अमेरिका के एक सरकारी आयोग ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की है। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने अपनी ताजी रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। आयोग का दावा है कि यह संगठन हिंदू राष्ट्रवाद का प्रमुख केंद्र है और इसके कारण भारत में मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित और आदिवासी समुदाय भय के माहौल में जी रहे हैं।
हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब USCIRF ने भारत और हिंदू संगठनों को निशाने पर लिया हो। पिछले कई वर्षों से यह आयोग लगातार ऐसी रिपोर्टें जारी करता रहा है जिनमें भारत को ‘धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाला देश’ बताया जाता है। भारत सरकार हर बार इन रिपोर्टों को ‘पक्षपाती और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित’ बताकर खारिज करती रही है।
दिलचस्प बात यह है कि USCIRF की इस सिफारिश के सामने आते ही भारत में वामपंथी मीडिया, कॉन्ग्रेसी नेता और कई इस्लामी संगठनों से जुड़े लोग खुलकर खुश होते दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों ने इसे ‘सच्चाई सामने आने’ जैसा बताने की कोशिश की। इसमें ये बात जोड़ना अहम है कि कई मौकों पर खुद अमेरिकी सरकार ने भी इसकी सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया। भारत के मामले में 2020 की रिपोर्ट भी खारिज कर दी गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह आयोग कितना प्रभावशाली है, इसकी रिपोर्टों की विश्वसनीयता क्या है और क्यों बार-बार भारत इसकी रिपोर्ट्स के केंद्र में होता है।
USCIRF क्या है और इसकी रिपोर्टें क्यों विवादों में रहती हैं
USCIRF यानी अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) एक अमेरिकी संघीय आयोग है जिसे 1998 में बनाए गए International Religious Freedom Act के तहत स्थापित किया गया था। इसका घोषित उद्देश्य दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति की निगरानी करना और अमेरिकी सरकार को सलाह देना है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह आयोग अक्सर निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बजाय राजनीतिक एजेंडे के तहत रिपोर्ट जारी करता है। इसकी रिपोर्टें अक्सर उन्हीं देशों के खिलाफ अधिक कठोर होती हैं जो अमेरिका की विदेश नीति से पूरी तरह सहमत नहीं होते।
भारत जैसे देशों को लेकर USCIRF की रिपोर्टों पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। भारत सरकार कई बार कह चुकी है कि यह आयोग भारत की जटिल सामाजिक संरचना और संवैधानिक व्यवस्था को समझने में पूरी तरह विफल है। भारत के विदेश मंत्रालय ने 2024 में USCIRF की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा था कि यह संगठन ‘पूर्वाग्रह से भरा और राजनीतिक एजेंडे वाला’ है।
RSS पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश, रिपोर्ट में क्या कहा गया?
USCIRF की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत में हिंदू राष्ट्रवाद का प्रमुख संगठन है और इसके प्रभाव के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति खराब हुई है। आयोग ने अमेरिकी सरकार से सिफारिश की है कि वह इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने या प्रतिबंध जैसी कार्रवाई पर विचार करे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ी है। इसमें भाजपा सरकार, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानून और गौ-संरक्षण कानूनों को भी निशाना बनाया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया, “व्यक्तियों और संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाएँ, जैसे भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), क्योंकि वे धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार हैं और उन्हें सहन करते हैं। यह प्रतिबंध उन व्यक्तियों या संस्थाओं की संपत्तियों को फ्रीज करके और/या उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने से रोककर लागू किया जाए।”
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से कहा है कि भारत के आरएसएस के साथ ही रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) पर भी बैन लगाना चाहिए। आयोग ने रिपोर्ट में आरएसएस और रॉ के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ
