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अखिलेश राज के मुकाबले 7 गुना अधिक सरकारी नौकरी, भर्ती घोटालों का दाग मिटा लाए पारदर्शिता: जानिए कैसे योगी सरकार ने UP के युवाओं को दिया ‘अभ्युदय’

योगी सरकार में पेपर लीक और दूसरे घोटोलों को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है और ताबड़तोड़ एक्शन लिए गए। मुलायम सिंह सरकार और अखिलेश सरकार में ऐसा नहीं हुआ। दोनों ही मामलों में जब सरकार बदली तब एक्शन हुए।

2017 से पहले उत्तर प्रदेश में या तो सरकारी भर्तियाँ नहीं ही होती थीं और अगर होती भी तो प्रतियोगी परीक्षाएँ अक्सर नकारात्मक कारणों से सुर्खियों में रहती थीं जैसे- पेपर लीक, नकल माफिया, कोचिंग माफिया, भर्ती घोटाले और परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था। 2017 के बाद आई योगी सरकार ने परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया है, नकल माफियाओं पर कार्रवाई हुई है और सरकारी नौकरियों की संख्या भी खूब बढ़ी है।

योगी सरकार ने 2024 कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले में तुरंत एक्शन लेते हुए पूरी परीक्षा रद्द कर दी। STF जाँच शुरू हुई। सरकार ने सख्ती बरतते हुए ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ की। इस दौरान कई राज्यों तक फैला नेटवर्क सामने आया। इतना ही नहीं 48 लाख उम्मीदवारों को फिर से परीक्षा देने का मौका दिया ताकि किसी के साथ अन्याय न हो। दूसरे पेपर लीक के मामले में भी योगी सरकार का एक्शन सख्त रहा।

मुलायम सिंह सरकार और अखिलेश सरकार में ऐसा नहीं हुआ। दोनों ही मामलों में जब सरकार बदली तब एक्शन हुए। पुलिस भर्ती को लेकर 2007 का विवाद हो या 2017 का। दोनों में भर्ती प्रक्रिया में धाँधली के आरोप लगे। मेरिट लिस्ट में हेराफेरी से लेकर फर्जी प्रमाण पत्र रिकॉर्ड बदलने के प्रमाण मिले। यहाँ तक कि यूपी लोकसेवा आयोग पर भी गंभीर सवाल उठे। यहाँ तक कहा गया कि समाजवादी पार्टी के मुखिया का पूरा कुनबा घोटाले में शामिल है। पहले देखते हैं सपा के शासन काल में हुए कुछ पेपर लीक और प्रक्रिया में धाँधली में प्रमुख मामले कौन से रहे।

UPCPMT 2014 (Uttar Pradesh Combined Pre-Medical Test)– यह मामला काफी दिलचस्प था, क्योंकि शुरुआत में इसे ‘पेपर लीक‘ कहा गया और परीक्षा रद्द कर फिर से परीक्षा ली गई। इस दौरान केजीएमयू के एक शिक्षक समेत कई नाम सामने आए लेकिन जाँच में तस्वीर कुछ अलग निकली।

दरअसल 22 जून 2014 को परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले गाजियाबाद में दो बैंकों- SBI और इलाहाबाद बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम में रखे प्रश्नपत्र बॉक्सों की सील टूटी हुई या छेड़छाड़ की स्थिति में मिली। इसके बाद करीब 1.1 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा तत्काल रद्द कर दी गई। प्रशासन को लगा कि प्रश्नपत्र बाहर निकाले गए होंगे। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दिए। STF और प्रशासनिक जाँच भी शुरू हुई। दो एफआईआर दर्ज हुए।

सरकार और KGMU ने यह तर्क दिया कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में थोड़ी भी आशंका पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता खत्म कर सकती है। सुरक्षा प्रणाली में इतनी बड़ी सेंध लगी थी कि परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, इसलिए ‘संदेह का लाभ’ छात्रों को देने के बजाय परीक्षा रद्द कर दोबारा कराई जाए। फिर रिएग्जाम जुलाई 2014 में आयोजित हुई।

