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UP में नासिर ने आनंद को तलवार से काटा… नई नहीं दलितों पर इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता, आँकड़े देते हैं अत्याचार की गवाही: ऐसी हर घटना के बाद ‘भीम-मीम’ वाले साध लेते हैं चुप्पी

दलितों पर अत्याचार किसी विशेष राजनीतिक नैरेटिव में फिट बैठता है तो उस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, धरना होता है, सोशल मीडिया अभियान चलाया जाता है लेकिन यदि आरोपित मुस्लिम समुदाय से हो तो वही राजनीतिक ऊर्जा अचानक गायब हो जाती है।

उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में गुरुवार को नासिर अली नामक शख्स ने बीच बाजार एक दलित युवक आनंद की तलवार से गला काटकर बेरहमी से हत्या कर दी। दलित-मुस्लिम एकता और भीम-मीम के नारे लगाने वालों को इस हत्या के बाद साँप सूँघ गया है। दलितों के नाम पर वोट माँगने वाले दल खामोश हैं क्योंकि मारने वाला मुस्लिम है। यह मामला इस्लामी कट्टरता के साथ-साथ यह भी दिखाता है कि दलितों के नाम पर की जाने वाली राजनीति किस हद तक सुविधाजनक हो गई है।

क्या है आनंद की हत्या का पूरा मामला?

जिस आनंद को सरे राह काटा गया उस बेचारे का ‘कसूर’ उस जिहादी की नजर में ये था कि आनंद ने अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ को लेकर नासिर को थप्पड़ जड़ दिया था। यह थप्पड़ नासिर को इतना नागवार गुजरा कि देर रात आनंद के बाजार से लौटते समय नासिर ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हें घेर लिया और धारदार हथियार से गला रेत दिया। यह पूरा कत्लेआम इतनी भयावहता के साथ हुआ कि आनंद ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

इसके बाद गुस्साए ग्रामीणों ने सड़क जमकर दिया और नासिर के गिरफ्तारी और एनकाउंटर की माँग पर अड़ गए।मामले के बाद संत कबीर नगर में एडीजी, डीआईजी, एसपी समेत पूरा पुलिस महकमा तैनात है और नासिर और उसके साथियों की तलाश की जा रही है।

आनंद की हत्या कोई पहली घटना नहीं है। इस तरह की कई घटनाएँ बीते महीनों में सामने आ चुकी हैं जिसमें दलितों का उत्पीड़न और उनकी हत्या करने में आरोपित मुस्लिम रहे हैं।

मुस्लिमों से सर्वाधिक पीड़ित हैं दलित

मीडिया रिपोर्ट्स को मानें तो जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच में एससी/एसटी एक्ट के आँकड़ों में पता चला कि दलितों के उत्पीड़न पर मुस्लिमों के खिलाफ 1,983 मामले दर्ज हो चुके हैं। यह आँकड़े राज्य के सभी जिलों और जून से मिली पुलिस रिपोर्ट, FIR और जाँच रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं।

इन आँकड़ों के सामने आने के बाद से सियासी महकमे में हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी लगातार PDA नैरेटिव पर लोगों को बरगलाने की कोशिश कर रही है लेकिन NCRB के आँकड़े और रुझान कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकारों के दौरान दलितों पर अत्याचार के मामले काफी बढ़े थे।

एनसीआरबी और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, 2012 से 2017 के बीच में यूपी में दलितों पर अपराधों के 15000 से भी अधिक मामले दर्ज हुए। सपा सरकार में ही 2014 में बदायूं में दो दलित बहनों के साथ हुई बर्बरता ने भी देश को तो झकझोरा ही, पर यह भी बता दिया कि सपा राज में कानून व्यवस्था दलितों के लिए अराजक हो चुकी है।

2012-13 में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराध की संख्या 2800 से 3000 के बीच रही। इसके बाद 2014-15 में ये संख्या 3200 से 3400 हो गई। इनमें बलात्कार, हत्या और सामाजिक बहिष्कार के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई।

वहीं अखिलेश के आखिरी वर्षों 2016-17 में एनसीआरबी के रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश दलितों के अपराध के मामले में पहले नंबर पर रहा। इस वर्ष में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराधों की संख्या 3500 से 3700 तक पहुँच गई। कुल मिलाकर अखिलेश के कार्यकाल में 15130 मामले दर्ज हुए जो देश में सबसे अधिक थे।

मुलायम की सत्ता में भी दलितों का हुआ शोषण

1993 से 1995 और 2003 से 2007 के बीच रही मुलायम सिंह यादव की सरकार की बात की जाए तो दलितों पर अत्याचार की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें विपक्षी मतदाता मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती थी, थानों में न्याय नहीं मिलता था और ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा हद से अधिक देखने को मिलती थी।

आम जनता को तो छोड़ दीजिए, 1995 का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड भी मुलायम सरकार के दौरान ही हुआ जिसने दलितों के प्रति समाजवादी पार्टी का चेहरा और विचार सबके सामने रख दिया। इस घटना ने बताया कि सपा दलित समाज की आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

अपने परिवार के सत्ता में रहने के दौरान दिलों के रुख को जानने के बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पीड़ित, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) का नारा देकर सत्ता की रोटियाँ सेंकने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।

यह तो योगी सरकार है जिसकी वजह से न केवल कानून व्यवस्था सुदृढ़ हुई पर साथ ही दलितों पर अत्याचार और उनके उत्पीड़न में भी काफी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि 2027 के चुनाव में अखिलेश यादव सत्ता संभालते हैं तो दलितों के लिए उनका शासन काल किसी डरावने सपने से भी बदतर हो जाएगा।

भीम-मीम राजनीति की भी पोल खोलते हैं ऐसे मामले

सपा जैसे दल ‘भीम-मीम’ राजनीति के सबसे बड़े स्वघोषित मसीहा हैं। ‘भीम-मीम’ के नारे के सहारे दलितों और मुस्लिमों की सामाजिक-राजनीतिक एकता बताने वाले अखिलेश यादव जैसे लोगों का दिल असल में दलितों के नाम पर कम ही पसीजता है। यह कोई इस घटना की बात नहीं है, घटना दर घटना आपको इसके प्रमाण नजर आएँगे। इन दलों द्वारा इस राजनीति में दलितों के मुद्दों से ज्यादा महत्व केवल वोटों की गणित को दिया जाता रहा है। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर सबसे अधिक मुखर होने का दावा करने वाले ये लोग मुस्लिम आरोपित होने पर मुँह बंद कर लेते हैं।

भीम-मीम के नाम पर राजनीति करने वाले लोग सिद्धांत की नही बल्कि सुविधा की राजनीति करते हैं। दलितों पर अत्याचार किसी विशेष राजनीतिक नैरेटिव में फिट बैठता है तो उस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, धरना होता है, सोशल मीडिया अभियान चलाया जाता है लेकिन यदि आरोपित मुस्लिम समुदाय से हो तो वही राजनीतिक ऊर्जा अचानक गायब हो जाती है।

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