रिपोर्ट में राम मंदिर के निर्माण और बाबारी मस्जिद के विध्वंस को लेकर कई बातें लिखी गई हैं। इसमें लिखा है कि साल 2024 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ गई। हालाँकि भारत ने इन आरोपों को पहले भी पक्षपातपूर्ण बताया है। रिपोर्ट में 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाने से राम मंदिर को जोड़ा गया है। बाबरी विध्वंस की वही पुरानी कहानी लिखी गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बस जरा सा जिक्र कर उसे किनारे कर दिया गया है।
रिपोर्ट में ‘एंटी कन्वर्जन लॉ’ का भी जिक्र किया गया है। लिखा गया है कि साल भर में, 28 में से 12 राज्यों ने नए धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करने या मौजूदा कानूनों को और सख्त बनाने की कोशिश की।
इसमें छत्तीसगढ़ के ईसाई पादरी द्वारा जबरन हिंदुओं का धर्म परिवर्तन, असम सरकार ने असम हीलिंग (प्रिवेंशन ऑफ ईविल) प्रैक्टिसेज बिल, राजस्थान में लव जिहाद के लिए नया कानून और गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट समेत अन्य मामलों का जिक्र किया गया।
रिपोर्ट में पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधा गया है। लिखा गया है कि जून चुनावों से पहले मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण और भेदभावपूर्ण बयानबाजी की गई।

खुशी से झूम उठे वामपंथी मीडिया, कॉन्ग्रसी इकोसिस्टम और इस्लामी गैंग से जुड़े लोग
USCIRF की रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत में एक खास तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वामपंथी मीडिया संस्थान, कुछ कॉन्ग्रेसी नेता और कई स्वयंभू एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर इसे ‘भारत में हिंदुत्व की पोल खुलना’ बताने लगे।
कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सोशल मीडिया पर USCIRF की रिपोर्ट को साझा करते हुए भाजपा सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की।
सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पर लिखा, “आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यह सिफारिश अमेरिकी सरकार के आयोग यूएससीआईआरएफ ने ट्रंप प्रशासन को दी है। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद सरदार पटेल द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना बिना किसी कारण के नहीं था। यह कट्टरता को बढ़ावा देता है, सांप्रदायिक तनाव को भड़काता है और भारत को वैश्विक स्तर पर शर्मिंदा करता है।”
𝐑𝐒𝐒 𝐒𝐇𝐎𝐔𝐋𝐃 𝐁𝐄 𝐁𝐀𝐍𝐍𝐄𝐃
— Supriya Shrinate (@SupriyaShrinate) March 16, 2026
This has been recommended by the US govt commission USCIRF to the Trump administration.
USCIRF says RSS is responsible for tolerance of severe violations of religious freedom in India.
It also recommended designating India as a ‘Country of… pic.twitter.com/5pZL6VcntL
USCIRF की रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत में एक खास तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वामपंथी मीडिया संस्थान, कुछ कॉन्ग्रेसी नेता और कई स्वयंभू एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर इसे ‘भारत में हिंदुत्व की पोल खुलना’ बताने लगे। कई वामपंथी पत्रकारों और एक्टिविस्टों ने भी इसे भारत के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय ‘सत्यापन’ की तरह पेश किया।
आर एस एस पर प्रतिबंध लगाया जाए।
— Dr. Mukesh Kumar (@mukeshbudharwi) March 15, 2026
अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने ये सिफ़ारिश की है।
आयोग का कहना है कि ये कोई छोटा-मोटा संगठन नहीं है। ये हिंदू राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा इंजन है। इसकी वज़ह से मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित, आदिवासी और असहमति रखने वाले तमाम लोग भय में… https://t.co/F0RMVqYGaX
अमेरिका के इस्लामी संगठन Indian American Muslim Council (IAMC) ने बयान जारी कर कहा कि USCIRF की सिफारिश पर भारत को CPC घोषित किया जाए और Bajrang Dal, VHP जैसे संगठनों पर भी सैंक्शन लगाए जाएँ। Hindus for Human Rights और अन्य विदेशी-फंडेड ग्रुप्स ने भी रिपोर्ट को प्रमाण मानकर भारत पर हमला तेज कर दिया। मुस्लिम मिरर जैसे इस्लामी न्यूज आउटलेट भी इसमें शामिल रहे।
