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चंद्रमा पर कहाँ उतरा था Luna 9, AI ने बताया लैंडिग स्थल: मशीन लर्निंग ने NASA की LRO तस्वीरों और Apollo डेटा से खोजी जगह, जानिए कैसे खुला 60 साल पुराना अंतरिक्ष रहस्य

60 साल बाद AI और LRO की मदद से सोवियत मिशन Luna 9 की चंद्रमा पर पहली सॉफ्ट लैंडिंग की संभावित लोकेशन खोजी गई, मानव अंतरिक्ष इतिहास उजागर हुआ।

मानव इतिहास में 3 फरवरी 1966 का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ था, जब सोवियत संघ के मिशन Luna 9 ने पहली बार चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की।

यह पहला मौका था जब किसी अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित उतरकर वहाँ से पृथ्वी पर तस्वीरें भेजीं। इस मिशन ने यह साबित कर दिया कि चंद्रमा की सतह ठोस है और वहाँ भविष्य में मानव मिशन संभव हो सकते हैं।

हालाँकि Luna 9 की यह सफलता ऐतिहासिक थी, लेकिन एक बड़ा सवाल दशकों तक अनसुलझा रहा कि Luna 9 असल में चंद्रमा पर कहाँ उतरा था? अब आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग की मदद से वैज्ञानिकों को इस रहस्य के समाधान के बेहद करीब पहुँचने का दावा किया है।

Luna 9 मिशन: चंद्रमा पर उतरने की पहली बड़ी जीत

Luna 9 सोवियत संघ के Ye-6 प्रोग्राम का हिस्सा था, जो चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग की कोशिश कर रहा था। इस मिशन से पहले 11 प्रयास असफल रहे थे। आखिरकार Luna 9 ने चंद्रमा पर सुरक्षित उतरकर इतिहास रच दिया।

इस मिशन का सबसे बड़ा योगदान यह था कि इसने चंद्रमा से पहली वास्तविक तस्वीरें भेजीं और यह साबित किया कि चंद्रमा की सतह इतनी नरम नहीं है कि कोई स्पेसक्राफ्ट उसमें धंस जाए।

Luna 9 के जरिए वैज्ञानिकों को पहली बार चंद्रमा की वास्तविक फिजिकल कंडीशन का पता चला। यह मिशन सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं था, बल्कि इसने भविष्य के अपोलो मिशनों और मानव चंद्र यात्रा की नींव रखी।

Luna 9 की लैंडिंग साइट क्यों बन गई एक रहस्य?

हालाँकि सोवियत मीडिया ने Luna 9 की संभावित लैंडिंग लोकेशन के कुछ कोऑर्डिनेट्स जारी किए थे, लेकिन वे पूरी तरह सटीक नहीं थे। 1960 के दशक की ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी आज के मुकाबले काफी कमजोर थी, जिससे स्पेसक्राफ्ट की सटीक लोकेशन को रिकॉर्ड करना मुश्किल हो गया।

चाँद पर उतरने और अपने पैनल खोलने के बाद लूना 9। (फोटो साभार – SPL)

इसके अलावा Luna 9 का मुख्य ऑपरेटिंग यूनिट एक सिर्फ 58 सेंटीमीटर का छोटा गोलाकार कैप्सूल था। इतने छोटे ऑब्जेक्ट को चंद्रमा की विशाल सतह पर ऑर्बिटल सैटेलाइट इमेज में पहचानना बहुत मुश्किल था। इसी वजह से वैज्ञानिकों और स्पेस रिसर्चर्स के लिए Luna 9 की असली लैंडिंग साइट 60 सालों तक एक रहस्य बनी रही।

AI और मशीन लर्निंग: अब तकनीक बनी खोज का हथियार

इस ऐतिहासिक रहस्य को सुलझाने के लिए SETI संस्था के वैज्ञानिक लुईस पिनॉल्ट के नेतृत्व में एक टीम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉडल YOLO-ETA (You Only Look Once– Extraterrestrial Artefact) विकसित किया।

इस AI मॉडल को इस तरह डिजाइन किया गया कि यह मानव-निर्मित अंतरिक्ष वस्तुओं के संकेत पहचान सके। इसे Apollo मिशनों की लैंडिंग साइट्स की तस्वीरों से प्रशिक्षित किया गया ताकि यह सीख सके कि लैंडर, उपकरण और उनके निशान सैटेलाइट इमेज में कैसे दिखाई देते हैं।

