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ऐतिहासिक धोखों की छाया में कुर्द, अमेरिकी हथियारों के बावजूद ईरानी सीमा से लौटे लड़ाके: हर मोर्चे पर जीत कर भी हारे, समझें- तेहरान से न टकराने के पीछे की वजह

डोनाल्ड ट्रंप ने खुलासा किया ईरान विरोधी प्रदर्शनकारियों को हथियार पहुँचाने के लिए अमेरिका ने कुर्दों का सहारा लिया था। लेकिन कुर्द लड़ाके ईरान की सीमा तक पहुँचकर लौट गए। कुर्दों ने वो हथियार अपने पास रख लिए।

पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति के बीच कुर्दों की कहानी एक ऐसे समुदाय की दास्तान है, जिसे बार-बार इस्तेमाल किया गया, लेकिन कभी स्थायी पहचान या भरोसेमंद समर्थन नहीं मिला। डोनाल्ड ट्रंप के रविरा (05 अप्रैल 2026) के उस बयान ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान विरोधी कुर्द समूहों को अमेरिका की तरफ से हथियार दिए गए थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार (05 अप्रैल 2026) को एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान के सत्ताविरोधी प्रदर्शनकारियों को हथियार पहुँचाने के लिए अमेरिका ने कुर्दों का सहारा लिया था। लेकिन कुर्दों ने वो हथियार अपने पास रख लिए।

जब डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्वीकार किया कि अमेरिका ने ईरान के विद्रोही कुर्दों को हथियार पहुँचाए, तो दुनिया को लगा कि शायद अब ईरान की सत्ता पलट जाएगी। लेकिन कुर्दों के पाँव ठिठक गए। वे ईरान की सीमा तक आए, हथियार उनके पास थे, सेना तैयार थी, लेकिन वे अंदर नहीं घुसे। क्यों? क्योंकि उन्हें मालूम था कि जिस दिन अमेरिका का स्वार्थ सिद्ध हो जाएगा, उन्हें फिर से पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ेगी।

इतिहास की किताबों में कई ऐसी कौमों का ज़िक्र है जिन्हें वक्त ने बेरहमी से कुचला, लेकिन ‘कुर्द’ (Kurds) एक ऐसी पहचान हैं जिन्हें वक्त के साथ-साथ दुनिया की हर बड़ी महाशक्ति ने इस्तेमाल किया और फिर बीच मझधार में मरने के लिए छोड़ दिया। ईरान में जो हुआ, वह उसी ‘ऐतिहासिक डर’ और ‘अतीत के ज़ख्मों’ का ताज़ा अध्याय है।

कौन हैं कुर्द?

कुर्द दुनिया के सबसे बड़े जातीय समूह हैं, जिनकी अपनी कोई स्वतंत्र राष्ट्र नहीं है। अनुमानित 30 से 45 मिलियन की आबादी वाले ये लोग मुख्य रूप से तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में बंटे हुए हैं। उनकी भूमि जिसे वे कुर्दिस्तान कहते हैं, पहाड़ी इलाकों में फैली हुई है खासकर टॉरस और ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखलाओं के बीच। कुर्द भाषा इंडो-ईरानी परिवार की है, जिसमें कुर्मांजी (तुर्की, सीरिया में प्रमुख) और सोरानी (इराक, ईरान में) मुख्य बोलियाँ हैं। अधिकांश कुर्द सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन यजीदी, शिया, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समूह भी हैं। उनकी संस्कृति में लोकगीत, नृत्य, कविता और स्वतंत्रता की भावना गहराई से जुड़ी हुई है।

कुर्दों का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन काल में वे मेडेस जैसे समूहों से जुड़े माने जाते हैं, जिन्होंने 612 ईसा पूर्व असिरिया साम्राज्य को हराया था। इस्लाम के आगमन के बाद सातवीं शताब्दी में ‘कुर्द’ शब्द प्रचलित हुआ। सलाहुद्दीन अय्यूबी जैसे कुर्द योद्धा ने क्रूसेडर्स के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आधुनिक युग में उनकी नियति धोखे और दमन की रही।

आधुनिक काल में मिले सिर्फ धोखे, 100+ साल से भटक रहे

कुर्दों के साथ धोखे की शुरुआत आज की नहीं है, यह एक सदी पुरानी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) ढह रहा था, तब कुर्दों को पहली बार एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना दिखाया गया था।