ये वही लोग हैं जो CAA-NRC को ‘मुस्लिम विरोधी’, राम मंदिर को ‘बहुसंख्यकवाद’, Article 370 खत्म करने को ‘कश्मीर पर अत्याचार’ कहते रहे। उनका खुश होना स्वाभाविक है – USCIRF ने उनके एजेंडे को अमेरिकी सरकारी मंच दे दिया। लेकिन हकीकत यह है कि ये गैंग भारत की बढ़ती आर्थिक-रणनीतिक स्वायत्तता (रूस से तेल खरीद, QUAD में स्वतंत्र रुख, आत्मनिर्भर भारत) से चिढ़ता है, न कि किसी काल्पनिक ‘अल्पसंख्यक उत्पीड़न’ से। ये अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी लॉबी का हिस्सा हैं, जो भारत को कमजोर करने के लिए USCIRF जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं।
साल 2020 से लगातार सीपीसी में डालने की सिफारिश
USCIRF ने 2020 से लगातार भारत को CPC की सूची में डालने की सिफारिश की है। 2020 रिपोर्ट में पहली बार CPC सिफारिश की गई थी, लेकिन अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने खारिज करते हुए कहा कि भारत में ये सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि कुछ सामुदायिक घटनाएँ थीं। अमेरिकी राजदूत सैमुएल ब्राउनबैक ने कहा था कि पाकिस्तान में तो सरकार स्तर पर ब्लास्फेमी कानून से अल्पसंख्यक जेलों में हैं, भारत में ऐसा नहीं। लेकिन USCIRF नहीं माना।
हर बार एक ही रोना, 2023-2024 की रिपोर्ट्स में भी एक जैसी बात
USCIRF की रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है। साल 2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।
रिपोर्ट में साल 2024 में भी यही सुझाव था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।
साल 2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है। कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं और वो है भारत को बदनाम करना।
USCIRF कमिश्नरों के पाकिस्तान, मिशनरी, सोरोस और एंटी-हिंदू काम के लिंक
USCIRF कमिश्नरों की नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस द्वारा होती है। साल 2026 की रिपोर्ट के समय मुख्य कमिश्नर के तौर पर जो नाम सामने हैं, उन सभी का अतीत भारत के खिलाफ आग उगलने वाला, हिंदुत्व के खिलाफ बकवास करने वाला और वामपंथी इकोसिस्टम से जुड़े रहने का है। कोई सोरोस से फंडिंग पाता है, तो किसी ने पाकिस्तान में शिक्षा प्राप्त की है। हमने पिछले साल भी इनके बारे में बताया था। इस बार चेयर के तौर पर पाकिस्तानी आसिफ महमूद की जगह विकी हार्ट्जलर का नाम है, पिछले साल की पोजिशन की दोनों ने अदला-बदली की है।

भारत सरकार बता चुकी है पक्षपाती और राजनीतिक एजेंडा सेट करने वाला
भारत सरकार ने USCIRF की रिपोर्टों को लगातार खारिज किया है। बीते साल भी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि यह आयोग “तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है और भारत की बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करता है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहाँ लगभग सभी प्रमुख धर्मों के लोग रहते हैं और अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता रखते हैं। भारत सरकार का यह भी कहना है कि USCIRF अक्सर अलग-थलग घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और भारत की संस्थाओं तथा न्यायिक फैसलों को नजरअंदाज कर देता है।
भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का हिस्सा है USCIRF रिपोर्ट
अमेरिका के United States Commission on International Religious Freedom की रिपोर्ट ने एक बार फिर भारत को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है। इस बार निशाने पर RSS है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है। राम मंदिर से लेकर नागरिकता कानून और दिल्ली दंगों तक भारत के लगभग हर बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे को इस आयोग की रिपोर्टों में विवादित तरीके से पेश किया गया है।
सवाल यह है कि क्या किसी विदेशी आयोग को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जटिल सामाजिक व्यवस्था पर अंतिम फैसला सुनाने का अधिकार होना चाहिए? और क्या इन रिपोर्टों का उद्देश्य सचमुच धार्मिक स्वतंत्रता की चिंता है या फिर भारत के खिलाफ एक वैश्विक नैरेटिव तैयार करना?


