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याकूब मेमन से उमर खालिद तक: जब ‘न्याय’ इस्लामी-वाम गठजोड़ के मजहबी नैरेटिव को चुभने लगता है

जब अदालतें कानून के अनुसार फैसला देती हैं, तो एक खास वैचारिक गिरोह 'मजहबी भावना' का कार्ड क्यों खेलता है? याकूब मेमन से उमर खालिद तक, पूरा पैटर्न पढ़िए।

धर्मेण राज्यं धार्यते- अर्थात धर्म (न्याय) से ही राज्य/शासन संचालित होता है। म​हाभारत में विशेषकर शांति पर्व और अनुशासन पर्व में यह भाव बार-बार आता है। मनुस्मृति के राजधर्म में भी यही भाव है। कौटिल्य ने राज्य के संचालन और न्याय के संदर्भ में जो सिद्धांत दिए हैं, वहाँ भी यही भाव प्रबल है।

पितामह भीष्म शांतिपर्व में युधिष्ठिर से कहते भी हैं कि राजा का पहला कर्तव्य न्याय है और न्याय का मूल आधार धर्म है, न कि लोकभावना। कुल मिलाकर भारतीय परंपरा में यह भाव सर्वदा से रहा है कि राज्य भावना से नहीं, धर्म से चलता है, और धर्म का अर्थ है- न्याय, नियम, मर्यादा।

आधुनिक व्यवस्था में भी यही भाव न्याय व्यवस्था का आधार है। भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह न तो किसी व्यक्ति से संचालित है और न भीड़ से निर्देशित। किंतु एक संगठित वैचारिक गिरोह ने बार-बार न्याय व्यवस्था को उस भीड़तंत्र में खींच लाने का प्रयास किया है, जिसमें कानून के बदले संवेदना, साक्ष्य के बदले मजहबी पहचान और न्याय के बदले नैरेटिव निर्णायक बन जाए।

जब-जब किसी इस्लामी आतंकी, वामपंथी विचारक या तथाकथित ‘अल्पसंख्यक प्रतीक’ को मनचाहा निर्णय नहीं मिलता है, तब-तब न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए इस्लामी-वाम गठजोड़ की यह साजिश प्रबल हो जाती है। संविधान खतरे में है, मानवाधिकार, लोकतंत्र मर रहा है, न्यायपालिका फासीवाद के आगे झुक गई- जैसे शोर सुनाई पड़ने लगते हैं।

यह ऐसा पैटर्न है जो पिछले कुछ वर्षों में याकूब मेमन से लेकर उमर खालिद तक बार-बार दोहराया गया है। मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर लेफ्ट-लिबरल विचारकों और तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों तक, सब एक सुर में न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। सवाल यह नहीं होता कि कानून क्या कहता है, सवाल यह बना दिया जाता है कि ‘मजहबी पहचान वाली भीड़ की भावना’ क्या चाहती है।

उमर खालिद-शरजील इमाम: मजहबी पहचान ही सब कुछ

उमर खालिद और शरजील इमाम, दोनों पर देश को तोड़ने वाले भाषणों, हिंसा भड़काने और राष्ट्रविरोधी साजिशों के गंभीर आरोप हैं। अदालतें साक्ष्य देख रही हैं, प्रक्रिया का पालन कर रही हैं।

लेकिन वाम-लिबरल जमात के लिए यह अस्वीकार्य है। उनके लिए जमानत कानूनी राहत नहीं, वैचारिक हक है। जब जमानत नहीं मिलती तो कोर्ट ‘असंवेदनशील’ हो जाती है।

इस पूरे विमर्श में इस बुनियादी सत्य को परे रख दिया जाता है कि कानून भावनाओं से नहीं चलता। जमानत का प्रश्न आरोपों की गंभीरता, साक्ष्यों, आरोपित की भूमिका और जाँच की स्थिति से तय होता है। फिर भी, हर बार जब ऐसे मामलों में अदालतें कानून के अनुरूप निर्णय देती हैं, तो न्याय ‘असंवेदनशील’ है का एक संगठित नैरेटिव शुरू हो जाता है।

यह वही ‘संवेदनशीलता’ है जो 2020 के दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के पीड़ितों के लिए नहीं दिखती। वही मीडिया जो आज जमानत न मिलने पर करुणा बरसा रहा है, उसने तब हिंसा, आगजनी और हत्या के पीड़ितों के लिए उतनी ही आक्रामक आवाज नहीं उठाई।

क्या संवेदनशीलता की परिभाषा मजहबी पहचान के आधार पर तय होगी?