दरअसल, प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ओटोमन साम्राज्य का पतन हुआ, तब 1920 की सेवरेस की संधि में कुर्दिस्तान नाम के एक स्वतंत्र देश का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन जैसे ही तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क का उदय हुआ, ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने रणनीतिक हितों के लिए पाला बदल लिया। 1923 में Treaty of Lausanne हुई, जिसमें ‘कुर्दिस्तान’ के वादे को कूड़ेदान में डाल दिया गया। कुर्दों को चार अलग-अलग देशों तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान के बीच बाँट दिया गया। यह वह पहला बड़ा विश्वासघात था जिसने कुर्दों को ‘दुनिया का सबसे बड़ा जमीन विहीन अल्पसंख्यक’ बना दिया।

आज कुर्दों की कुल आबादी लगभग 3.5 से 4 करोड़ के बीच है। वे मध्य पूर्व के एक ऐसे पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं जिसे अनौपचारिक रूप से ‘कुर्दिस्तान’ कहा जाता है, लेकिन नक्शे पर ऐसा कोई देश मौजूद नहीं है।

तुर्की में बुरी तरह से दमन

तुर्की में कुर्दों को लंबे समय तक अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। तुर्किए की सरकार ने उन्हें ‘पहाड़ी तुर्क’ कहकर उनकी अलग पहचान से इनकार किया और उनकी भाषा तथा संस्कृति पर पाबंदियाँ लगाईं। इसके जवाब में PKK (Kurdistan Workers’ Party) ने 1980 के दशक में सशस्त्र संघर्ष शुरू किया, जो आज तक जारी है। इस संघर्ष में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और कुर्द इलाकों में भारी सैन्य कार्रवाई होती रही है। हाल के वर्षों में तुर्की ने उत्तरी सीरिया में भी कुर्दों के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन चलाए, जिससे वहाँ बने उनके स्वायत्त क्षेत्र कमजोर पड़ गए।

इराक के सद्दाम काल में हुआ कत्लेआम

इराक में कुर्दों का अनुभव भी बेहद दर्दनाक रहा है। सद्दाम हुसैन के शासन में 1988 का हलब्जा केमिकल अटैक कुर्द इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है, जिसमें रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल से हजारों लोगों की मौत हुई। हालाँकि 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की दखल से उत्तरी इराक में कुर्दों के लिए ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ बनाया गया और बाद में उन्हें सीमित स्वायत्तता मिली। 2005 में कुर्दिस्तान रीजनल गवर्नमेंट की स्थापना हुई, लेकिन 2017 में स्वतंत्रता जनमत संग्रह के बाद इराकी सरकार ने कई विवादित इलाकों पर दोबारा नियंत्रण कर लिया, जिससे कुर्दों की स्थिति फिर कमजोर हो गई।

दरअसल, 2003 में अमेरिकी आक्रमण के बाद सद्दाम का पतन हुआ और उत्तरी इराक में ‘कुर्दिस्तान स्वायत्त क्षेत्र’ बना। आज यही वह एकमात्र इलाका है जिसे कुर्द अपनी ‘सुरक्षित जमीन’ मानते हैं। इसी को खोने के डर से वे हाल ही में ईरान में घुसने से हिचक गए।

सीरिया में भी मिला धोखा

सीरिया में कुर्दों ने आईएसआई के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने गए। सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान कुर्दों (YPG/SDF) ने वह कर दिखाया जो दुनिया की बड़ी सेनाएँ नहीं कर पाई थीं। उन्होंने जमीनी लड़ाई में ISIS (इस्लामिक स्टेट) के दाँत खट्टे कर दिए। कोबानी की लड़ाई कुर्दों की वीरता का प्रतीक बन गई।

धोखा 2.0: अमेरिका ने ISIS के खिलाफ कुर्दों का भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक सीरिया से अमेरिकी सेना हटाने का फैसला कर लिया। इस फैसले ने कुर्दों को उनके सबसे बड़े दुश्मन तुर्की के सामने निहत्था छोड़ दिया। अमेरिका के हटते ही तुर्की ने सीरिया के कुर्द इलाकों पर हमला कर दिया और उस स्वायत्तता को लगभग खत्म कर दिया जिसे कुर्दों ने खून बहाकर हासिल किया था।

