मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग अब केवल मिसाइलों और हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहा है। इस युद्ध का असर वैश्विक राजनीति के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर व्यापार, ऊर्जा और समुद्री मार्गों पर भी पड़ रहा है। इस संघर्ष ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को लगभग बंद कर दिया है।
ईरान ने जहाँ हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते को बंद कर दिया तो वहीं अब यमन के हूतियों के इस युद्ध में कूदने के चलते अब एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग ‘बाब अल-मंदेब स्ट्रेट’ के बंद होने का खतरा भी मंडरा रहा है। हूतियों ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइल मारने की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहाँ स्थिति बिगड़ती है तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक और बड़े झटके की ओर धकेल सकता है।
बाब अल-मंदेब: इतिहास से लेकर भूगोल और रणनीतिक महत्व तक
बाब अल-मंदेब स्ट्रेट देखने में छोटा सा समुद्री रास्ता लगता है लेकिन रणनीतिक रूप से इसकी अहमियत बड़ी है। यह एशिया और अफ्रीका के बीच पड़ता है और यमन को जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी और फिर हिंद महासागर से जोड़ता है। इसलिए यह यूरोप और एशिया के बीच सामान लाने-ले जाने का एक बहुत जरूरी रास्ता है।
यह समुद्री रास्ता लगभग 100 किलोमीटर लंबा है और सबसे संकरी जगह पर करीब 30 किलोमीटर चौड़ा रह जाता है। इसी वजह से यह दुनिया के व्यापार के लिए बहुत संवेदनशील जगह माना जाती है क्योंकि यहाँ अगर कोई दिक्कत हो जाए तो बड़े-बड़े जहाजों की आवाजाही रुक सकती है। इसके बीच में पेरिम नाम का एक द्वीप है जो इसे दो हिस्सों में बाँटता है। एक हिस्सा गहरा और चौड़ा है जहाँ से बड़े अंतरराष्ट्रीय जहाज गुजरते हैं जबकि दूसरा हिस्सा उथला है जिसका इस्तेमाल ज्यादातर स्थानीय नावें करती हैं।
इसका नाम ही ‘आँसुओं का दरवाजा’ भी है और यह नाम यूँ ही नहीं पड़ा है। इसके पीछे पुरानी कहानियाँ और खतरनाक समुद्री हालात जुड़े हुए हैं। पहले के समय में यहाँ कई जहाज हादसों का शिकार हो चुके हैं। एक कहानी यह भी कही जाती है कि बहुत पहले एक भूकंप आया था जिससे एशिया और अफ्रीका अलग हो गए और यह समुद्री रास्ता बन गया।
स्वेज नहर के बाद बढ़ी अहमियत
1869 में स्वेज नहर खुलने के बाद बाब अल-मंदेब की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई। पहले जहाजों को यूरोप से एशिया जाने के लिए पूरे अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाना पड़ता था लेकिन स्वेज नहर बनने के बाद एक छोटा और सीधा रास्ता मिल गया। इस रास्ते में बाब अल-मंदेब भी आता है और यह इसलिए बहुत जरूरी बन गया।
आज यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे अहम रास्तों में से एक है। इसी के जरिए कई देशों के बीच सामान आता-जाता है। यहाँ से गुजरने वाले जहाज सिर्फ माल ही नहीं ले जाते बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को चलाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
वैश्विक तेल सप्लाई और बाब अल-मंदेब
तेल और ऊर्जा के मामले में बाब अल-मंदेब बहुत ही अहम रास्ता है। 2023 में हर दिन करीब 9.3 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम सामान इसी रास्ते से गुजरता था। यह दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले कुल तेल व्यापार का करीब 12 प्रतिशत है। इससे समझ सकते हो कि यह सिर्फ एक इलाके के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए कितना जरूरी है।
2024 में हालात अचानक बदल गए। यमन के हूती विद्रोहियों ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। इसके बाद इस रास्ते से गुजरने वाला तेल घटकर लगभग 4.1 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया यानी पहले के मुकाबले लगभग आधा हो गया। इसका असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा बल्कि दुनिया भर में सप्लाई, कीमतों और व्यापार पर भी पड़ा।
इसका असर स्वेज नहर और उससे जुड़ी पाइपलाइन पर भी देखने को मिला और यहाँ तेल का आना-जाना काफी कम हो गया। इससे साफ है कि अगर बाब अल-मंदेब में थोड़ी भी गड़बड़ी होती है तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।
हॉर्मुज और बाब अल-मंदेब: दोहरे संकट का खतरा
अभी हालात इसलिए ज्यादा गंभीर माने जा रहे हैं क्योंकि परेशानी सिर्फ एक समुद्री रास्ते तक सीमित नहीं है। एक तरफ हॉर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से ही तनाव है इस रास्ते से दुनिया का करीब 20 से 25 प्रतिशत तेल गुजरता है। अब बाब अल-मंदेब पर भी खतरा बढ़ता जा रहा है।
अगर ये दोनों रास्ते एक साथ प्रभावित होते हैं तो दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का करीब 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा खतरे में आ सकता है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ेगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था हिल सकती है।
बाब अल-मंदेब में गड़बड़ी का असर शिपिंग पर भी साफ दिखेगा जब जहाज इस रास्ते से नहीं जा पाते तो उन्हें अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे यात्रा का समय 27 दिनों से बढ़कर 40 से 50 दिन तक हो जाता है। जाहिर है कि इससे ईंधन ज्यादा लगता है और खर्च भी बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस वजह से हर बैरल तेल को ले जाने में करीब 2 डॉलर ज्यादा खर्च आ रहा है। इसके अलावा बड़े तेल टैंकरों का किराया भी बहुत बढ़ गया है जो कुछ मामलों में 7 लाख डॉलर प्रति दिन तक पहुँच चुका है।
भारत पर पड़ सकता है क्या असर?
