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RSS से ‘हारा’ कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम अब कर रहा बैन की बात, छटपटाहट में चला रहा अभियान: जानें- हर बार ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़ा हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

प्रियाँक का पत्र तो बस एक ट्रिगर है। असल में वामपंथी, कथित सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े आरएसएस से चिढ़ते हैं। वजह? संघ आज उनसे कहीं बड़ा हो चुका है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने का जश्न अभी थमा भी नहीं था कि कर्नाटक की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और राज्य के मंत्री प्रियाँक खरगे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक पत्र लिखकर सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों और मंदिरों में आरएसएस की शाखाओं और कार्यक्रमों पर पूरी तरह बैन लगाने की माँग की है।

खरगे का कहना है कि संघ की ये गतिविधियाँ बच्चों और युवाओं के दिमाग में नकारात्मक और विभाजनकारी विचार भर रही हैं, जो देश की एकता और संविधान के खिलाफ है। ये पत्र 4 अक्टूबर को लिखा गया था, लेकिन 12 अक्टूबर को सीएम ऑफिस ने इसे मीडिया के साथ साझा किया।

सिद्धारमैया ने तुरंत राज्य की मुख्य सचिव शालिनी राजनिश को निर्देश दिए कि इस मामले की पूरी जाँच करें और जरूरी कदम उठाएँ। इससे साफ लग रहा है कि कर्नाटक सरकार में आरएसएस के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की तैयारी चल रही है।

लेकिन ये सिर्फ एक पत्र की बात नहीं है। सोशल मीडिया पर वामपंथी, सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े मिलकर आरएसएस को बैन कराने की मुहिम चला रहे हैं। एक तरफ जहाँ संघ समाज को एकजुट करने का काम कर रहा है, वहीं विपक्षी ताकतें इसे खत्म करने पर तुली हुई हैं। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

प्रियाँक खरगे ने पत्र में क्या लिखा है और क्यों?

प्रियाँक खरगे कर्नाटक सरकार में आईटी, ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री हैं। वो चित्तापुर से विधायक भी हैं। उनके पिता मल्लिकार्जुन खरगे कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं और संघ की विचारधारा के पुराने आलोचक रहे हैं। प्रियाँक ने पत्र में साफ-साफ आरोप लगाया है कि आरएसएस सरकारी स्कूलों, सहायता प्राप्त संस्थानों, खेल के मैदानों, सार्वजनिक पार्कों, धार्मिक ट्रस्टों के मंदिरों और पुरातत्व विभाग के स्थलों पर बिना अनुमति के शाखाएँ चला रही है।

खरगे ने लिखा, “आरएसएस की शाखाओं में लाठी लेकर नारे लगाए जाते हैं, जो बच्चों और युवाओं के मन में नफरत का बीज बोते हैं। ये गतिविधियाँ संविधान की मूल भावना एकता, समानता और अखंडता के खिलाफ हैं। जब समाज में नफरत फैलाने वाली ताकतें सिर उठाती हैं, तो हमें उन्हें रोकने का अधिकार है।” प्रियाँक ने आगे कहा कि देश के बच्चों, युवाओं और समाज के मानसिक स्वास्थ्य के हित में इन सभी गतिविधियों चाहे शाखा हो, संघिक हो या बैठक, इन पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।

ये माँग सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं लग रही। जुलाई 2025 में प्रियाँक ने ही एक बयान दिया था कि अगर कॉन्ग्रेस केंद्र में सत्ता में आती है, तो पूरे देश में आरएसएस पर बैन लगा देंगे। वो बोले थे, “कानूनी प्रक्रिया के तहत हम ऐसा करेंगे।” ये बयान वायरल हो गया था और बीजेपी ने इसे ‘हिंदू-विरोधी’ बताकर हमला बोला था। अब ये पत्र उसी दिशा में एक कदम लग रहा है।

