Homeफ़ैक्ट चेकसोशल मीडिया फ़ैक्ट चेकPM मोदी ने शुरू किया देशव्यापी HPV वैक्सीनेशन, सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही...

PM मोदी ने शुरू किया देशव्यापी HPV वैक्सीनेशन, सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही फेक न्यूज और डरावनी कहानियाँ: जानें क्या है सच्चाई और कैसे ये हमारे हित में है

देशभर में HPV टीकाकरण अभियान शुरू, सर्वाइकल कैंसर से बचाव पर जोर। गलत सूचनाओं के बीच वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सरकार और विशेषज्ञों ने वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी बताया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  शनिवार (28 फरवरी 2026) को अजमेर, राजस्थान में किशोरी लड़कियों के लिए देशव्यापी HPV टीकाकरण अभियान का शुरुआत कर रहे हैं। यह पहल भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) द्वारा कैंसर विशेषकर सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए शुरू की गई एक ऐतिहासिक मुहिम है।

सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से हाई रिस्क वाले ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) स्ट्रेन से लगातार संक्रमण के कारण होता है और यह भारत में महिलाओं में सबसे आम कैंसरों में से एक है। इस अभियान का उद्देश्य किशोरी लड़कियों, विशेषकर 14 साल की उम्र वाली लड़कियों को टीका लगाकर उन्हें वायरल संक्रमण से पहले सुरक्षा प्रदान करना है।

इस देशव्यापी टीकाकरण योजना से सर्वाइकल कैंसर की घटनाओं में महत्वपूर्ण कमी आने की उम्मीद है। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि HPV वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी है, यदि इसे उस उम्र में लगाया जाए जब लड़कियों के वायरल संक्रमण के जोखिम वाले संपर्क से पहले टीकाकरण हो सके।

इस प्रकार, यह अभियान न केवल भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी HPV संक्रमण और उससे संबंधित कैंसरों के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

यह उल्लेखनीय है कि आज के इस शुभारंभ के साथ भारत उन 160 से अधिक देशों में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने अपने टीकाकरण कार्यक्रमों में HPV वैक्सीन को शामिल किया है। इनमें से 90 से अधिक देश एक डोज HPV वैक्सीन योजना को लागू कर रहे हैं, जिससे कवरेज, उपलब्धता और कार्यक्रम के आयोजन में सुधार हो रहा है।

HPV वैक्सीनेशन ड्राइव के खिलाफ सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाई जा रही है

देशव्यापी टीकाकरण अभियान की शुरुआत को मेडिकल कम्युनिटी से काफी सराहना और समर्थन मिला है, लेकिन इसके बावजूद सोशल मीडिया पर गलत सूचना और नकारात्मक प्रचार भी बड़ी मात्रा को देखा जा सकता है। कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि यह वैक्सीन सुरक्षित नहीं है, कि यह दुष्ट बिल गेट्स का प्रोजेक्ट  है या कि सरकार किसी तरह किशोरी लड़कियों को जोखिम में डाल रही है।

इन आरोपों के पीछे सामान्य झूठ और अंधविश्वास, आधुनिक साजिश सिद्धांतों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। कई शिक्षित और सोशल मीडिया यूजर वैक्सीन अभियान के खिलाफ गलत जानकारी फैला रहे हैं, डर पैदा करने के लिए असंबंधित दावे, आधी-अधूरी थ्योरी और बहुत सारी गलत जानकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आइए इन झूठे दावों को समझें और वैक्सीन के बारे में कुछ जानकारी पाएँ

कई सोशल मीडिया हैंडल्स ने भारत में किए गए एक अध्ययन के बारे में मीडिया रिपोर्ट्स और दावों का हवाला दिया है, जिसमें दो अलग-अलग वैक्सीन शामिल थीं।

