वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी) को जब अपना 9वाँ बजट पेश कर रही हैं, तो पूरा देश ‘विकसित भारत’ की चमक और 50 लाख नौकरियों के वादे के साथ भविष्य की ओर देख रहा है। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक दौर वह भी था जब साल 1973 में इंदिरा गाँधी के शासनकाल के दौरान ‘ब्लैक बजट’ पेश किया गया था। यह वह काला समय था जब सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और अदूरदर्शिता ने देश को भुखमरी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। आज के आत्मनिर्भर भारत और उस दौर की बेबसी के बीच जमीन-आसमान का फर्क है।
इंदिरा गाँधी का ‘ब्लैक बजट’: जब सरकारी तिजोरी में बचा था सिर्फ ‘अंधेरा’
साल 1973 का बजट भारतीय इतिहास में किसी डरावने सपने जैसा था। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव बी चव्हाण ने जब यह बजट पढ़ा, तो इसमें विकास की नहीं बल्कि बर्बादी की इबारत लिखी थी। उस समय सरकार को 550 करोड़ रुपए का भारी-भरकम घाटा हुआ था, जिसे आज हम राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) कहते हैं। उस दौर के हिसाब से यह आँकड़ा इतना बड़ा था कि इसने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी।
राजकोषीय घाटा दरअसल सरकार की नाकामी का रिपोर्ट कार्ड होता है, जो बताता है कि आपकी कमाई से कहीं ज्यादा आपके खर्चे हैं। इंदिरा गाँधी के दौर में यह घाटा इसलिए बढ़ा क्योंकि सरकार ने आर्थिक अनुशासन को ताक पर रख दिया था। आम बोलचाल में कहें तो यह ‘कमाई अठन्नी और खर्चा रुपैया’ वाला हाल था। खजाना खाली था, लेकिन सरकार के पास फिजूलखर्ची और संकट को संभालने की कोई ठोस योजना नहीं थी। इसी वित्तीय अंधकार की वजह से इसे ‘ब्लैक बजट’ कहा गया, जिसने आने वाले सालों के लिए महँगाई और कंगाली का रास्ता खोल दिया।
आसान शब्दों में उदाहरण के सहित समझाते हैं कि फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) या राजकोषीय घाटा क्या होता है। दरअसल, राजकोषीय घाटा सरकार की आर्थिक सेहत का रिपोर्ट कार्ड होता है। यह बताता है कि सरकार अपनी कुल कमाई (जैसे टैक्स और अन्य स्रोतों से होने वाली आय) के मुकाबले कितना ज्यादा खर्च कर रही है। मान लीजिए, सरकार की जेब में टैक्स और अन्य रास्तों से ₹100 आए, लेकिन उसने देश के विकास, सैलरी और पुरानी योजनाओं पर ₹120 खर्च कर दिए। अब यह जो ₹20 का अंतर है, वही ‘फिस्कल डेफिसिट’ कहलाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार या अन्य संस्थाओं से कर्ज लेना पड़ता है।
अहंकार और गलत फैसलों की तिहरी मार: युद्ध, सूखा और सरकारी बेबसी
इंदिरा गाँधी की सरकार अपनी हर नाकामी का ठीकरा 1971 के युद्ध पर फोड़ती रही, लेकिन असल सच उनकी नीतियों की विफलता थी। युद्ध के बाद करीब 1 करोड़ शरणार्थियों का बोझ भारत पर पड़ा, लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई इमरजेंसी फंड या आर्थिक बैकअप तैयार नहीं किया था। रक्षा बजट अचानक बढ़ाकर 1600 करोड़ रुपए कर दिया गया, जबकि आम जनता की थाली से रोटी गायब हो रही थी।
मुसीबत तब और बढ़ गई जब 1972-73 में भीषण सूखा पड़ा। इंदिरा गाँधी की सरकार के पास कृषि को लेकर कोई दूरदर्शी सोच नहीं थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। गाँवों में लोग भूख से मरने लगे और भुखमरी का वो काल पैदा हुआ जिसने लाखों परिवारों को उजाड़ दिया। देश के पास अपना पेट भरने के लिए अनाज तक नहीं था। मजबूरन, भारत को विदेशों के सामने हाथ फैलाने पड़े और 20 लाख टन अनाज मँगाना पड़ा। इस आयात पर 160 करोड़ रुपए खर्च हुए, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी लगभग खत्म हो गया। यह एक ऐसे नेतृत्व की कहानी थी जिसने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय दूसरों पर निर्भर बना दिया।
राष्ट्रीयकरण का ढोंग और बेपटरी होती अर्थव्यवस्था
अपनी विफलताओं को छिपाने और सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए इंदिरा गाँधी की सरकार ने ‘राष्ट्रीयकरण’ का सहारा लिया। कोयला खदानों, तांबा कंपनियों और बीमा कंपनियों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सरकार ने कोयला खदानों पर कब्जे के लिए 56 करोड़ रुपए फूँक दिए, लेकिन इसका लाभ जनता को मिलने के बजाय सरकारी तंत्र और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। बिजली संकट कम होने के बजाय और गहरा गया क्योंकि सरकारी नियंत्रण में आते ही इन उद्योगों में सुस्ती छा गई।
इसके अलावा, सरकार ने सूखा राहत के नाम पर 220 करोड़ रुपए बाँटने का दावा किया, लेकिन धरातल पर लोग दाने-दाने को तरसते रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं, तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और महँगाई को बेलगाम होने दिया। 1973 का यह बजट दरअसल एक ऐसी सरकार की स्वीकारोक्ति थी जिसने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह घुटने टेक दिए थे।
बेबसी के ‘ब्लैक बजट’ से आत्मनिर्भर भारत का उदय
आज जब हम निर्मला सीतारमण के बजट को देखते हैं, तो हमें स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ की मजबूत नींव दिखाई देती है। 1973 का वह काला दौर और आज का स्वर्ण काल एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव हैं। जहाँ इंदिरा गाँधी के समय भारत विदेशों से मिलने वाले अनाज और कर्ज पर निर्भर था और पलता था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज भारत दुनिया को अनाज, तकनीक और वैक्सीन निर्यात कर रहा है।
मोदी सरकार के बजट ने यह साबित कर दिया है कि असली विकास वह है जहाँ देश अपनी क्षमताओं पर भरोसा करे। आज बजट का पैसा राजमार्गों, बंदरगाहों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो रहा है, न कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। 1973 के ब्लैक बजट ने देश को भुखमरी की छवि दी थी, लेकिन आज का बजट मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत देता है और छोटे व्यापारियों को पंख देता है। यह सफर बेबसी से ‘बॉस’ बनने का है। 1973 की उन डरावनी यादों से निकलकर आज भारत एक ऐसी आर्थिक महाशक्ति बन गया है, जो अब किसी के सामने झुकता नहीं, बल्कि दुनिया को रास्ता दिखाता है। इंदिरा गाँधी का वह दौर एक चेतावनी थी और मोदी का यह दौर एक नई आशा का सूर्योदय है।