उत्तर प्रदेश ग्रामीण विकास अधिकारी (VDO) भर्ती 2013-14– यह मामला ‘कैश फॉर जॉब’ यानी नौकरी के बदले घूस विवाद के रूप में चर्चा में आया था। यह मामला लगभग 3002 ग्रामीण विकास अधिकारी पदों की भर्ती से जुड़ा था।

मार्च–मई 2014 में पोर्टल Cobrapost ने एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए दावा किया कि भर्ती प्रक्रिया में कुछ राजनीतिक बिचौलिए, विधायक और सत्ता से जुड़े लोग शामिल हैं, जो उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे माँग रहे हैं।

स्टिंग के अनुसार, उम्मीदवारों से ₹8 लाख से ₹13 लाख तक की माँग की जा रही थी। कई लोगों ने कथित तौर पर कुल रकम का आधा हिस्सा ‘टोकन मनी’ के रूप में माँगा गया। दावा किया गया कि चयनित उम्मीदवारों की सूची ‘ऊपर’ से जिलाधिकारियों को भेजी जाएगी।

Cobrapost ने अपने स्टिंग में कुछ तत्कालीन राज्य मंत्री स्तर के पदाधिकारियों, सत्तारूढ़ दल के विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों के नाम लिए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई लोगों ने अपने राजनीतिक संपर्कों के आधार पर भर्ती कराने का भरोसा दिया।

लेकिन जाँच में यह बात कभी सामने नहीं आया और न ही कोर्ट का कोई आदेश आया। यह सिर्फ राजनीतिक विवाद बन कर रह गया। कोई यह नहीं साबित कर पाया कि 3002 VDO पदों की भर्ती रिश्वत लेकर की गई थी।

UPPCS-2015 पेपर लीक और चेयरमैन का मामला

मार्च 2015 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से पहले व्हाट्सएप पर वायरल हो गया था। जाँच में पाया गया कि लीक हुआ पेपर और वास्तविक प्रश्नपत्र काफी हद तक मेल खाते थे। इसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और एसटीएफ जाँच शुरू की गई। कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं। इस दौरान जो भर्ती हुई उसे ‘यादव भर्ती’ भी कहा जाता है। आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। आयोग के खिलाफ व्यापक छात्र आंदोलन हुए।

अभ्यर्थियों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष जिलों और जातियों के उम्मीदवारों को अनुचित तरीके से लाभ पहुँचाया गया। चयन सूची में असामान्य पैटर्न होने के आरोप अदालतों तक पहुँचे।

दरअसल तत्कालीन अखिलेश सरकार ने 2013 में अनिल कुमार यादव को यूपीपीएससी का चेयरमैन बनाया था और उनके कार्यकाल में पीएससी, पीएससी जे, मेडिकल अधिकारी समेत कई एंट्रेस टेस्ट हुए, जिसमें घोटाले के आरोप लगे। उन पर यादवों को लाभ पहुँचाने के आरोप भी लगे। चयन प्रक्रिया में पैटर्न के बदलने को लेकर भी उम्मीदवारों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। UPPCS-2015 पर्चा लीक मामले में लोक सेवा आयोग को क्लीनचिट दिए जाने के अखिलेश सरकार के फैसले का जमकर विरोध हुआ था। कहा गया कि जब जाँच जारी है, तो फिर क्लीन चिट देने की इतनी जल्दबाजी क्यों है सरकार को?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में हुए अनिल कुमार यादव की यूपीपीएससी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को ‘अवैध’ और ‘मनमानी’ करार दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने उनकी नियुक्ति करते समय उनकी योग्यता, ईमानदारी और जरूरत की पर्याप्त जाँच नहीं की। इसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

यूपी जल निगम भर्ती घोटाला 2016-17– यूपी जल निगम भर्ती घोटाला मुख्य रूप से 2016-17 में हुई भर्तियों से जुड़ा था, जब राज्य में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार थी। बाद में 2017 में सरकार बदलने के बाद इसकी जाँच शुरू हुई। इस दौरान जल निगम में करीब 1300 नियुक्तियाँ की गई थीं, जिनमें 122 सहायक अभियंता, 853 जूनियर इंजीनियर और 325 क्लर्क शामिल हैं।

