Homeविचारसामाजिक मुद्देशब्दोत्सव: भारत अभ्युदय की वैचारिक क्रांति का प्रारंभ, एक नया साहित्यिक मंच-एक स्पष्ट दिशा

शब्दोत्सव: भारत अभ्युदय की वैचारिक क्रांति का प्रारंभ, एक नया साहित्यिक मंच-एक स्पष्ट दिशा

शब्दोत्सव केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक दिशा है। यह साबित करता है कि साहित्य और संस्कृति का उत्सव विभाजनकारी स्वरों के बिना, राष्ट्रप्रेम और भक्ति के साथ मनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह अन्य आयोजनों के लिए प्रेरणा और प्रतिस्पर्धी मानक बनेगा। यह किसी की नकल नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान वाला मंच है।

नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में 02 से 04 जनवरी 2026 तक आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ केवल तीन दिनों का सांस्कृतिक-साहित्यिक आयोजन नहीं था। यह भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना के पुनर्जागरण का शंखनाद था। दिल्ली सरकार तथा सुरुचि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव ने साहित्यिक उत्सवों की दुनिया में एक नया मानदंड स्थापित किया।

जहाँ दशकों से कुछ साहित्यिक मंचों पर एक विशेष विचारधारा का वर्चस्व रहा है, वहाँ शब्दोत्सव ने राष्ट्रप्रेम, भक्ति, एकता और भारतीयता को केंद्र में रखकर एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत की। यह न जश्न-ए-रेख्ता की नकल था, न जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की, न ही अन्य किसी मौजूदा आयोजन की। यह अपना स्वतंत्र शब्दोत्सव था – एक स्पष्ट दिशा और मंशा वाला मंच।

इस आयोजन की थीम ‘भारत अभ्युदय’ थी, जो वैदिक काल से डिजिटल युग तक भारत की यात्रा का प्रतीक बनी। उद्घाटन समारोह में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यह भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय है।

मंच से गूँजी राष्ट्रप्रेम और हिंदुत्व की पुकार

शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहाँ कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूँजा, कोई देशविरोधी एजेंडा नहीं था। बच्चे और युवा ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों पर नहीं, बल्कि श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए। साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्टेडियम को भक्ति और देशप्रेम की लहर से भर दिया। लोकगीतों और नृत्यों ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया।

कार्यक्रम में शामिल हुए सुनील आंबेकर, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, दिल्ली मंत्री कपिल मिश्रा और हर्षवर्धन त्रिपाठी

पहले दिन का मुख्य सत्र ‘संघे शक्ति कलियुगे’ था, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भाग लिया। उन्होंने वंदे मातरम को बंगाल विभाजन के समय का मंत्र बताते हुए कहा कि डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना सामाजिक सुधार और एकता के लिए की थी। हिंदुत्व को भारत को एकता के सूत्र में बाँधने वाला बताया। आंबेकर जी ने स्पष्ट किया कि संघ सबसे बड़ा संगठन बनने की लालसा नहीं रखता, बल्कि समाज में समरसता स्थापित करना चाहता है। पंच परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक सुधार पर जोर दिया।

शब्दोत्सव में पहुँचे वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु जैन

अन्य सत्रों में न्यायिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर गहन विमर्श हुआ। ‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’ सत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विक्रमजीत बनर्जी, अमन लेखी और सिद्धार्थ लूथरा ने भाग लिया। विष्णु शंकर जैन ने मथुरा जन्मभूमि और ज्ञानवापी जैसे मुद्दों पर बात की, साथ ही संविधान में आपातकाल के दौरान जोड़े गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को सबसे बड़ा छल बताया। अमन लेखी ने हिंदुत्व को विराट विचार करार दिया। विक्रमजीत बनर्जी ने समान नागरिक संहिता की वकालत की।

‘जनरेशन जी: विकसित भारत के सारथी’ सत्र में चंद्रप्रकाश द्विवेदी, विशाल चौरसिया, भाषा संभाली और अभिलिप्सा पांडा जैसे युवा हस्तियों ने भाग लिया। द्विवेदी जी ने प्राचीन युवा नायकों जैसे प्रहलाद और ध्रुव का उदाहरण दिया। विशाल चौरसिया ने आदि शंकराचार्य को पहला इंटरप्रेन्योर बताया। अभिलिप्सा पांडा ने भक्ति और लक्ष्य निर्धारण पर जोर दिया।

कपिल मिश्रा ने बताया- वैचारिक आतंकवाद पर सर्जिकल स्ट्राइक

दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति, भाषा एवं पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा की प्रमुख भूमिका रही।। वे इस उत्सव के मुख्य सहयोगी एवं संरक्षक थे। कपिल मिश्रा ने इसे वैचारिक आतंकवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की संज्ञा दी तथा राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाले आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने उद्घाटन समारोह में सक्रिय भागीदारी निभाई तथा युवाओं को नक्सली एवं जिहादी विचारधारा से दूर रखने की बात कही। उन्होंने कहा,