कुलदीप सेंगर की जमानत पर हायतौबा

दिलचस्प यह है कि उमर खालिद और शरजील इमाम को कानूनी राहत नहीं मिलने पर कंद्रन करने वाले इसी गैंग ने कुलदीप सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत मिलने पर हायतौबा मचा दी थी। तब भी समस्या जमानत की कानूनी शर्तें नहीं थीं। समस्या यह थी कि अदालत ने भीड़ की माँग के अनुरूप निर्णय नहीं दिया। संदेश साफ था- या तो हमारी नैतिकता के अनुसार फैसला करो या ‘संवेदनहीन’ कहलाओ।

यह दोहरा मानदंड संयोग नहीं है। एक ओर, यदि आरोपित किसी खास विचार या मजहबी पहचान से जुड़ा हो, तो जमानत ‘मानवाधिकार’ बन जाती है। दूसरी ओर, यदि आरोपित उस पहचान के बाहर हो, तो वही जमानत ‘न्याय का अपमान’ घोषित कर दी जाती है। यह न्याय नहीं, पहचान आधारित नैतिकता है। आरोपित की पहचान (हिंदू) के कारण न्याय (जमानत के कानूनी अधिकार) को संदिग्ध रूप में प्रचारित किया गया।

याकूब मेमन: आतंक नहीं मजहबी पहचान महत्वपूर्ण

30 जुलाई 2015 की वह रात भारतीय न्यायिक इतिहास में दर्ज है। मुंबई बम धमाकों का दोषी आतंकी याकूब मेमन। वर्षों की सुनवाई, अपीलें, पुनर्विचार- सब कुछ हो चुका था। फिर भी सुबह-सुबह सुप्रीम कोर्ट को खोलने की हड़बड़ी, मानो देश किसी ‘न्यायिक आपातकाल’ से गुजर रहा हो।

कौन पहुँचा था? वही गिरोह- वही वकील, वही एक्टिविस्ट, वही टीवी चेहरे। भाव वही- आतंकी (मजहबी पहचान) के लिए दया, पीड़ितों के लिए मौन।

यहाँ सवाल फाँसी का नहीं था। सवाल यह था कि क्या आतंक की सजा भी पहचान देखकर तय होगी?

क्या ‘मुस्लिम होना’ कानून से ऊपर होने का प्रमाण-पत्र है?

कार्तिगई दीपम: हिंदू आस्था को वैध ठहराना अपराध

तमिलनाडु के कार्तिगई दीपम उत्सव पर निर्णय देने वाले जस्टिस स्वामीनाथन के विरुद्ध महाभियोग तक की बात चली। कारण? फैसला हिंदू परंपरा के पक्ष में था।

संदेश स्पष्ट था- यदि आप अदालत में बैठकर हिंदू आस्था को वैध ठहराएँगे तो आपकी कुर्सी भी अस्थिर की जाएगी।

राम मंदिर, जस्टिस गोगोई और जस्टिस चंद्रचूड़

राम मंदिर पर ऐतिहासिक निर्णय देने के बाद जस्टिस रंजन गोगोई को निशाने पर रखा गया। हर निर्णय, हर नियुक्ति को उसी फैसले से जोड़कर देखा गया।

इतना ही नहीं, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गणेश पूजा की एक तस्वीर सामने आने के बाद यह माहौल बनाया गया कि न्यायाधीश का आस्था से जुड़ना भी अपराध है। न्यायपालिका ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है।

क्या न्यायाधीश केवल वही होंगे जो ईश्वरविहीन, परंपराविहीन और जड़ों से कटे होंगे?

