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32 साल पहले कजाकिस्तान में जो क्लिंटन ने किया, क्या ईरान में वही दोहरा पाएँगे ट्रंप?: जानें- ईरान से 450 किलो यूरेनियम छीनना कितना मुश्किल

सबसे बड़ा पंगा तो 'दोस्त और दुश्मन' का है। 32 साल पहले कजाकिस्तान में अमेरिका को एक मुस्कुराता हुआ 'दोस्त' मिला था, जिसने खुद अपनी तिजोरी की चाबियाँ थमा दी थीं। मगर यहाँ ईरान में उसका सामना एक ऐसे 'जहरीले दुश्मन' से है जो अपने परमाणु गौरव को बचाने के लिए आखिरी साँस तक लड़ने का दम रखता है। ऐसे में ट्रंप के लिए 1994 वाला इतिहास दोहराना, साल 2026 की कड़वी हकीकत में किसी 'मिशन इम्पॉसिबल' से कम नहीं लगता।

मिडिल ईस्ट के अखाड़े में एक बार फिर जबरदस्त ‘कुश्ती’ शुरू होने वाली है और इस बार दाँव पर है परमाणु बम का मसाला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इशारा दे दिया है कि वो ईरान के खजाने से उसका ‘यूरेनियम’ (Enriched Uranium) उड़ाने के लिए एक खतरनाक ‘ग्राउंड ऑपरेशन’ यानी जमीनी धावा बोल सकते हैं। यह कोई छोटा-मोटा मिशन नहीं है, बल्कि इसे दुनिया का सबसे टेढ़ा और जोखिम भरा ऑपरेशन कहा जा रहा है।

अमेरिका का टारगेट है ईरान के पास मौजूद वो 450 किलो यूरेनियम, जिससे चुटकियों में 10 से 11 परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। आसान भाषा में कहें तो ट्रंप अब ‘मिशन इम्पॉसिबल’ वाले अंदाज में ईरान के घर में घुसकर उसका सबसे खतरनाक सामान जब्त करने के मूड में हैं।

ट्रंप की रणनीति: ‘ऑयल’ और ‘यूरेनियम’ पर कब्जा

सीधे शब्दों में कहें तो ट्रंप अब ‘पहले तेल, फिर खेल’ वाली नीति पर उतर आए हैं। उनका सीधा हिसाब है ‘या तो ईरान शांति से मेज पर आकर बात मान ले, वरना अमेरिका उसके कमाई के सबसे बड़े अड्डे, यानी ‘खार्ग आइलैंड‘ के तेल पर ही कब्जा कर लेगा’। ट्रंप की नजर सिर्फ तेल पर नहीं, बल्कि ईरान की परमाणु ‘तिजोरी’ पर भी है। इसके लिए पेंटागन ने एक ऐसा प्लान तैयार किया है जिसे सुनकर किसी भी फिल्म की स्क्रिप्ट फीकी पड़ जाए। उनके स्पेशल कमांडो सीधे ईरान की सीमा फाँदकर वहाँ रखा परमाणु बारूद (यूरेनियम) उठा लाने की तैयारी में हैं।

जानकारों का मानना है कि ट्रंप फिलहाल अपनी सेना दिखाकर ईरान को डरा रहे हैं ताकि वह घुटने टेक दे। लेकिन अगर ईरान ने प्यार की भाषा नहीं समझी और अपना यूरेनियम नहीं सौंपा, तो अमेरिका ‘छीना-झपटी’ यानी जबरदस्ती कब्जा करने से भी पीछे नहीं हटेगा। इसके लिए खाड़ी के इलाके में अमेरिकी फौजियों का मेला लग गया है। 50,000 जवान पहले से तैनात हैं और खबर है कि 17,000 और ‘मैदानी लड़ाके’ वहाँ लैंड करने वाले हैं। यानी माहौल पूरी तरह गरम है।