तुर्की कुर्दों को अपनी राष्ट्रीय अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। तुर्की के भीतर ‘कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी’ (PKK) पिछले 40 वर्षों से सशस्त्र संघर्ष कर रही है, जिसमें 40,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। रायटर्स की रिपोर्ट बताती है कि सीरियाई कुर्द आज भी शिविरों में नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

तुर्की के भीतर कुर्दों की राजनीतिक पार्टी HDP के नेताओं को जेल में डाल दिया गया है। फिलहाल एक अनौपचारिक सीजफायर या ‘ठहराव’ की स्थिति है, लेकिन यह किसी शांति समझौते की वजह से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक मंदी की वजह से है। तुर्की इस वक्त अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और सीरिया में रूस-ईरान के समीकरणों की वजह से सीधे बड़े युद्ध से बच रहा है, लेकिन कुर्दों पर दमन जारी है।

ईरान में लंबे समय से अधिकारों की माँग

ईरान में भी कुर्द लंबे समय से राजनीतिक अधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की माँग करते रहे हैं। ईरान में महसा अमीनी (जो खुद एक कुर्द थीं) की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों में कुर्द सबसे आगे थे। ट्रंप के खुलासे के मुताबिक, अमेरिका ने कुर्दों को हथियार दिए ताकि वे ईरान के भीतर सशस्त्र विद्रोह कर सकें। ईरान ने भी इसका बदला लेने के लिए इराक के कुर्द इलाकों पर मिसाइलें दागीं।

बीते महीनों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान कुर्द इलाकों में कड़ी कार्रवाई हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई को कठोर सजा दी गई। इसी पृष्ठभूमि में जब अमेरिका की तरफ से हथियारों की आपूर्ति की खबर सामने आई और कुर्द लड़ाके ईरान सीमा तक पहुँचे, तो एक बार फिर इतिहास उनके सामने खड़ा था। उन्हें याद था कि 1975 में अल्जीयर्स समझौते के बाद अमेरिका और ईरान ने अचानक उनका समर्थन वापस ले लिया था और 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान भी उन्हें अधर में छोड़ दिया गया था।

यही कारण है कि इस बार कुर्दों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया। उन्हें अमेरिका और इजरायल से कोई स्पष्ट और दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी नहीं मिली थी। साथ ही, उन्हें इस बात का भी डर था कि अगर वे ईरान के खिलाफ खुलकर लड़ाई में उतरते हैं, तो इसका सीधा असर इराक में उनके स्वायत्त क्षेत्र पर पड़ सकता है, जिसे वे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते। ईरान की सैन्य तैयारियों और सीमा पार हमलों ने भी कुर्दों को पीछे हटने पर मजबूर किया।

रायटर्स की टीम जब उत्तरी इराक (KRG) पहुँची, तो उन्होंने पाया कि कुर्द लड़ाके डरे हुए थे। उन्हें डर था कि अगर वे ईरान में घुसे, तो ईरान की सेना इराक में मौजूद उनकी इकलौती स्वायत्त सरकार को भी तहस-नहस कर देगी। उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं था कि मुश्किल वक्त में वह उनके बचाव में आएगा। ऐतिहासिक धोखे ने उन्हें यह सिखा दिया है कि “हथियार तो दिए जा सकते हैं, लेकिन सुरक्षा की गारंटी नहीं।”

कुर्दों का इतिहास बताता है कि उन्होंने लगभग हर दशक में किसी न किसी देश में संघर्ष किया है, लेकिन हर बार उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों गाँव नष्ट हो गए और अनगिनत लोगों की जान गई। इसके बावजूद उन्हें आज तक न तो एक स्वतंत्र राष्ट्र मिला और न ही स्थायी सुरक्षा की गारंटी। तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान, चारों देशों में उनकी स्थिति अलग-अलग जरूर है, लेकिन एक चीज समान है: असुरक्षा और अविश्वास।

आज जब कुर्द लड़ाके ईरान की सीमा से लौटे हैं, तो यह सिर्फ एक सामरिक निर्णय नहीं, बल्कि इतिहास से सीखा गया सबक है। उन्होंने यह समझ लिया है कि बाहरी शक्तियों के भरोसे अपनी लड़ाई लड़ना हमेशा जोखिम भरा रहा है। इसलिए इस बार उन्होंने कदम पीछे खींचकर अपनी सीमित स्वायत्तता और अस्तित्व को बचाने को प्राथमिकता दी है। यही वजह है कि सदियों से लड़ने वाले ये योद्धा इस बार ठिठक गए, क्योंकि उन्हें लड़ाई से ज्यादा, अपने भविष्य की चिंता है।

