु या आकाश जैसे लोगों के जीवन की जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई किसी भी मुआवजे या फैसले से हो सकती है? क्या उनकी जिंदगी की बर्बादी की भरपाई संभव है?

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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