मुस्लिम आरोपित और ‘संवेदनशीलता’ का कवच

भारतीय न्यायपालिका पर दबाव बनाने का यह इतिहास नया नहीं है। इस्लामी आतंकवाद से जुड़े अनेक मामलों में, चाहे वे प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े आरोपित हों या दंगों और हिंसा के प्रकरण- हर बार एक तयशुदा स्क्रिप्ट सक्रिय हो जाती है। गिरफ्तारी ‘उत्पीड़न’ कहलाती है, चार्जशीट ‘राजनीतिक बदला’ और सुनवाई ‘इस्लामोफोबिया’।

ये वही लोग हैं जिन्होंने वर्षों तक यह स्थापित करने की कोशिश की कि यदि आरोपित मुस्लिम है, तो कानून को अतिरिक्त ‘संवेदनशील’ होना चाहिए। मानो कानून की आँखों पर भी मजहबी चश्मा चढ़ा दिया जाए। यह दबाव केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता। यह अदालतों के वातावरण, सार्वजनिक बहस और प्रशासनिक निर्णयों तक पहुँचता है।

‘अल्पसंख्यक’ राजनीति का दबाव

यह छिपा तथ्य नहीं है कि कुछ वैचारिक समूह न्यायपालिका और प्रशासन पर नैरेटिव प्रेशर बनाते रहे हैं। ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर हर कानूनी प्रक्रिया को संदिग्ध ठहराने की कोशिश होती है। जब आरोपित एक खास वैचारिक-मजहबी पहचान से आता है, तो अपराध ‘राजनीतिक असहमति’ में बदल दिया जाता है।

यही संस्थागत दबाव है। अदालत से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून नहीं, भीड़ की मजहबी भावना देखे। साक्ष्य नहीं, सोशल मीडिया ट्रेंड गिने। निर्णय नहीं दे, भावनाओं को साधे।

यह न्याय नहीं, तुष्टिकरण है।

पीड़ितों पर मौन, आरोपित की ‘भावना’ पर प्राइम टाइम

इस तुष्टिकरण को मेनस्ट्रीम मीडिया भी खाद-पानी देने का काम करता है। उसका एक बड़ा हिस्सा प्रश्न पूछने की जगह निर्णय देता है। अदालत के आदेशों को संदर्भ से काटकर पेश करता है। न्यायाधीशों पर नैतिक दबाव बनाता है। यह पत्रकारिता नहीं, वैचारिक सक्रियता है। यह वही मीडिया है जो पीड़ितों की पीड़ा पर अक्सर मौन रहता है, लेकिन आरोपित की ‘भावना’ पर घंटों प्राइम टाइम चलाता है।

भीड़ का नैरेटिव बनाम न्याय की प्रक्रिया

भीड़ को त्वरित परिणाम चाहिए। कानून समय लेता है। भीड़ नारे चाहती है। कानून दस्तावेज। भीड़ भावनात्मक संतुष्टि खोजती है। कानून सत्य। यही कारण है कि जब अदालतें भीड़ के अनुरूप नहीं चलतीं, तो उन्हें ‘लोकतंत्र विरोधी’ ठहराया जाता है।

उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों में अदालतों ने यही किया। भावना के शोर से अलग रहकर कानून का पालन। यही बात इस्लामी-वाम गठजोड़ को असहज करती है।

वैदिक दृष्टि: ‘भावना’ से नहीं न्याय

भारतीय वैदिक परंपरा में न्याय को कभी भावना के अधीन नहीं रखा गया। न धर्मात् परो धर्मः, अर्थात धर्म (न्याय) से ऊपर कुछ नहीं है। मनुस्मृति कहती है- जब न्याय नष्ट होता है, तब प्रजा नष्ट होती है। न राजा, न शत्रु, कोई नहीं बचता।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा में न्यायाधीश को दबाव से मुक्त, भय से परे और आस्था विहीन नहीं, बल्कि धर्म (न्याय) निष्ठ माना गया है। न्याय का अर्थ करुणा नहीं, धर्म (न्याय) सम्मत निर्णय है। करुणा व्यक्ति के लिए हो सकती है, न्याय व्यवस्था के लिए नहीं। यही मूल अंतर है, जिसे आज के विमर्श में जानबूझकर मिटाया जा रहा है।

जो समाज न्याय को भावनात्मक ब्लैकमेल के हवाले कर देता है, वह अंततः पीड़ितों के साथ विश्वासघात करता है। वैदिक परंपरा ने हमें सिखाया है कि न्याय का धर्म दबाव/पहचान से ऊपर होता है।

न्याय को बचाने के लिए, न्याय को भावना से मुक्त रखना ही होगा। जब अदालतें भीड़ से डरने लगेंगी, तो लोकतंत्र नहीं, अराजकता जन्म लेगी।

‘सर तन से जुदा’ वाली वही अराजकता जो हम आज सड़कों पर देखते हैं।

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अजीत झा
अजीत झा
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