भारत के लिए यह स्थिति पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन चिंता की बात जरूर है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के तेल आयात का बड़ा हिस्सा बाब अल-मंदेब के रास्ते नहीं आता जिससे इसका सीधा असर थोड़ा कम पड़ता है। हालाँकि, दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से तनाव चल रहा है और इसका असर साफ तौर पर भारत पर भी पड़ रहा है।
सरकार ने पहले ही किसी भी खतरे की स्थिति को सँभालने के लिए तेल खरीदने के स्रोत बढ़ा दिए हैं और रूस से भी आयात में तेजी आने की संभावना है। इससे फिलहाल स्थिति काबू में है लेकिन अगर लंबे समय तक तनाव बना रहा तो असर दिख सकता है। खासकर तब जब तेल और गैस को लाने-ले जाने की लागत बढ़ जाती है।
एक और बड़ी बात यह है कि बाब अल-मंदेब से सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि बहुत सारा और सामान भी आता-जाता है। दुनिया के 15 से 20 प्रतिशत कंटेनर इसी रास्ते से गुजरते हैं जिनमें मशीनरी, खाने-पीने का सामान और दूसरी जरूरी चीजें शामिल होती हैं। अगर यह रास्ता प्रभावित होता है तो सामान देर से पहुँचेगा, खर्च बढ़ेगा और इसका असर आम लोगों पर महँगाई के रूप में दिख सकता है।
क्यों मुश्किल है बाब अल-मंदेब को बंद करना?
बाब अल-मंदेब को पूरी तरह बंद करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है और इसके पीछे कई भू-राजनीतिक, सैन्य और भौगोलिक कारण एक साथ काम करते हैं। सबसे पहले इसकी संरचना को समझना जरूरी है कि यह कोई संकरा ‘चोक पॉइंट’ नहीं है जहाँ एक-दो जहाज डुबोकर रास्ता रोका जा सके बल्कि लगभग 30 किलोमीटर चौड़ा एक खुला समुद्री मार्ग है जिसमें अलग-अलग चैनल और रास्ते मौजूद हैं, जिससे बड़े-बड़े तेल टैंकर और कंटेनर जहाज कई दिशाओं से गुजर सकते हैं।
इसी वजह से यहाँ ‘डेड-एंड ब्लॉकेज’ बनाना लगभग असंभव हो जाता है जबकि ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ जैसे स्थानों पर अपेक्षाकृत संकरी निकासी होने के कारण नियंत्रण करना सैद्धांतिक रूप से आसान माना जाता है।
दूसरा बड़ा कारण इस क्षेत्र की भारी अंतरराष्ट्रीय सैन्य मौजूदगी है। अफ्रीका के तट पर स्थित जिबूती भले ही छोटा देश है लेकिन यहाँ अमेरिका, फ्रांस, चीन और अन्य देशों के सैन्य अड्डे मौजूद हैं जो इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए हर समय निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता रखते हैं। ऐसे में कोई भी देश या संगठन अगर इसे बलपूर्वक बंद करने की कोशिश करता है, तो वह सीधे वैश्विक सैन्य टकराव को न्योता देगा।
तीसरा पहलू हूती जैसे विद्रोही हैं जो मिसाइल, ड्रोन या समुद्री हमलों के जरिए जहाजों को निशाना बनाकर डर और अनिश्चितता जरूर पैदा कर सकते हैं लेकिन वे भी इस स्ट्रेट को भौतिक रूप से सील नहीं कर सकते क्योंकि इसके लिए लगातार और व्यापक सैन्य नियंत्रण चाहिए होता है जो उनके बस की बात नहीं है।


