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हमारे खिलाफ चल रहा ‘प्रोपेगैंडा कैंपेन’: चीनी रोबोट डॉग को लेकर विवाद के बाद गलगोटिया ने खुद को ही बताया पीड़ित, जानें- कैसे गलत है यूनिवर्सिटी का दावा

AI इम्पैक्ट समिट 2026 में भारत मंडपम में DD इंडिया के अब डिलीट किए गए वीडियो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह रोबोटिक डॉग को विश्वविद्यालय के 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' द्वारा विकसित बताया था। सोशल मीडिया पर इस डिलीट किए गए वीडियो का क्लिप तेजी से शेयर किया जा रहा है।

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने 17 और 18 फरवरी की रात खुद को विक्टिम दिखाते हुए एक रिलीज में कहा कि उसके खिलाफ ‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा कैंपेन’ चलाया जा रहा है। यह उस बीच हुआ जब यूनिवर्सिटी को AI इम्पैक्ट समिट 2026 में अपने AI इकोसिस्टम के हिस्से के रूप में चीनी रोबोट डॉग दिखाने पर आलोचना का सामना करना पड़ा। हालाँकि, विश्वविद्यालय के अपने पुराने बयानों, अब डिलीट किए गए DD इंडिया वीडियो और NewsVoir के जरिए जारी प्रेस रिलीज में पूरी तस्वीर कुछ और ही दिखती है।

‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा’ पोस्ट और इनकार

हालिया प्रेस रिलीज में विश्वविद्यालय ने कहा, “यूनिवर्सिटी, फैकल्टी और छात्र अपने विश्वविद्यालय के खिलाफ प्रोपेगैंडा कैंपेन से गहरे आहत हैं।” विश्वविद्यालय ने दावा किया कि रोबोटिक प्रोग्रामिंग पहल केवल छात्रों को AI से परिचित कराने के लिए थी और इसमें ‘वैश्विक रूप से उपलब्ध उपकरण और संसाधनों’ का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने चेतावनी दी कि नेगेटिविटी फैलाना छात्रों के मनोबल को नुकसान पहुँचा सकता है।

इससे पहले जारी एक स्पष्टीकरण में गलगोटिया ने कहा, “स्पष्ट कर दें कि गलगोटिया ने यह रोबोडॉग नहीं बनाया है, न ही हमने ऐसा दावा किया है।” इसमें यूनिट्री रोबोडॉग को केवल एक लर्निंग टूल बताया गया और कहा गया कि विश्वविद्यालय ने इसे कभी स्वदेशी विकास के रूप में पेश नहीं किया। विश्वविद्यालय का कहना था कि उसने कभी भी रोबोडॉग बनाने का ‘दावा’ नहीं किया। लेकिन मौजूद रिकॉर्ड से अलग ही तस्वीर सामने आती है।

डिलीट किए जाने से पहले DD के वीडियो में क्या आया नजर?

AI इम्पैक्ट समिट 2026 में भारत मंडपम में DD इंडिया के अब डिलीट किए गए वीडियो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह रोबोटिक डॉग को विश्वविद्यालय के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ द्वारा विकसित बताया था। सोशल मीडिया पर इस डिलीट किए गए वीडियो का क्लिप तेजी से शेयर किया जा रहा है।

मूल क्लिप डिलीट किए जाने से पहले लोगों द्वारा खूब शेयर किया गया था। समिट में रोबोडॉग को केवल खरीदे गए डिवाइस के रूप में नहीं बल्कि विश्वविद्यालय के अपने ‘डेवलपमेंट इकोसिस्टम’ के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।

350 करोड़ रुपए का AI इकोसिस्टम और ORION रीब्रांडिंग

दिलचस्प बात यह है कि NewsVoir के जरिए वितरित की गई विश्वविद्यालय की प्रेस रिलीज में खुद विरोधाभास दिखात है। इसकी हेडलाइन में लिखा गया, “गलगोटिया यूनिवर्सिटी पविलियन AI इम्पैक्ट समिट 2026 में 350+ करोड़ रुपए के AI शोकेस के साथ प्रमुख आकर्षण के रूप में उभरा।” प्रेस रिलीज में कहा गया कि विश्वविद्यालय ने ‘कम्प्रीहेंसिव 350+ करोड़ रुपए का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इकोसिस्टम’ पेश किया।