गार्डासिल, जिसे Merck/MSD ने बनाया और सर्वारिक्स, जिसे ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन/GSK ने विकसित किया। यह अध्ययन एक बड़े डेमोन्स्ट्रेशन प्रोजेक्ट के रूप में किया गया था, न कि ‘क्लिनिकल ट्रायल’, क्योंकि दोनों वैक्सीन के ट्रेडिशनल क्लिनिकल ट्रायल पहले ही समाप्त हो चुके थे।

यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि गार्डासिल और सर्वारिक्स दोनों ही 2008 से भारत में लाइसेंस प्राप्त और कमर्शियल रूप से उपलब्ध थे। PATH अध्ययन का उद्देश्य बड़े पैमाने पर वैक्सीन प्रशासन और बड़े जनसंख्या समूहों के लिए तैयारी का परीक्षण करना था, ताकि भविष्य में संभावित देशव्यापी रोलआउट के लिए तैयारी सुनिश्चित की जा सके।

यह अध्ययन प्रोग्राम फॉर एप्रोप्रियेट टेक्नोलॉजी इन हेल्थ (PATH) ने भारत सरकार, आंध्र प्रदेश और गुजरात राज्य सरकार और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ मिलकर 2009-2010 के बीच किया था।

इस दौरान दोनों वैक्सीन गार्डासिल (Merck/MSD) और सर्वारिक्स (GSK) के डोज संबंधित कंपनियों ने दान किए थे। इस अध्ययन का मकसद यह देखना था कि बड़े पैमाने पर HPV वैक्सीन देने की योजना कितनी कारगर और स्वीकार्य होगी और इसे भविष्य में सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल किया जा सके।

आंध्र प्रदेश में करीब 14000 लड़कियों (जिनकी उम्र 10-14 साल थी) उनको गार्डासिल दी गई और गुजरात में करीब 16000 लड़कियों को सर्वारिक्स दी गई। अध्ययन के बाद कुछ विरोध और विवाद भी सामने आए।

कुछ लोग और समूह, जैसे एंटी-वैक्सीन एक्टिविस्ट, मानवाधिकार और महिला अधिकार समूह और राजनीति से जुड़े लोग इसे गलत साबित करने की कोशिश करने लगे। इनकी शिकायत यह थी कि कॉन्सेंट फॉर्म्स सही तरीके से नहीं लिए गए, कई जगहों पर स्कूल प्रिंसिपल या हॉस्टल वार्डन ने साइन किया, जबकि सही तरीका यह था कि अभिभावक साइन करें।

कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रवादी दृष्टि से भी गलत बताया, क्योंकि सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने विदेशी कंपनियों और संगठनों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण स्वास्थ्य डेटा साझा किया। विवाद तब और बढ़ा जब यह खबर आई कि 7 लड़कियों (गुजरात में 2 और आंध्र प्रदेश में 5) की वैक्सीन के बाद मौत हुई। इन घटनाओं ने मीडिया और राजनीति में हलचल पैदा की।

इस पूरे मामले की जाँच में संसद की स्थायी समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण (72वीं रिपोर्ट) ने PATH, ICMR और DCGI की कड़ी आलोचना की और कहा कि PATH ने विदेशी वैक्सीन कंपनियों (Merck और GSK) का सहायक बनकर, UIP में वैक्सीन शामिल कराने की कोशिश की जो कि सिर्फ व्यावसायिक लाभ के लिए था, न कि असली सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्य के लिए।

वैक्सीनेशन के बाद मौतों के दावों के पीछे की सच्चाई

ICMR ने इन मौतों के आरोपों को गंभीरता से लिया और सभी दावों की जाँच के लिए इन्वेस्टिगेशन शुरू की। 2011 में ICMR ने अपनी फाइनल रिपोर्ट जमा की। इस रिपोर्ट में हर मौत के ऑटोप्सी, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, स्थानीय डेटा और घटनाओं की समय-सीमा की जाँच की गई। नतीजा यह निकला कि इन 7 मौतों में से किसी की भी वैक्सीन से कोई लिंक या कारण नहीं पाया गया।

