कभी आपने सुना की सेक्युलरिज्म के नाम पर किसी मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया गया हो। कभी ये सुना है कि मुस्लिमों के किसी मजहबी जुलूस में भगवान राम या कृष्ण के नाम की जय-जयकार की गई हो। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि सेक्युलरिज्म के नाम पर सारे प्रयोगों की ठेकेदारी हिंदू त्योहारों की ही है।
हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कला-संस्कृति से लेकर आधुनिकता और विविधता पर हिंदुओं के त्योहारों पर तमाम तरह के प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हिंदुओं के हर त्योहार से पहले या उनके दौरान पानी में कंकड़ मारकर यह परखा जाता है कि हिंदुओं की सहनशीलता कितनी है, वे कहाँ तक बर्दाश्त कर सकते हैं।
इसे अब कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं, इन दिनों नवरात्रि चल रही हैं और देशभर में दुर्गा पंडाल लगे हैं। कुछ दिनों पहले ममता बनर्जी एक पंडाल में पहुँची, साथ में मदन मित्रा समेत पार्टी के अन्य नेता भी थे। पंडाल में जाकर पूजा-अर्चना करनी चाहिए थे लेकिन हुआ क्या?
मदन मित्रा ने दुर्गा पंडाल में ‘मेरे दिल में काबा है और आँखों में मदीना है’ गाना शुरू कर दिया। जाहिर है, दुर्गा पंडाल में इसे गाए जाने का कोई मतलब, कोई तुक नहीं है। ऐसे में ममता को अपने नेता को रोकना चाहिए था लेकिन वो क्या कर रही थीं? वो अपने नेता के इस गीत पर ताली बजा रही थीं। यह सब तमाशा खुद को सेक्युलर दिखाने के लिए किया जा रहा है।
अब सोचिए, ममता बनर्जी और उनके नेता ने जो किया अगर वही काम किसी अन्य मजहब के कार्यक्रम में हुआ होता तो क्या होता, क्या पूरे देश में हंगामा खड़ा नहीं हो गया होता? क्या सेक्युलरिज्म के सूरमा सड़कों पर नहीं आ गए होते?
After Mamata Banerjee inaugurated several puja pandals wearing a hijab during the inauspicious Pitru Paksha, Madan Mitra, one of her sidekicks, sang, “There’s the Kaaba in my heart and Medina in my eyes,” inside a Durga Puja pandal in Kolkata, West Bengal.
— Amit Malviya (@amitmalviya) September 27, 2025
This is how Sanatan… pic.twitter.com/cSTtQPa6uH
ये हुआ बस एक उदाहरण, एक और देखिए, झारखंड की राजधानी राँची में तो बात इससे भी आगे बढ़ गई, वहाँ दुर्गा पूजा पंडाल को ही ‘वेटिकन सिटी’ की थीम पर बना दिया गया। सेक्युलरिज्म में कमी ना रह जाए इसलिए इस पंडाल में बाकायदा ईसा मसीह की मूर्तियाँ और क्रॉस तक लगाए गए थे।
और आगे बढ़िए, कर्नाटक में दशहरे के उत्सव की शुरुआत करने के लिए एक मुस्लिम महिला बानू मुश्ताक को बुलाया गया। मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।
कभी आपने सोचा है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या यह हिंदुओं के पर्व को किसी और धर्म के चेहरों से जोड़ने की सोची-समझी कोशिश नहीं लगती है? क्या यह हिंदुओं की परंपराओं के साथ प्रयोग नहीं है?
ऐसी प्रयोगधर्मिता गरबा में भी नजर आती है, गरबा में मुस्लिम युवकों को प्रवेश मिल जाए, इसका माहौल एक जमात द्वारा बनाया जा रहा है। जो लोग इन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
अब इसके उल्ट दूसरी स्थिति देखिए, गुजरात के गाँधीनगर में ‘I Love Mahadev’ का वॉट्सऐप स्टेटस लगाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक युवक की पिटाई कर दी। यानी आप उनके ‘I Love Muhammad’ जैसा कुछ करने की कोशिश करेंगे तो आप मारे-पीटे जाएँगे। यही नए जमाने का सेक्युलरिज्म है।
इन सारी चीजों को क्रमवार देखने पर लगता है कि यह स्वत: नहीं हो रहा है। बल्कि यह एक चाल है, पहले धीरे-धीरे हिंदुओं की आस्था पर चोट करो, उनकी सीमा जाँचो, उनकी प्रतिक्रिया को तौलो और फिर अगला कदम बढ़ाओ।
हिंदुओं से उम्मीद की जाती है कि वे हमेशा चुपचाप सब सह लें। उन्हें हमेशा समझौता करना है, हमेशा दूसरों को जगह देनी है, हमेशा अपने त्योहारों-परंपराओं को बदलने की आदत डालनी है।
इस मानसिकता को अब बदलने जाने की जरूरत है। हिंदू अगर चुप रहेंगे तो यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। हर बार नए प्रयोग होंगे, हर बार नई चोट लगेगी और धीरे-धीरे पूरी आस्था खोखली कर दी जाएगी। शायद कुछ लोगों की कोशिश भी यही है।