योगी सरकार ने जब जाँच शुरू की, तो SIT ने कई गंभीर अनियमितताओं की जानकारी दी। इसमें बताया गया कि भर्ती प्रक्रिया असामान्य तेजी से पूरी की गई। इसके विज्ञापन से लेकर नियुक्ति पत्र तक की प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी हुई।

सरकारी नियमों का पालन नहीं हुआ। उत्तर पुस्तिकाओं और मूल्यांकन पर सवाल उठे। कुछ चयनित अभ्यर्थियों के सही और गलत उत्तरों का पैटर्न एक जैसा पाया गया। कुछ मामलों में गलत उत्तरों पर भी अंक दिए गए थे। ऐसे विषयों में भर्ती की गई, जिनमें पद ही नहीं थे। SIT ने परीक्षा आयोजित करने वाली निजी कंपनी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।

सरकार ने पहले 122 सहायक अभियंताओं की नियुक्तियाँ रद्द की, बाद में करीब 1300 कर्मचारियों की नियुक्तियाँ निरस्त कर दी गई। इस मामले में आजम खान का नाम भी सामने आया, जो उस वक्त शहरी विकास मंत्री थे। उन पर FIR दर्ज किए गए।

हालाँकि, समाजवादी पार्टी ने तर्क दिया कि भर्ती प्रक्रिया विभागीय स्तर पर हुई थी और राजनीतिक नेतृत्व की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। वहीं जांच एजेंसियों और योगी सरकार ने भर्ती नियमों के व्यापक उल्लंघन की बात कही।

यूपी जल निगम भर्ती घोटाला उन मामलों में गिना जाता है, जिनमें जाँच के बाद सिर्फ आरोप नहीं लगे, बल्कि बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ भी रद्द की गईं। जाँच में भर्ती प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली, पदों की स्वीकृति और परीक्षा संचालन में गंभीर अनियमितताओं की बात सामने आई, जिसके बाद लगभग 1300 नियुक्तियाँ रद्द कर दी गईं और कई लोगों के खिलाफ जाँच और मुकदमे चले।

मुलायम सिंह यादव के राज में हुए घोटाले

मुलायम सिंह यादव के 2003–2007 कार्यकाल को लेकर सबसे बड़ा और सबसे अधिक चर्चित उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती घोटाला (2005–06) माना जाता है। उनके राज में ‘परिवहन भर्ती घोटाला’ भी सामने आया था। हालाँकि इसका उतना कागजात और प्रमाण नहीं मिलते जितना पुलिस भर्ती घोटाले को लेकर दिया गया।

पुलिस भर्ती घोटाला (2005–06)- 2007 में मायावती सरकार के सत्ता में आने के बाद पुलिस भर्ती की जाँच कराई गई। जाँच के बाद पाया गया कि 2004–06 के दौरान हुई भर्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुईं।

जाँच रिपोर्ट में कहा गया कि फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया गया। आंसर शीट में कथित तौर पर फेरबदल किया गया। चयन में बदलाव कर कुछ उम्मीदवारों को फायदा पहुँचाया गया। पुलिस वैरिफिकेशन प्रक्रिया में भी अनियमितता पाई गई। यहाँ तक कि अंकों और रिकॉर्ड में भी हेरफेर हुए।

इसको देखते हुए 2007 में मायावती सरकार ने पहले चरण में 6504 पुलिसकर्मियों की भर्ती रद्द की। 12 वरिष्ठ IPS अधिकारियों को निलंबित कर दिया। इसके अलावा जाँच के बाद हजारों भर्तियाँ भी निरस्त की गई। मायावती सरकार ने 3964 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की नियुक्तियाँ भी रद्द कर दी। कुल मिलाकर 10000 से अधिक भर्तियाँ मायावती के नेतृत्व वाली सरकार ने निरस्त की।

सरकारी जाँच समिति ने दावा किया कि 2004–06 के बीच 20000 से अधिक पुलिस भर्ती में गंभीर अनियमितताएं थीं। कुछ जगह उत्तर पुस्तिकाएं दोबारा लिखे जाने तक के आरोप लगे। हैंडराइटिंग विशेषज्ञों की रिपोर्ट का हवाला दिया गया।