पेंटागन की तैयारी: समंदर से आसमान तक घेराबंदी

अब जरा मंजर सोचिए, समंदर के रास्ते लोहे के बड़े-बड़े पहाड़ तैरते हुए ईरान की तरफ बढ़ रहे हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पक्का कर दिया है कि USS Tripoli जैसा दैत्यनुमा युद्धपोत मिडिल ईस्ट के पानी में लंगर डाल चुका है। ये कोई मामूली जहाज नहीं है, बल्कि चलता-फिरता फौजी अड्डा है। इसके पीछे-पीछे यूएसएस बॉक्सर, यूएसएस कॉम्स्टॉक और यूएसएस पोर्टलैंड (USS Boxer, USS Comstock, USS Portland) जैसे खूंखार युद्धपोतों की पूरी फौज भी रास्ते में है।

इन जहाजों के पेट में हजारों की संख्या में ‘मरीन कमांडो’, आसमान चीरने वाले ‘फाइटर जेट’ और ऐसी मशीनें भरी हैं जो पलक झपकते ही ईरान के द्वीपों या परमाणु ठिकानों पर ‘आसमानी धावा’ बोल सकती हैं। खास बात ये है कि इन्हें हमला करने के लिए किसी जमीन या बेस की जरूरत नहीं, ये समंदर से ही सीधा ‘एक्शन’ शुरू कर सकते हैं।

जानकारों की मानें तो अमेरिका का इरादा कोई सालों साल चलने वाली महाभारत छेड़ने का नहीं है। उनका गेम प्लान एकदम ‘फटाफट’ वाला है। यानी ‘आओ, मारो और सामान लेकर निकलो’। इसे आप एक बड़े लेवल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ समझ सकते हैं। इस काम के लिए अमेरिका ने अपनी सबसे घातक ‘82nd एयरबोर्न डिवीजन‘ के 4,000 जांबाज जवानों को ‘रैपिड एंट्री फोर्स’ के तौर पर बिल्कुल रेडी रखा है।

इनका काम होगा बिजली की फुर्ती से दुश्मन के इलाके में घुसना। पुराने नौसेना दिग्गजों का कहना है कि ईरान के टापुओं पर कब्जा करना तो मुमकिन है, लेकिन असली सिरदर्दी ये है कि इस ‘लूट’ को कितनी जल्दी अंजाम दिया जाए। क्योंकि जब तक ये हंगामा चलेगा, दुनिया का सबसे बिजी समुद्री रास्ता ‘होर्मुज’ बंद रहेगा, जिससे पूरी दुनिया के व्यापार का भट्ठा बैठ सकता है। इसलिए अमेरिका की कोशिश है कि काम भी हो जाए और देर भी न लगे।

ईरान का अभेद्य किला: इस्फहान और नतांज की सुरंगें

अब जरा सोचिए, ईरान का यह ‘परमाणु खजाना’ कोई ऐसी वैसी तिजोरी नहीं है जिसे मास्टर-की से खोल लिया जाए। यह तो समझ लीजिए कि पाताल लोक में छिपा कोई खजाना है। दुनिया की नजर रखने वाली संस्था (IAEA) कहती है कि ईरान ने अपना सारा यूरेनियम इस्फहान और नतांज जैसी जगहों पर जमीन के नीचे गहरी सुरंगों और बंकरों में ठूँस रखा है।

इन बंकरों के ऊपर कंक्रीट की इतनी मोटी परतें हैं कि बम भी शरमा जाएँ। अमेरिकी कमांडोज के लिए चुनौती सिर्फ अंदर घुसना नहीं है, बल्कि वहाँ बिछी बिछी ‘मौत की सुरंगों’ (लैंडमाइन्स) और जान देने को तैयार बैठे ईरानी सैनिकों के जबरदस्त घेरे को तोड़ना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए ज्वालामुखी के अंदर घुसकर हीरा निकालना हो!