“जब कोई पत्थर उठता है सेना के ऊपर, पुलिस के ऊपर या मंदिर के ऊपर, वो पत्थर हाथ में बाद में आता है दिमाग में पहले आता है। कोई नक्सलवादी, जिहादी जब बंदूक उठाता है या कोई डॉक्टर फट जाता है, तो उनके पास बम हाथ में बाद में दिमाग में पहले आता है। इस वैचारिक आतंकवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जरूरत है।”

धर्मरक्षक धामी के साथ संवाद

एक सत्र में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मुख्य अतिथि थे। ‘धर्मरक्षक धामी’ विषय पर संवाद में उन्होंने देवभूमि की सांस्कृतिक चेतना और लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई की बात की। 600 से अधिक अवैध ढांचों को हटाने और समान नागरिक संहिता लागू करने का उल्लेख करते हुए कहा कि शब्दोत्सव भारतीय संस्कृति का संवाहक बनेगा।

शब्दोत्सव में शामिल हुए उत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर धामी

कुतुब मीनार पर नया विमर्श सनातन विरासत की पुकार

शब्दोत्सव में एक महत्वपूर्ण चर्चा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा के दावों पर केंद्रित रही। उन्होंने कुतुब मीनार को प्राचीन विष्णु वेदशाला बताया। आधार आयताकार होने, 27 खिड़कियों, दक्षिणायन सूर्य की छाया और छठी शताब्दी के श्लोकों का हवाला देते हुए कहा कि यह सनातन वास्तुकला का प्रमाण है। मरम्मत के दौरान मिली गणेश जी की आकृति जैसे प्रमाणों ने दर्शकों को चकित किया।

इस दावे के बाद काशी के संतों ने माँग उठाई कि कुतुब मीनार सनातनियों को सौंपा जाए और वहाँ भव्य विष्णु मंदिर का निर्माण हो। पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर बालक देवाचार्य महाराज ने कहा कि मुस्लिम शासन में मंदिर तोड़कर संरचनाएँ बनाई गईं, लेकिन आज भी हिंदू देवताओं के चिह्न मौजूद हैं। सरकार से सनातन भावनाओं का सम्मान करने की अपील की। यह विमर्श शब्दोत्सव की वैचारिक गहराई को दर्शाता है, जहाँ इतिहास के मिथकों को तोड़कर नया विमर्श मुखर हुआ।

युवाओं का उत्साह और भविष्य की चुनौती

शब्दोत्सव में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखी गई। ओपन माइक ने उन्हें अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करने का मंच दिया। दिल्ली-एनसीआर के 40 विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने उत्साह दिखाया। यह आयोजन साबित करता है कि सोशल मीडिया के युग में भी युवा अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं, बशर्ते उन्हें सकारात्मक और राष्ट्रवादी मंच मिले।

शब्दोत्सव में शामिल हुए बड़ी तादाद में लोग

कुछ आलोचक ऐसा कह सकते हैं कि इसके पीछे कोई स्पष्ट योजना या दृष्टि नहीं है। लेकिन यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। शब्दोत्सव दिशाहीन नहीं है; इसकी दिशा बिल्कुल साफ और स्पष्ट है। जब कोई आयोजन अपनी निर्धारित दिशा में आगे बढ़ता है, तो उस पर विश्वास स्वतः जागृत हो जाता है। यदि चुना हुआ रास्ता सही है, तो यात्रा अवश्य मंजिल तक पहुँचेगी। अभी उत्सव अपनी शैशवावस्था में है।

यदि यह आयोजन बिना बाधा के पाँच वर्ष तक जारी रहता है, तो यह अन्य साहित्यिक उत्सवों के लिए मिसाल बनेगा। लोग जयपुर या अन्य फेस्टिवलों की तुलना शब्दोत्सव से करेंगे।

एक नई शुरुआत, एक मजबूत विकल्प

शब्दोत्सव केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक दिशा है। यह साबित करता है कि साहित्य और संस्कृति का उत्सव विभाजनकारी स्वरों के बिना, राष्ट्रप्रेम और भक्ति के साथ मनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह अन्य आयोजनों के लिए प्रेरणा और प्रतिस्पर्धी मानक बनेगा। यह किसी की नकल नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान वाला मंच है। यदि चुना रास्ता सही है, तो मंजिल अवश्य मिलेगी। शब्दोत्सव भारत अभ्युदय का प्रतीक बनकर उभरा है – एक वैचारिक परिवर्तन का आरंभ।

आयोजन की सफलता में सुरुचि प्रकाशन के प्रमुख राजीव तुली का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने समन्वय एवं संगठन की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा दिल्ली सरकार में विधायक राजकुमार भाटिया, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल पांडेय तथा वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने आयोजन समिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें कार्यक्रमों की रूपरेखा, वक्ताओं का चयन एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का प्रबंधन शामिल था। इनके समर्पित प्रयासों से शब्दोत्सव दिल्ली की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में स्थापित होने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

तीन दिनों में 100 से अधिक वक्ताओं ने भाग लिया, 40 से ज्यादा पुस्तकों का विमोचन हुआ, लोकनृत्य, भक्ति संगीत और ओपन माइक जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं को आकर्षित किया। हजारों दर्शकों की उपस्थिति ने साबित किया कि राष्ट्रवादी और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित आयोजन भी व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त कर सकता है।

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आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।

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