आरएसएस का इतिहास: तीन बार बैन, लेकिन हर बार लौटा और मजबूत हुआ

आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। इसका मकसद था समाज को संगठित करना, अनुशासन सिखाना और राष्ट्रभक्ति जगाना। लेकिन स्वतंत्र भारत में इसे तीन बार बैन का सामना करना पड़ा – तीनों बार कॉन्ग्रेस की सरकारों ने ऐसा किया।

पहला बैन: 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद। नाथूराम गोडसे के आरएसएस से जुड़े होने की बात कही गई (हालाँकि बाद में जाँच में साफ हो गया कि संगठन का इससे कोई लेना-देना नहीं था)। सरदार पटेल ने 4 फरवरी 1948 को बैन लगाया। पटेल ने लिखा था कि आरएसएस की गतिविधियाँ ‘विभाजनकारी’ हैं और देश की सुरक्षा के लिए खतरा। लेकिन 18 महीने बाद 12 जुलाई 1949 को बैन हट गया।

दूसरा बैन: 1975 में इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी के दौरान। आरएसएस को ‘अवैध संगठन’ घोषित कर दिया गया। लाखों स्वयंसेवकों को जेल हुई। लेकिन इमरजेंसी खत्म होते ही 1977 में बैन हटा। इसी दौर में संघ ने भूमिगत आंदोलन चलाया, जो आजादी की लड़ाई जैसा था।

तीसरा बैन: 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद। तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल पर बैन लगाया। लेकिन ट्रिब्यूनल में कोई सबूत न मिलने पर 1993 में बैन हट गया।

इन बैनों के बावजूद आरएसएस ने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। इसके उलट उसने देश के संकटों में हमेशा मदद की। 1962 के भारत-चीन युद्ध में स्वयंसेवकों ने बॉर्डर पर तैनाती की। 1971 के बांग्लादेश युद्ध में शरणार्थियों की मदद की। कोविड-19 में लाखों लोगों को भोजन, दवा पहुँचाई। 2024 में मोदी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों पर 1966 से चले आ रहे आरएसएस गतिविधियों के बैन को हटा दिया। आज संघ के 1 लाख से ज्यादा शाखाएँ हैं, जो 50 हजार से ज्यादा जगहों पर चल रही हैं।

क्यों हो रही है ये मुहिम? चिढ़ की राजनीति या कुछ और?

अब सवाल ये कि आखिर ये सब क्यों हो रहा है? प्रियाँक का पत्र तो बस एक ट्रिगर है। असल में वामपंथी, कथित सेकुलर पार्टियाँ और कुछ इस्लामी कट्टरपंथी धड़े आरएसएस से चिढ़ते हैं। वजह? संघ आज उनसे कहीं बड़ा हो चुका है। 100 साल बाद भी ये संगठन समाज से कटने की बजाय और गहरा रहा है। हिंदू समाज को एकजुट कर रहा है, बिना किसी भेदभाव के। दलित, आदिवासी, पिछड़े सबको साथ लेकर चलता है।

सोशल मीडिया पर देखिए। #BanRSS जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। वामपंथी हैंडल्स जैसे CPI(M) के समर्थक लिख रहे हैं कि “आरएसएस फासीवादी है, इसे कुचलो।”

कुछ सेकुलर पेज बाबरी और गाँधी हत्या के पुराने मुद्दे गढ़ रहे हैं। PFI जैसे बैन संगठनों से जुड़े इस्लामी कट्टरपंथी ग्रुप्स चुपके से इसे बढ़ावा दे रहे हैं।

एक कथित एक्टिविस्ट संदीप ट्विटर पर लिख रहा है, “आरएसएस को बैन कराने के लिए संगठित अभियान चलाओ। सबूत जमा करो।” उसके पोस्ट्स में हजारों रीट्वीट्स हैं। ये मुहिम बिना किसी ठोस सामाजिक, राजनीतिक या कानूनी आधार के चल रही है।