ऊपर से मुसीबत ये कि यह यूरेनियम कोई छोटी-मोटी पुड़िया नहीं है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की मानें तो यह बारूद 40 से 50 भारी-भरकम सिलेंडरों में भरा है, जो देखने में बिल्कुल गोताखोरों के ‘स्कूबा टैंक’ जैसे लगते हैं। अब इन भारी और रेडियोएक्टिव सिलेंडरों को कंधे पर लादकर तो भागा नहीं जा सकता। इन्हें सुरक्षित निकालने के लिए खास किस्म के ट्रकों का काफिला और एक पूरा तामझाम (लॉजिस्टिक सिस्टम) चाहिए होगा।

सबसे बड़ा सिरदर्द तो ये है कि इन सिलेंडरों को ईरान से बाहर ले जाने के लिए एक पूरे हवाई अड्डे पर कब्जा करना पड़ेगा, जिसमें घंटों नहीं बल्कि कई दिन लग सकते हैं। अब आप ही सोचिए, दुश्मन के घर में बैठकर आराम से ट्रक लोड करना और विमान का इंतजार करना किसी ‘सुसाइड मिशन’ से कम नहीं है। जरा सी चूक हुई नहीं कि पूरा मिशन धुआँ-धुआँ हो सकता है।

32 साल पहले का ‘प्रोजेक्ट सफायर’: जब कजाकिस्तान से निकला था यूरेनियम

ट्रंप के इस ‘सुपरमैन’ वाले प्लान के पीछे असल में 32 साल पुरानी एक फिल्मी कहानी छिपी है, जिसका नाम था ‘प्रोजेक्ट सफायर‘। बात 1994 की है, जब सोवियत संघ (रूस) ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। उस अफरा-तफरी में कजाकिस्तान के एक पुराने, कबाड़ जैसे गोदाम में 600 किलो हाई-क्वालिटी यूरेनियम लावारिस पड़ा मिला। यह कोई मामूली कूड़ा नहीं था, बल्कि इससे 20 परमाणु बम बन सकते थे। डर यह था कि अगर यह किसी आतंकी या स्मगलर के हाथ लग गया, तो दुनिया का नक्शा ही बदल जाएगा।

तभी मैदान में आए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन। उन्होंने चुपके से एक जासूसी फिल्म जैसा मिशन शुरू किया। 31 लोगों की एक ‘स्पेशल टीम’ बनाई गई, जिसमें फौजी नहीं बल्कि चश्मा लगाने वाले वैज्ञानिक और टेक्नीशियन शामिल थे। ये लोग तीन भीमकाय C-5 Galaxy विमानों में बैठकर कजाकिस्तान के बर्फीले इलाके में उतरे। वहाँ का नजारा ऐसा था कि हड्डियाँ गला देने वाली ठंड, चारों तरफ बर्फ की मोटी चादर और ऊपर से जानलेवा रेडिएशन का खतरा।

इस टीम ने पूरे 4 हफ्तों तक चूहे की तरह छुप-छुपकर काम किया। दिन-रात एक करके उन्होंने उस ‘परमाणु बारूद’ को खास डिब्बों में पैक किया और दुनिया की नजरों से बचाकर अमेरिका के टेनेसी सुरक्षित पहुँचा दिया। जब सारा माल ठिकाने लग गया, तब कहीं जाकर 23 नवंबर 1994 को क्लिंटन ने दुनिया को बताया कि ‘भैया, हमने दुनिया को एक बड़ी तबाही से बचा लिया है।’ आज ट्रंप भी ठीक वैसी ही ‘लूट’ ईरान में करना चाहते हैं, बस फर्क ये है कि वहाँ कोई स्वागत करने के लिए खड़ा नहीं है।

कजाकिस्तान और ईरान: जमीन-आसमान का अंतर

ट्रंप 32 साल पुराने ‘प्रोजेक्ट सफायर’ वाली कामयाबी फिर से दोहराना तो चाहते हैं, लेकिन भाई साहब। कजाकिस्तान और ईरान की कहानी में जमीन-आसमान नहीं, बल्कि पाताल का अंतर है। इसे ऐसे समझिए कि एक तरफ किसी दोस्त के घर जाकर शांति से सामान पैक करना था, और दूसरी तरफ किसी गुस्सैल पहलवान के घर में सेंधमारी करनी है।