आंध्र प्रदेश में मौतों के कारण थे, एक 14 साल की लड़की में ऑर्गेनोफॉस्फोरस जहर (संभवतः कीटनाशक) का खाना, 13 साल की लड़की में इसी तरह के पैटर्न की आसंका दिखी, एक केस जिसमें सही मेडिकल डायग्नोसिस स्पष्ट नहीं था लेकिन वैक्सीन कारण नहीं था, एक 14 साल की लड़की की अचानक डूबने से मौत और एक केस मलेरिया और टाइफाइड का वही गुजरात में जहाँ सर्वारिक्स दिया गया था और एक की मौत साँप के काटने से हुई व दूसरी मलेरिया और गंभीर एनीमिया के कारण हुई।

गुजरात और आंध्र प्रदेश में HPV वैक्सीनेशन पर PATH स्टडी की ICMR जाँच
गुजरात और आंध्र प्रदेश में HPV वैक्सीनेशन पर PATH स्टडी की ICMR जाँच

‘नैतिक चूक’ के दावे सही हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैक्सीन खतरनाक या बेअसर थीं

यहाँ ध्यान देने वाली है कि 2013 की संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट ने सरकार की कुछ कमियों पर गंभीर चिंता जताई और आलोचना की थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वैक्सीन अप्रभावी या खतरनाक हैं।

इसका कारण यह है।

1 जैसा कि ऊपर बताया गया की ICMR के विस्तृत अध्ययन में वैक्सीन और मौतों के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया। किसी अध्ययन में सामने आई कुछ  नैतिक या प्रक्रियागत गड़बड़ियों के कारण, जिसमें करीब 30,000 प्राप्तकर्ताओं और दो राज्यों के सैकड़ों स्वास्थ्यकर्मी, NGO और स्टाफ शामिल थे, वैक्सीन को ‘खतरनाक’ कहना वैज्ञानिक या तार्किक तर्क नहीं बनता।

2 उस समय और उसके बाद का वैश्विक और भारतीय डेटा यह दिखाता है कि HPV वैक्सीन का सुरक्षा रिकॉर्ड मजबूत है और दुनिया भर में कहीं भी किसी मौत का कारण वैक्सीन नहीं पाया गया।

3 संसदीय रिपोर्ट की खुद विशेषज्ञों ने आलोचना की है (जैसे लैंसेट ऑन्कोलॉजी) क्योंकि इसमें HPV वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावकारिता पर पहले से मौजूद व्यापक प्रमाणों, जैसे क्लिनिकल ट्रायल और लाइसेंस के बाद की निगरानी (लाइसेंस के बाद निगरानी) को नजरअंदाज किया गया।

4 पिछले 15+ सालों में और दुनिया भर में सैकड़ों मिलियन डोज़ दिए जाने के अनुभव ने दिखाया है कि HPV वैक्सीन, जैसे गार्डासिल, अत्यधिक प्रभावी हैं और 93–100% तक सुरक्षा प्रदान करती हैं उन HPV प्रकारों के खिलाफ जो अधिकांश सर्वाइकल कैंसर के लिए जिम्मेदार हैं।

5 इस वैक्सीन का सुरक्षा रिकॉर्ड शानदार है। इसके दुष्प्रभाव अधिकतर हल्के होते हैं, जैसे टीके की जगह दर्द, और गंभीर घटनाएँ बहुत ही दुर्लभ हैं।

अभी पूरे देश में चल रहे कैंपेन में मर्क द्वारा बनाए गए गार्डासिल का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?

