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भरूच धर्मांतरण केस में गुजरात HC ने FIR रद्द करने से किया इनकार, कहा- इस्लाम अपनाने वाले दूसरों को मजबूर करने के आरोप से नहीं हो सकते बरी: विदेशी फंडिंग का भी खेल

गुजरात हाईकोर्ट ने ब्रिटेन निवासी आरोपित फेफड़ावाला की याचिका खारिज की। अदालत ने कहा, उसने जाँच में सहयोग नहीं किया और भारत लौटकर जाँच में हिस्सा लेने से इंकार किया।

गुजरात हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2025 को हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में आरोपितों द्वारा FIR रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ पहली नजर में (Prima Facie) अपराध बनते हैं।

जस्टिस निर्जर एस देसाई की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। आरोपितों ने 2021 में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की माँग की थी। यह एफआईआर आईपीसी की धारा 120(बी), 153(ए)(1), 153(बी)(1)(सी), 295(ए), 506(2), 466, 467, 468, 471, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(5-ए), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 84(सी) और गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 की धाराओं के तहत दर्ज की गई थी।

अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि चूँकि आरोपित खुद किसी और धर्म से इस्लाम में आए हैं, इसलिए उन्हें इस मामले में आरोपित नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वे पीड़ित नहीं बल्कि दूसरों पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने वाले लोग हैं।

मामले में तीन आरोपित ऐसे हैं जो पहले हिंदू थे और बाद में इस्लाम अपनाया। आरोप है कि इन लोगों ने भरूच जिले के आमोद क्षेत्र के हिंदू ग्रामीणों को धर्म बदलने के लिए नए मकान, अनाज, नकद और नौकरी का लालच दिया।

भरूच धर्मांतरण का क्या है पूरा मामला

भरूच जिले के आमोद पुलिस स्टेशन में 14 नवंबर 2021 को प्रवीन भाई वसंत भाई वसावा नामक व्यक्ति की शिकायत पर धर्म परिवर्तन का मामला दर्ज किया गया। शुरू में एफआईआर में 9 लोगों को आरोपित बनाया गया था, लेकिन जाँच के बाद आरोपितों की संख्या बढ़कर 16 हो गई।

प्रवीन भाई वसावा ने शिकायत में बताया कि साल 2018 में उन्हें लालच देकर इस्लाम धर्म में बदलवाया गया और उनका नाम बदलकर सलमान वसंत पटेल कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अब्दुल अजीज पटेल नाम का व्यक्ति उन्हें एक सरकारी परिसर में बने इबादतगाह में ले जाकर कलमा पढ़ना सिखाता था। एक दिन उसे सूरत ले जाया गया, जहाँ झूठे बहाने से एक कागज पर उसका अँगूठा लगवाया गया और बाद में उसके आधार कार्ड पर नाम बदल दिया गया।

शिकायत के अनुसार, शब्बीर भाई बेकरीवाला और समद भाई बेकरीवाला ने अजितभाई छगनभाई वसावा (जिसका नाम बदलकर अब्दुल अजीज पटेल कर दिया गया) को आर्थिक मदद और मकान बनवाने का लालच देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया। इसके बाद अजितभाई ने दो अन्य हिंदू पुरुषों, महेंद्र जीवनभाई वसावा (नाम बदला गया यूसुफ जीवन पटेल) और रमन बरकत वसावा (नाम बदला गया अय्यूब बरकत पटेल) को भी धर्म परिवर्तन के लिए राजी किया।

इसके बाद ये तीनों, शब्बीर और समदभाई के साथ मिलकर गाँव के अन्य हिंदू लोगों को भी नए घर, राशन और नकद पैसे का लालच देकर इस्लाम में धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने लगे।

शिकायतकर्ता ने बताया कि अब्दुल अजीज पटेल को धर्म परिवर्तन के लिए हसन तिसली नाम के व्यक्ति से आर्थिक सहायता मिलती थी। हसन तिसली, अब्दुल अजीज पटेल और एक विदेशी नागरिक फेफड़ावाला हाजी अब्दुल्ला ने मिलकर करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया।

प्रवीनभाई ने यह भी बताया कि अब्दुल अजीज पटेल ने सरकारी सहायता से बने अपने घर को तोड़कर उसकी जगह इबादतगाह बनाई थी, जहाँ वह लोगों को कलमा सिखाता था। उनका आरोप है कि आरोपित  देशभर में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने की साजिश का हिस्सा हैं और उन्हें इसके लिए विदेशों से भारी आर्थिक मदद मिलती है। जब प्रवीनभाई ने इसका विरोध किया, तो आरोपितों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

उच्च न्यायालय ने आरोपितों को धर्म परिवर्तन का ‘पीड़ित’ मानने से इनकार कर दिया

आरोपितों ने एफआईआर को चुनौती देते हुए कहा कि वे खुद धर्म परिवर्तन के शिकार हैं, अपराधी नहीं। उनका दावा था कि शिकायतकर्ता और अन्य लोगों ने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था, किसी दबाव या लालच में नहीं। इसलिए उन पर कोई अपराध नहीं बनता।

लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से यह साफ दिखता है कि धर्म परिवर्तन के बाद उन्हीं लोगों ने दूसरों पर भी धर्म बदलने का दबाव डाला और उन्हें लालच दिया। आरोप है कि उन्होंने लगभग 37 हिंदू परिवारों के करीब 100 लोगों का इस्लाम में धर्म परिवर्तन कराया।

कोर्ट ने कहा कि यह आरोप पहली नजर में सही लगते हैं (prima facie offence बनता है)। इसलिए यह मानना गलत होगा कि जो लोग पहले हिंदू थे और बाद में इस्लाम में गए, वे इस मामले में पीड़ित हैं।

कोर्ट ने कहा कि “एफआईआर और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट है कि आरोपितों ने अन्य लोगों को इस्लाम अपनाने के लिए प्रभावित किया, दबाव डाला और लालच दिया। जाँच में मिले सबूत और चार्जशीट से यह साबित होता है कि उनके खिलाफ Prima Facie मामला बनता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वे खुद धर्म परिवर्तन के शिकार हैं।”

इस आधार पर अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रायल जारी रहेगा।

जाँच में सहयोग न करने के आधार पर एक आरोपी का आवेदन खारिज कर दिया गया

गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपित फेफड़ावाला की याचिका खारिज कर दी, जो यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) में रहता है। अदालत ने कहा कि फेफड़ावाला ने जाँच में सहयोग नहीं किया, इसलिए उसकी याचिका केवल उसके व्यवहार के आधार पर ही खारिज की जाती है, मामले के मेरिट पर नहीं।

कोर्ट ने बताया कि फेफड़ावाला इस मामले के दर्ज होने से पहले भारत में 25 बार आया था, लेकिन एफआईआर के बाद उसने एक बार भी भारत की यात्रा नहीं की। पुलिस ने उसे जाँच में शामिल होने और सहयोग करने के लिए बुलाया, लेकिन उसने आने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि आरोपित ने न तो अग्रिम जमानत (anticipatory bail) की कोई अर्जी लगाई, न ही किसी भी समय जाँच में शामिल होने की इच्छा दिखाई। उसे सीआरपीसी की धारा 41-ए के तहत समन भी भेजा गया था, जिसका उसने जवाब तो दिया, लेकिन जाँच में उपस्थित नहीं हुआ।

कोर्ट ने कहा कि उसके इस रवैये को देखते हुए याचिका को खारिज किया जाता है, क्योंकि उसने जाँच में कोई सहयोग नहीं किया और खुद को जाँच से दूर रखा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

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