सबसे बड़ा पंगा तो ‘दोस्ती और दुश्मनी’ का है। कजाकिस्तान में तो वहाँ की सरकार ने खुद रेड कार्पेट बिछाकर अमेरिकियों को बुलाया था ‘आओ भाई, ये खतरनाक कूड़ा ले जाओ।’ वहाँ कोई गोली चलने का डर नहीं था। लेकिन ईरान? वहाँ तो पहले से ही बम-गोले बरस रहे हैं। यहाँ मिशन का मतलब है ‘हर मोड़ पर गोलियाँ, सिर के ऊपर मंडराती मिसाइलें और चारों तरफ बिछी बारूदी सुरंगे’। ये कोई ‘पिकनिक’ नहीं, बल्कि खूंखार ‘कॉम्बैट ऑपरेशन’ होगा, जहाँ पल-पल पर जान का खतरा है।

ऊपर से ईरान कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं है। उसके पास खतरनाक ड्रोन्स, सटीक मिसाइलें और जान देने को तैयार बैठी एक ट्रेंड फौज है। अगर अमेरिका ने ईरान के ‘परमाणु खजाने’ को हाथ भी लगाया, तो तेहरान अपनी मिसाइलों की ऐसी बौछार करेगा कि पूरे मिडिल ईस्ट में आसमान काला पड़ जाएगा। कजाकिस्तान में तो बस ठंड और बर्फ से बचना था, लेकिन ईरान में तो ‘रेडियोएक्टिव’ सिलेंडरों को मलबे और आग के बीच से निकालना होगा। टूटी हुई न्यूक्लियर साइट्स से गैस से भरे टैंकों को ढोना किसी ‘सुसाइड मिशन’ से कम नहीं है। जरा सी गैस लीक हुई या किसी ने माचिस दिखाई, तो लेने के देने पड़ जाएँगे।

ट्रंप का ‘परमाणु जुआ’: जीत मिली तो इतिहास, चूके तो महाविनाश

ईरान से यूरेनियम झपट लेने का यह प्लान सिर्फ फौजियों की बहादुरी का टेस्ट नहीं है, बल्कि ट्रंप के लिए एक बहुत बड़ा ‘सियासी जुआ’ भी है। एक तरफ तो ट्रंप ने सीना ठोककर अपने देश के लोगों से वादा किया है कि वो अमेरिका को मिडिल ईस्ट की किसी भी ‘खूनी जंग’ के दलदल में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, ईरान की धरती पर अपने सैनिकों को उतारना सीधा-सीधा उसी दलदल में छलाँग लगाने जैसा है। अब मुसीबत ये है कि बिना जमीन पर पैर रखे यूरेनियम हाथ लगेगा नहीं और पैर रखा तो वादे का क्या होगा? यह तो वही बात हो गई कि ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’, जो कि इस मामले में लगभग नामुमकिन है।

जरा सोचिए, अगर यह मिशन कामयाब हो गया, तो यह दुनिया के इतिहास का सबसे तगड़ा और जांबाज सैन्य कारनामा माना जाएगा, बिल्कुल किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह। लेकिन अगर कहीं भी एक छोटी सी चूक हो गई, तो अंजाम बहुत डरावना होगा। न केवल भारी संख्या में अमेरिकी जवानों की जान जाएगी, बल्कि पूरा का पूरा इलाका एक ऐसे परमाणु बारूद के ढेर पर बैठ जाएगा जहाँ से वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं होगा।

सबसे बड़ा पंगा तो ‘दोस्त और दुश्मन’ का है। 32 साल पहले कजाकिस्तान में अमेरिका को एक मुस्कुराता हुआ ‘दोस्त’ मिला था, जिसने खुद अपनी तिजोरी की चाबियाँ थमा दी थीं। मगर यहाँ ईरान में उसका सामना एक ऐसे ‘जहरीले दुश्मन’ से है जो अपने परमाणु गौरव को बचाने के लिए आखिरी साँस तक लड़ने का दम रखता है। ऐसे में ट्रंप के लिए 1994 वाला इतिहास दोहराना, साल 2026 की कड़वी हकीकत में किसी ‘मिशन इम्पॉसिबल’ से कम नहीं लगता। अब देखना ये है कि ट्रंप इस जुए में बाजी मारते हैं या फिर ये मिशन उनके लिए ही सिरदर्द बन जाता है।

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