AI को यह पहचानने की ट्रेनिंग दी गई कि वह चंद्रमा की सतह पर मौजूद असामान्य आकार, छाया, मिट्टी में गड़बड़ी और धूल के बदले हुए पैटर्न को पहचान सके जो किसी अंतरिक्ष यान की लैंडिंग से बने हो सकते हैं।

NASA LRO की तस्वीरों से Luna 9 की खोज

AI मॉडल को NASA के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) द्वारा ली गई हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों पर लागू किया गया। LRO 2009 से चंद्रमा की सतह की बारीकी से मैपिंग कर रहा है।

वैज्ञानिकों ने Luna 9 की संभावित लैंडिंग साइट के आसपास 5×5 किलोमीटर के क्षेत्र को स्कैन किया। इस दौरान AI को कई ऐसी जगहें मिलीं, जहाँ मानव-निर्मित वस्तुओं जैसे संकेत दिखाई दिए।

लूना 9 लैंडिंग साइट। (फोटो साभार -npj स्पेस एक्सप्लोरेशन)

खास बात यह रही कि AI ने एक ही स्थान पर अलग-अलग रोशनी की स्थिति में भी समान ऑब्जेक्ट्स पहचाने, जिससे यह संभावना मजबूत हुई कि ये केवल रोशनी का भ्रम नहीं बल्कि वास्तविक फिजिकल एविडेंस हो सकते हैं।

Luna 9 की सतह की तस्वीरों से लैंडिंग साइट की पुष्टि का प्रयास

वैज्ञानिकों ने AI द्वारा पहचानी गई संभावित Luna 9 लैंडिंग साइट की तुलना 1966 में मिशन द्वारा भेजी गई मूल पैनोरमिक तस्वीरों से की। इस अध्ययन में कई अहम जगह से जुड़े और दिखाई देने वाले संकेतों को ध्यान में रखा गया।

सबसे पहले, जमीन की बनावट को ध्यान से परखा गया ताकि इलाके को बेहतर तरीके से समझा जा सके। तस्वीरों में दिख रही जमीन की खुरदरी सतह, मिट्टी के पैटर्न और छोटे-छोटे उभारों की तुलना नई और साफ चंद्रमा की हाई-क्वालिटी तस्वीरों से की गई।

इससे यह समझने में मदद मिली कि दोनों जगहों की बनावट काफी हद तक एक जैसी है। इसके अलावा, आसपास मौजूद चट्टानों और छोटे-छोटे गड्ढों की जगह की मदद से आकार और दूरी की भी तुलना की गई। Luna 9 की तस्वीरों में दिखने वाले खास पत्थर और छोटे गड्ढे उस जगह से काफी हद तक मेल खाते हैं, जिसे AI ने पहचाना है।

इसके अलावा, दूर तक फैली जमीन और क्षितिज की हल्की गोलाई को भी ध्यानपूर्वक देखा और अध्ययन किया गया। Luna 9 की पुरानी तस्वीरों में दिखने वाला क्षितिज, ऊँचाई का अहसास और दृश्य का नजरिया नई साइट से काफी मेल खाता है।

लैंडिंग वाले इलाके की जमीन कितनी सपाट है, इसका भी ध्यान रखा गया, क्योंकि Luna 9 ने सीधे और समतल जगह पर ही लैंड किया था। नई खोजी गई साइट की सतह और ढलान भी पुरानी तस्वीरों जैसी ही नजर आई।

जब जमीन की बनावट, चट्टानों और गड्ढों की स्थिति, क्षितिज की रेखा और मैदान की सपाटता सबकी तुलना की गई, तो वैज्ञानिकों को मजबूत संकेत मिले कि AI द्वारा खोजी गई जगह सच में Luna 9 की ऐतिहासिक लैंडिंग साइट हो सकती है। यह खोज चंद्रमा की खोज के इतिहास को और बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकती है।