रिलीज में कहा गया कि पविलियन का मुख्य आकर्षण ORION (ऑपरेशनल रोबोटिक इंटेलिजेंस नोड) था, जो ‘प्रतिनिधियों के साथ लाइव इंटरैक्ट करता और रोबोटिक्स व इंटेलिजेंट सिस्टम्स इंटीग्रेशन का प्रदर्शन करता था’।

चीनी यूनिट्री रोबोडॉग को ORION के रूप में रीब्रांड किया गया और विश्वविद्यालय के AI ड्रिवन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर के हिस्से के रूप में पेश किया गया। हालाँकि, दिक्कत यह थी कि रोबोट पर अभी भी यूनिट्री का ब्रांडिंग दिखाई दे रहा था। यानी प्रोडक्ट का नाम बदल दिया गया लेकिन निर्माता के मार्किंग्स नहीं हटाए गए।

गलगोटिया की मासूम बनने की कोशिश

विश्वविद्यालय द्वारा ग्लोबल तकनीक छात्रों के सीखने के लिए इम्पोर्ट करना कोई नई बात नहीं है। गलगोटिया ने खुद लिखा कि ‘इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती’ और छात्रों को अत्याधुनिक उपकरणों से अवगत कराया जाना चाहिए। लेकिन मुद्दा केवल तकनीक खरीदने का नहीं है बल्कि इसे पेश करने का तरीका है।

एक बड़े अंतरराष्ट्रीय समिट में, रोबोट का नाम ORION रखा गया, 350+ करोड़ रुपए के AI इकोसिस्टम के तहत दिखाया गया, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का हिस्सा बताया गया, राष्ट्रीय मीडिया द्वारा बढ़ावा मिला और सरकारी हैंडल पर शेयर किया गया। इसके बाद आलोचना को ‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा’ कहना और यह दावा करना कि ऐसा कभी नहीं कहा गया, विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाता है।

ड्रोन सॉकर

एक और दावा, जो प्रोफेसर नेहा सिंह ने DD न्यूज़ से किया, वह था ड्रोन सॉकर का। यह मूल रूप से एक बॉल के अंदर फिट किया गया ड्रोन है।उन्होंने कहा, “इसके एंड-टू-एंड इंजीनियरिंग से लेकर इसके एप्लिकेशन तक सब कुछ विश्वविद्यालय में हुआ है। और यह भारत का पहला ड्रोन सॉकर एरेना है, जो आप गलगोटिया कैंपस में देख सकते हैं। यहाँ छात्र इसे उड़ाते हैं और इसे नए तरीकों से विकसित कर रहे हैं, इसमें मजबूत और बेहतर फीचर्स जोड़ रहे हैं।”

हालाँकि, सोशल मीडिया यूजर्स ने बताया कि यह ड्रोन काफी हद तक स्ट्राइकर V3 ARF सॉकर ड्रोन जैसा है, जो Skyball द्वारा बेचा जाता है और इसका इस्तेमाल ड्रोन गेम में होता है। इसकी कीमत लगभग $453 (करीब 40,000 रुपए) है।

निष्कर्ष

विवाद का मुद्दा यह नहीं कि छात्र ग्लोबल तकनीक से सीख रहे हैं या विश्वविद्यालय विदेशी हार्डवेयर खरीद रहे हैं। असली मुद्दा यह है कि इन प्रोडक्ट्स को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर कैसे पेश किया गया और जब सवाल उठे तो कैसे बचाव किया गया। विश्वविद्यालय ने ऐसा दिखाने की कोशिश की कि उसने इन उन्नत तकनीकों को इन-हाउस विकासित किया जो सच नहीं था। सवाल उठने पर उन्होंने कहानी बदलकर खुद को मासूम और आलोचना को भी प्रोपेगैंडा बताकर खारिज करने की कोशिश की।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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