कुछ लोग पूछ सकते हैं कि जबकि PATH अध्ययन में दोनों वैक्सीन गार्डासिल और सर्वारिक्स का परीक्षण किया गया था, वर्तमान सरकारी देशव्यापी कार्यक्रम में केवल गार्डासिल क्यों इस्तेमाल की जा रही है। इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं।

गार्डासिल के लिए केवल एक ही डोज़ की आवश्यकता होती है, जबकि सर्वारिक्स (GSK) के लिए कई डोज़ लेने पड़ते हैं। एक डोज़ ही डोज प्रभावी है और कई WHO अध्ययन इसे प्रमाणित करते हैं। दुनिया भर में दस वर्षों से अधिक के अनुभव में गार्डासिल का रिकॉर्ड साबित हो चुका है। 2006 से अब तक 500 मिलियन से अधिक डोज़ गार्डासिल की दुनिया भर में दी जा चुकी हैं, इसके सुरक्षा रिकॉर्ड और HPV संक्रमण कम करने में असर भी देखे जा चुके है।

भारत सरकार ने GAVI, वैक्सीन एलायंस के साथ साझेदारी में गार्डासिल की आपूर्ति सुनिश्चित की है, जो पारदर्शी और वैश्विक रूप से समर्थित व्यवस्था के तहत हो रही है। इससे देश भर में इसकी सप्लाइ सुनिश्चित की और डोज़, कोल्ड चेन की सुरक्षा और पर्याप्त भंडारण सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

मेड इन इंडिया HPV वैक्सीन भी आ रही है, जिस पर अभी स्टडी चल रही है

यहाँ ध्यान देने योग्य है कि भारत के पास HPV के बड़े पैमाने पर टीकाकरण के लिए विकल्प पहले से मौजूद हैं। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने सर्वावैक विकसित किया है, जो एक चार गुणों वाला HPV वैक्सीन है।

यह वैक्सीन परीक्षणों में सफल रही है और 2023 से कमर्शियल रूप से उपलब्ध है। हालाँकि, इसे अभी तक देशव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि सर्वावैक को भी दो डोज़ की आवश्यकता है। इस समय ICMR एक इम्यूनोब्रिजिंग अध्ययन कर रहा है, जिसमें सर्वावैक (एक डोज) और गार्डासिल की तुलना की जा रही है कि क्या सर्वावैक का प्रभाव कम नहीं है।

जब सर्वावैक इस अध्ययन में सफल हो जाएगा, तो इसे सरकार के अभियान में भी शामिल किए जाने की संभावना है। सर्वावैक की कीमत काफी कम है और यह देश में ही तैयार किया जाता है, जबकि गार्डासिल को बाहर से लाना पड़ता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि NTAGI ने पहले ही सर्वावैक को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (NIP) में शामिल करने की मंजूरी दे दी है (प्रारंभ में दो डोज़ योजना के रूप में) और स्वास्थ्य मंत्रालय और संसद की समितियों ने देशी वैक्सीन जैसे सर्वावैक को तेजी से व्यापक UIP रोलआउट के लिए बढ़ावा देने का आग्रह किया है।

वैक्सीन से जुड़ी गलत जानकारी और डर फैलाना समाज के लिए खतरनाक क्यों है?

HPV संक्रमण लगभग सभी सर्वाइकल कैंसर के मामलों का कारण होता है। इसके अलावा यह कई मामलों में एनल, पेनाइल, वल्वर, वैजाइनल और ओरोफैरिंजियल कैंसर तथा जननांग मस्सों (genital warts) का भी कारण बनता है। भारत में हर साल 1,20,000 से अधिक नए सर्वाइकल कैंसर के मामले सामने आते हैं और करीब 80,000 मौतें होती हैं। ऐसे में टीकाकरण के जरिए रोकथाम करना एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक कदम है।

सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही आधी-अधूरी, भ्रामक और गैर-वैज्ञानिक बातें लोगों में डर पैदा करती हैं और माता-पिता को हिचकिचाने पर मजबूर करती हैं, जिससे बच्चे उन बीमारियों के खतरे में पड़ जाते हैं जिन्हें रोका जा सकता है। अक्सर झूठ और गलत जानकारी सबसे तेजी से गरीब और कम शिक्षित परिवारों में फैलती है। जिन लड़कियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाव का मौका मिल सकता है, वही सबसे ज्यादा जोखिम में आ जाती हैं।

एक संपन्न परिवार कभी भी अपना फैसला बदलकर अपनी बेटी को बाजार में उपलब्ध वैक्सीन लगवा सकता है। लेकिन यदि गरीब परिवारों की लड़कियाँ सरकार द्वारा मुफ्त दिए जा रहे टीके से वंचित रह जाती हैं, तो उनके लिए बाद में यह मौका मिल पाना बेहद मुश्किल होता है।

क्या बिल गेट्स के खिलाफ आम नेगेटिव भावनाएँ एंटी-HPV वैक्सीनेशन ड्राइव को बढ़ावा दे रही हैं?