मानव बनाम AI: Luna 9 की दूसरी संभावित लैंडिंग साइट का दावा

Luna 9 की लैंडिंग साइट को खोजने में सिर्फ AI ही सक्रिय नहीं था। रूसी स्पेस शोधकर्ता विटाली एगोरोव ने भी अपनी तरफ से संभावित जगह खोजने का दावा किया है। उन्होंने इसमें AI का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि खुद जाँच-पड़ताल की, 3D टेरेन मैपिंग और Luna 9 की पुरानी तस्वीरों की तुलना की।

उनके अध्ययन में उन्होंने जमीन पर दो प्रभाव के निशान और Luna 9 के क्रैश मॉड्यूल के निशान देखे, जो लगभग 116 मीटर की दूरी पर थे। ये निशान खास इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह सीधे Luna 9 के लैंडिंग और उसमें हुए छोटे हादसों के प्रमाण हो सकते हैं।

मगर यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि एगोरोव की बताई लोकेशन और AI द्वारा खोजी गई जगह में लगभग 25 किलोमीटर की दूरी है। इसका मतलब साफ है कि अब तक ये तय नहीं हो पाया कि Luna 9 वास्तव में कहाँ उतरी थी।

Chandrayaan-2 की भूमिका: भारत बन सकता है निर्णायक

Luna 9 की असली लैंडिंग साइट का पता लगाने का सवाल अब तक हल नहीं हुआ है, लेकिन इसमें भारत का चंद्रयान-2 मिशन निर्णायक भूमिका निभा सकता है। चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर में एक हाई-एंड कैमरा लगा है, जिसकी रेजोल्यूशन 0.25 मीटर है। इसका मतलब है कि यह चंद्रमा की सतह पर मौजूद बहुत छोटे-छोटे ऑब्जेक्ट्स और निशानों को भी पहचान सकता है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि चंद्रयान-2 आने वाली इमेज से Luna 9 के वास्तविक लैंडिंग स्थल की पहचान आसान होगी। इसके साथ-साथ NASA के LRO (लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर) की दोबारा की गई स्कैनिंग भी इस खोज में मदद करेगी।

दोनों डेटा को मिला कर यह देखा जा सकेगा कि AI द्वारा पहचानी गई साइट और विटाली एगोरोव द्वारा सुझाई गई साइट में से कौन-सी असली लैंडिंग साइट है।

स्पेस आर्कियोलॉजी: चंद्रमा पर इंसानी इतिहास की खोज

Luna 9 की खोज सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह स्पेस आर्कियोलॉजी यानी अंतरिक्ष पुरातत्व के उभरते क्षेत्र को भी मजबूती देती है। जैसे हम पृथ्वी पर पुरातत्वविदों को प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष खोजते हुए देखते हैं, वैसे ही अब वैज्ञानिक चंद्रमा और मंगल पर इंसानों द्वारा छोड़े गए अंतरिक्ष अवशेषों की खोज कर रहे हैं।

इस तकनीक के कई फायदे हो सकते हैं। सबसे पहले, यह पुराने अंतरिक्ष मिशनों के डेटा और अवशेषों को सुरक्षित और डॉक्यूमेंट करने में मदद कर सकती है। जैसे Luna 9, अपोलो  मिशन या अन्य रोबोटिक मिशनों के निशान, उपकरण और लैंडिंग साइट्स को ठीक से रिकॉर्ड किया जा सके।

दूसरा, इससे ऐतिहासिक लैंडिंग साइट्स को हेरिटेज जोन घोषित किया जा सकता है, ताकि ये साइट्स भविष्य में भी सुरक्षित रहें और किसी भी तरह के नुकसान या बदलाव से बची रहें।

तीसरा, यह तकनीक नए मिशनों के लिए सुरक्षित लैंडिंग जोन तय करने में भी मदद कर सकती है। अगर पहले से पता हो कि कोई जगह स्थिर और सुरक्षित है, तो भविष्य के रोबोटिक या मानव मिशन वहाँ आसानी से उतर सकते हैं।

चौथा भविष्य में यह SETI रिसर्च यानी संभावित एलियन टेक्नोलॉजी की खोज में भी मदद कर सकती है। चंद्रमा या मंगल पर इंसानी अवशेषों के साथ-साथ छोटे-छोटे रहस्यमय निशान या उपकरणों की पहचान करके वैज्ञानिक और ज्यादा जानकारियाँ इकट्ठा कर सकते हैं।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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