कुर्दों के बारे में कुछ खास बातें

कुर्दों की कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं है, बल्कि एक समृद्ध संस्कृति और अटूट जिजीविषा की भी है।

धर्मनिरपेक्ष ढाँचा: कुर्द मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन उनका समाज काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष (Secular) है। उनके समाज में महिलाओं को जो सम्मान और अधिकार मिले हैं, वे मध्य पूर्व के अन्य देशों में दुर्लभ हैं।

महिला लड़ाके (YPJ): सीरिया में ISIS के खिलाफ लड़ाई में महिलाओं की एक पूरी सेना थी। उनका मानना था कि ISIS के आतंकी महिलाओं के हाथों मरने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे जन्नत नहीं जा पाएँगे।

नोरूज़ (Nowruz): यह कुर्दों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक त्यौहार है (नया साल), जो उनकी पहचान और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है।

पेशाबर्गा (Peshmerga): इसका शाब्दिक अर्थ है ‘वे जो मौत का सामना करते हैं’। यह इराकी कुर्दों की आधिकारिक सेना का नाम है।

भाषा का संघर्ष: तुर्की में दशकों तक ‘कुर्दिश’ भाषा बोलने और उसे लिखने पर प्रतिबंध था। कुर्दों को ‘पहाड़ी तुर्क’ कहकर उनकी पहचान मिटाने की कोशिश की गई।

पहाड़ों के अलावा कोई दोस्त नहीं

कुर्दों के बीच एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है- ‘No friends but the mountains’ (पहाड़ों के अलावा हमारा कोई दोस्त नहीं)। इतिहास गवाह है कि जब-जब कुर्दों ने किसी विदेशी ताकत (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस या फ्रांस) पर भरोसा किया, उन्हें अंत में पहाड़ों में ही छिपना पड़ा।

ईरान की सीमा पर कुर्दों का रुक जाना कोई कायरता नहीं, बल्कि एक कड़वे अतीत से सीखा गया ‘रणनीतिक सबक’ था। वे जानते हैं कि वे इस्तेमाल होने के लिए बहुत बड़े हैं, लेकिन अपना देश पाने के लिए बहुत अकेले। आज कुर्द दुनिया के सामने एक सवाल की तरह खड़े हैं कि क्या न्याय सिर्फ उन देशों के लिए है जिनके पास नक्शे पर अपनी सरहदें हैं?

कुर्दों के भविष्य को लेकर वैश्विक जिम्मेदारी जरूरी

कुर्दों का मुद्दा सिर्फ मध्य पूर्व का क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। यह मानवाधिकारों का एक बड़ा संकट है। अगर दुनिया के सबसे बड़े ‘स्टेटलेस’ (राज्यविहीन) समुदाय को इसी तरह फुटबॉल बनाया जाता रहा, तो यह क्षेत्र कभी शांत नहीं होगा।

इराक का मॉडल: क्या इराक की तरह ईरान, सीरिया और तुर्की में भी कुर्दों को स्वायत्तता मिलेगी? वर्तमान परिस्थितियों में इसकी संभावना कम दिखती है क्योंकि तुर्की इसे अपने अस्तित्व का सवाल मानता है।

भारत और कुर्द: भारत ने हमेशा कुर्दों के प्रति एक सहानुभूतिपूर्ण लेकिन सतर्क रवैया रखा है। भारत ‘संप्रभुता’ का सम्मान करता है, इसलिए वह खुलकर कुर्द देश का समर्थन नहीं करता, लेकिन इराकी कुर्दिस्तान के साथ भारत के व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं।

अमेरिका की विश्वसनीयता: कुर्दों के साथ बार-बार हुए धोखे ने मध्य पूर्व में अमेरिका की विश्वसनीयता पर एक बड़ा धब्बा लगा दिया है। अब कोई भी स्थानीय शक्ति अमेरिका पर आँख मूँदकर भरोसा करने से पहले सौ बार सोचेगी।

कुर्दों की दास्ताँ हमें सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘वादे’ का कोई स्थान नहीं होता, यहाँ सिर्फ ‘हित’ सर्वोपरि होते हैं। जब तक कुर्दों के पास अपनी कोई जमीन नहीं होगी, वे इतिहास के इन खूनी पन्नों में सिर्फ एक ‘मोहरे’ बनकर रह जाएँगे।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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