अरबपति बिल गेट्स, जो बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के प्रमुख रहे हैं, हाल के समय में कई मामलों के दोषी और यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से कथित संबंधों को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर बढ़ी हुई एंटी-बिल गेट्स भावनाएँ वैश्विक एंटी-वैक्सीन नैरेटिव को भी हवा दे रही हैं। साजिश सिद्धांतों को बढ़ावा देने वाले लोग एपस्टीन कनेक्शन का हवाला देकर गेट्स को बदनाम करने और फाउंडेशन की वैश्विक स्वास्थ्य पहलों को किसी संदिग्ध कॉरपोरेट एजेंडा की तरह पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालाँकि, बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन वैश्विक टीकाकरण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। 1999-2000 में GAVI की शुरुआत के लिए फाउंडेशन ने 750 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 67,916 करोड़ रुपए) की प्रारंभिक फंडिंग दी थी, जिसमें WHO, UNICEF और वर्ल्ड बैंक का सहयोग था।

रिपोर्टों के अनुसार, अब तक फाउंडेशन का GAVI में कुल योगदान 7.7 बिलियन डॉलर (लगभग 69,300 करोड़) से अधिक हो चुका है। GAVI ने दुनिया भर में 1.2 अरब (लगभग 120 करोड़) से अधिक बच्चों का टीकाकरण किया है और 2 करोड़ से ज्यादा मौतों को रोकने में भूमिका निभाई है। फाउंडेशन शोध एवं विकास, आपूर्ति, कीमत निर्धारण और खरीद प्रक्रियाओं में भी सहयोग देता है, ताकि गरीब देशों को वैक्सीन मिल सके।

बिल गेट्स के निजी जीवन और प्रोफेशनल लाइफ पर एपस्टीन से जुड़े मामलों को लेकर जाँच और सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि दुनिया भर की सरकारें और GAVI जैसी संस्थाएँ, जिन्होंने व्यापक टीकाकरण अभियानों से लाखों जानें बचाई हैं, 160 से अधिक देशों की किशोरियों को किसी वैक्सीन एजेंडा के तहत जोखिम में डाल देंगी।

किसी भी वैक्सीन को आम जनता के लिए उपलब्ध कराने से पहले उसे कई प्रक्रिया से गुजरना होता है जिनमें शोध, सुरक्षा परीक्षण और वैज्ञानिक मूल्यांकन से गुजरती है। HPV वैक्सीन का मजबूत वैज्ञानिक रिकॉर्ड और एक रोके जा सकने वाले कैंसर के खिलाफ उसकी प्रभावशीलता को कुछ अप्रमाणित और गैर-वैज्ञानिक साजिश सिद्धांतों के कारण नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Sanghamitra
Sanghamitra
reader, writer, dreamer, no one

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

MOU के बाद भी सुस्ती में रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के ₹29000 करोड़: समझिए कैसे चंद्रबाबू नायडू के...

प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी में ₹5289 करोड़ देंगे, जबकि MDL मुख्य निवेशक के रूप में ₹23964 करोड़ का निवेश करेगा।

पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ नहीं था लक्षद्वीप, 47 साल बाद सरकार ने बदले शराब के नियम: जानिए क्यों, कभी विकास परियोजनाओं के विरोध...

भारत के केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में 47 वर्षों बाद शराब नीति में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने लागू शराबबंदी कानून को समाप्त कर दिया है।
- विज्ञापन -