उस समय BSP सरकार ने कहा था कि यदि जाँच में राजनीतिक दबाव या नेताओं की भूमिका साबित होती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी। हालाँकि इसे किसी नेता के खिलाफ अनियमितता को प्रमाणित नहीं किया जा सका।

2003–2007 के दौरान कुछ भर्ती परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को लेकर प्रश्नपत्र लीक होने और धाँधली के आरोप लगते रहे, लेकिन उस दौर में पुलिस भर्ती में कथित चयन अनियमितता का विवाद सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा।

परिवहन विभाग भर्ती विवाद– UPSRTC (रोडवेज) में भी समय-समय पर भर्ती और नियुक्तियों को लेकर आरोप लगे। विशेष रूप से ड्राइवर और कंडक्टर की भर्तियों में कथित अनियमितताओं, भाई-भतीजावाद और नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियों को लेकर काफी विवाद हुआ। लेकिन ये मामला पुलिस भर्ती घोटाले के सामने कुछ नहीं था, क्योंकि पुलिस भर्ती घोटाले में कार्रवाई भी सरकार बदलने पर की गई।

कोचिंग माफियाओं का तंत्र जिसे योगी सरकार ने ‘अभ्युदय’ से तोड़ा

समाजवादी पार्टी की सरकार में नकल और पेपर लीक कोई अलग-अलग समस्याएँ नहीं थीं बल्कि एक संगठित इकोसिस्टम था। इस इकोसिस्टम की शुरुआत स्कूलों से होती थी। बोर्ड परीक्षाओं में नकल कराई जाती थी, जिसके जरिए बड़ी संख्या में ऐसे छात्र अच्छे अंकों के साथ पास हो जाते थे और यही स्थिति विश्वविद्यालयों तक में जारी रहती।

विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इन्हीं छात्रों को कोचिंग माफिया अपने नेटवर्क में शामिल करते थे। दूसरी तरफ भर्ती आयोगों में बैठे भ्रष्ट अधिकारी इस नेटवर्क को संरक्षण देते थे। दोनों के बीच ऐसी साँठगाँठ बन गई थी जिसमें पेपर लीक होना आम बात बन गया था। रिपोर्ट्स सामने आईं कि कुछ कोचिंग सेंटर के छात्रों को पेपर में अनुचित लाभ मिलता है। इसका सीधा फायदा पैसा वालों को मिल जाता और गरीब छात्र मुँह ताकते रह जाते।

योगी सरकार ने यह संगठित नेटवर्क तोड़ दिया। अब छात्रों को फ्री कोचिंग के लिए सरकार ने अभ्युदय जैसी स्कीम लॉन्च की है। ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ की शुरुआत 16 फरवरी 2021 को बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से की गई थी। इसका मकसद ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों को मुफ्त कोचिंग देना है, जो आर्थिक कमजोरी या संसाधनों की कमी के कारण निजी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। इसमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं के साथ साक्षात्कार की तैयारी शामिल है। इसके अलावा JEE और NEET जैसी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाता है। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं से जुड़ी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधा भी इस योजना में उपलब्ध है।

सरकारी नौकरी देने में मीलों आगे योगी सरकार

आज अखिलेश यादव आए दिन सरकारी नौकरी को लेकर सवाल उठाते रहते हैं लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान सरकारी नौकरी मिलना युवाओं के लिए लगभग असंभव सा था। एक तो नौकरियाँ निकलती नहीं थी और जो निकलती भी थीं तो वे भ्रष्टाचार और माफियाओं की भेंट चढ़ जाती थीं। योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने विधानसभा में बताया था कि अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान 2012 से 2017 के बीच केवल 1.38 लाख नौकरी दी गईं।

वहीं, योगी सरकार ने इस परिपाटी को बदला है और मुख्यमंत्री खुद बता चुके हैं कि उनकी सरकार आने के बाद से 9 वर्षों में 9 लाख लोगों को सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं। यह अखिलेश के काल में दी गईं नौकरियों से 7 गुना अधिक है। योगी सरकार ने केवल प्रक्रिया नहीं बदली है बल्कि सरकारी भर्ती की इस पूरी मशीनरी को दुरुस्त किया है। इसके बाद यह मशीनरी और तेज गति से काम करने लगी है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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