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नेहरू की किस मानसिकता के कारण भारत को चीन से मिली पराजय, कॉन्ग्रेस शासन की विफलता की साहित्यिक समीक्षा

भारत ने अब तक जितने भी युद्ध किए उसमें सबसे अधिक अपमानजनक हार 1962 के चीन युद्ध में हुई। यह हार हमारी सेना के माथे पर ऐसा कलंक है, जिसे आज तक नहीं धोया जा सका। इस पराजय का कारण हमारी सेना नहीं बल्कि तत्कालीन सत्ता थी।

विश्व इतिहास साक्षी है कि भारत ने अपने शौर्य और शक्ति प्रदर्शन के लिए किसी भी देश की सांस्कृतिक, धार्मिक अस्मिता और इतिहास को ध्वस्त करने का प्रयास नहीं किया। क्योंकि किसी पर अधिपत्य रखना हमारा का स्वभाव नहीं है। हमारे देश में आक्रमणकारी शक्तियाँ आईं, भारत ने अपने सामर्थ्य से उन्हें अपने में ही विलीन कर लिया। किसी देश ने जब तक हमारी सामाजिक समरसता और सद्भावना को भंग करने का प्रयास नहीं किया, हमने युद्ध नहीं किया क्योंकि हम युद्ध नहीं बुद्ध के समर्थक है।

अगर कभी युद्ध की स्थिति बनी तो हमारे जवानों ने बिना हार–जीत की चिंता किए पूरी ताकत से युद्ध किया। राजनीति रूप से या राष्ट्रवादी भाव रखने के कारण मैं कई बार कॉन्ग्रेस की नाकामियों को सामने लाने का प्रयास करता हूँ। इस बार चीन से हार की साहित्यिक समीक्षा आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ।

स्वतंत्रता के बाद जो भारत हमें मिला, वह हमारे सपनों का भारत नहीं था। संघ और राष्ट्रवादी विचारकों ने हमेशा अखंड भारत का स्वप्न देखा और उसे बचाए रखने के लिए अपने प्राणों की बाजी तक लगा दी। भारत ने अब तक जितने भी युद्ध किए उसमें सबसे अधिक अपमानजनक हार 1962 के चीन युद्ध में हुई। यह हार हमारी सेना के माथे पर ऐसा कलंक है, जिसे आज तक नहीं धोया जा सका।

इस पराजय का कारण हमारी सेना नहीं बल्कि तत्कालीन सत्ता थी। नेहरू ऊपर से भारतीय लेकिन रहन-सहन, खान-पान और विचारों से पूरी तरह विदेशी थे। वह किसी भी शर्त पर भारत में केवल अपनी सत्ता बनाए रखने की कोशिश में थे, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कौन सा देश कब भारत में घुसकर उसका कुछ हिस्सा कब्जा करके भारत भूमि को खंडित कर रहा है। 1962 का युद्ध इसी का प्रमाण है। इसी युद्ध को केंद्रित करके विख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर ने ’परशुराम की प्रतीक्षा’ नामक खंडकाव्य लिखा, जो चीन युद्ध में उनकी उदासीनता को सामने लाती है। यह खंडकाव्य तत्कालीन सत्ता की नाकामियों के साथ उसकी राष्ट्रविरोधी नीति के खिलाफ भी खुलकर चर्चा करता है।

चीन से पराजय आम जनता के लिए मात्र एक सूचना थी लेकिन सत्ता में बैठे लोग यह भली–भांति समझ रहे थे कि यह हार नहीं राष्ट्र से नेहरू का विश्वासघात था। चीन के युद्ध में सेना को सही समय पर और आवश्यक युद्ध सामग्री नहीं भेजी गई जो पराजय का सबसे बड़ा कारण बनी। साथ भी सेना प्रमुख पर युद्ध से वापसी के लिए दबाव बनाया गया। नेहरू की देवताओं वाली जो छवि राजनीतिज्ञ और साहित्यकार बनाने का प्रयास कर रहे थे उसे ध्वस्त करते हुए दिनकर ने लिखा–

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली।)

दिनकर ने जिस समय यह खंडकाव्य लिखा उस समय वह नेहरू सरकार में ही राज्यसभा सदस्य थे। दिनकर राष्ट्रवादी विचारों के साहित्यकार थे उनके लिए राष्ट्र सर्वप्रथम था। जब चीन से भारत को अपनों के कारण साजिशन हार मिली तब दिनकर ने सत्ता के विरोध लिखना अपनी जिम्मेदारी समझा। सब जानते थे कि इस हार के असली कारण नेहरू ही थे लेकिन चुप्पी साधे हुए थे। दिनकर ने लिखा–

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

यह अपमानजनक हार केवल सेना की नहीं बल्कि भारत के शौर्य और पौरुष का भी था, जिससे दिनकर आहत हुए। सरकार, सत्ता और साहित्यकार कोई बोलने को तैयार नहीं। नेहरू अपने अनुयायियों के साथ मिलकर अपनी समन्वयवादी और देवताओं की छवि गढ़ने का प्रयास कर रहे थे। सभी की चुप्पी में नेहरू का डर था लेकिन दिनकर नहीं डरे उन्होंने लिखा–

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

नेहरू गाँधीनीति से भारत की जनता को बरगला कर सत्ता बनाए रखना चाहते थे जबकि इस युद्ध में गाँधी नहीं भगत सिंह और बोस के विचारों की जरूरत थी। दिनकर गाँधीवाद का प्रतीकों में विरोध करते हैं–

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का।
परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड एक, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

नेहरू भारत में लोकतंत्र नहीं राजतंत्र चाहते थे। उनकी सत्ता पर काबिज रहने की भूख बहुत गहरी थी। साथ ही विदेशी नेताओं और राजाओं से उन्हें विशेष लगाव था। विदेशियों के प्रति उनकी यह आस्था कई बार अपमान का कारण बन जाती थी। जब अंग्रेजी सत्ता को हमारे देशवासियों ने जड़ से उखाड़कर फेंक दिया, और हम आजाद हुए तो नेहरू केवल इस बात से खुश थे कि उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठने का अवसर मिलेगा।

जिन अग्रेजों ने वर्षों तक हमें गुलाम बनाकर रख उसी इंग्लैड की महारानी एलिजाबेथ 14 वर्षों बाद जब भारत आई तो नेहरू ने बड़ी भव्यता से उसका स्वागत किया बल्कि इससे कई साहित्यकार बेहद क्रोधित हुए क्योंकि वह इस घटना को औपनिवेशिक गुलामी के रूप में देख रहे थे। कवि नागार्जुन ने इसके विरोध में “आओ रानी” कविता लिखकर अपना प्रतिरोध दर्ज किया–

आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
यही हुई है राय जवाहरलाल की
भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो।
यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
राय हुई है यही जवाहर लाल की।

यह समझना बहुत आवश्यक है कि आरंभिक समय में भारत को जिस तरह के राजनीतिज्ञों की आवश्यकता थी उसके विपरीत लोग मिले। हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए था जो भारत को भारतबोध की दृष्टि से देखने की हिम्मत रखता था। वर्तमान सरकार कॉन्ग्रेस की नाकामियों से मिले अपमान की भरपाई करने का निरंतर प्रयास कर रही है। हमें उसके साथ मिलकर इस देश की वास्तविक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक विरासत को संभालना होगा तभी हम भारत से विकसित भारत बनेंगे।

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मनीष मिश्रा
मनीष मिश्रा
नेशनल कमिश्नर, भारत स्काउट एवं गाइड

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