कॉन्ग्रेस को खास समस्या ये है कि आरएसएस ने हमेशा सकारात्मक भूमिका निभाई। विभाजन के दौरान हिंदू शरणार्थियों की रक्षा की। प्राकृतिक आपदाओं में सबसे आगे रहता है। लेकिन विपक्षी ताकतें इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का नाम देकर बदनाम करना चाहती हैं। प्रियाँक का पत्र हास्यास्पद लगता है क्योंकि अगर सरकारी जगहों पर बैन लगेगा, तो कॉन्ग्रेस की रैलियाँ, वामपंथियों की मीटिंग्स, सब पर क्या असर पड़ेगा? ये तो समाज की मूल कार्यप्रणाली के खिलाफ है।

बीजेपी ने इस पर तीखा पलटवार किया है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा, “नेहरू, इंदिरा, सोनिया – सबने बैन लगाने की कोशिश की, सब फेल हो गए। प्रियाँक कौन होते हैं?”

कर्नाटक बीजेपी चीफ बीवाई विजयेंद्र बोले, “कॉन्ग्रेस अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए ये कर रही है। आरएसएस की लोकप्रियता उन्हें चुभ रही है।”

एक लड़के का सुसाइड: शोषण के आरोप और हकीकत

इस मुहिम को हवा देने के लिए एक और घटना का सहारा लिया जा रहा है। एक लड़के ने सुसाइड कर लिया और उसके सुसाइड नोट में लिखा कि आरएसएस के शिविर में शोषण हुआ था। ये खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वामपंथी और कॉन्ग्रेस समर्थक इसे भुनाने में जुटे हैं। लेकिन जाँच में साफ हो गया कि लड़के का संघ से कोई सीधा संबंध नहीं था। ये अफवाहें फैलाई जा रही हैं ताकि संघ की छवि खराब हो। संघ के शिविर तो लाखों युवाओं को अनुशासन और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं। ऐसे आरोप बिना सबूत के लगाना अन्याय है।

समाज से कटते विपक्षी, बढ़ता संघ का विस्तार

दरअसल, असली चिढ़ की वजह ये है कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी समाज से कटते जा रहे हैं। उनकी रैलियाँ तो सार्वजनिक जगहों पर होती हैं, लेकिन वो समाज की जड़ों तक नहीं पहुंच पाते। जबकि आरएसएस 100 साल बाद भी बढ़ रहा है। गाँव-गाँव में शाखाएँ, सेवा कार्य, आपदा राहत, ये सब समाज को घोल-मिल रहा है। दलित एकता के कार्यक्रम जैसे समरसता संनाद चलाता है। महिलाओं के लिए संघिका शाखाएं हैं। ये सब देखकर विपक्ष जलता है।

कर्नाटक में ये मुहिम राज्य की आंतरिक कलह से भी जुड़ी लग रही। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच सीएम पद की जंग चल रही है। महिलाओं पर अपराध बढ़ने, मातृ मृत्यु दर ऊँची होने जैसे मुद्दों पर सरकार घिरी हुई है। ऐसे में आरएसएस बैन का मुद्दा ध्यान भटकाने का हथियार बन गया। लेकिन जनता समझदार है।

बैन की धमकी, लेकिन संघ अटल

ये सब देखकर लगता है कि आरएसएस पर बैन की माँग राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। कोई कानूनी आधार नहीं, बस चिढ़। संघ ने कभी सत्ता की भूख नहीं की, लेकिन सेवा से सबका दिल जीता। अगर कर्नाटक में बैन लगा भी, तो इतिहास गवाह है कि संघ और मजबूत लौटेगा। समाज को एकजुट करने वाला संगठन कभी खत्म नहीं हो सकता। ये मुहिम असफल होगी, जैसे पहले हुईं। जनता तय करेगी कि कौन सही है- नफरत फैलाने वाले या पूरे समाज को एकता के सूत्र में पिरोने वाले।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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