ओमान के तट के पास अमेरिकी नौसेना के मिसाइल हमले का शिकार हुए ‘Settebello’ तेल टैंकर पर मौजूद तीन लापता भारतीय नाविकों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। केंद्रीय जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए शवों की पहचान होने की बात कही है। इस हादसे में जान गँवाने वाले हिमाचल प्रदेश के 23 वर्षीय डेक कैडेट आदित्य शर्मा के पिता ने सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक और परेशान करने वाली अपील जारी की है। उनके इस संदेश ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों की कार्यप्रणाली और युद्ध क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिता का दर्दनाक संदेश: ‘नरक जैसे माहौल में 20 घंटे काम करने का दबाव था’
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राजेश शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने विदेश मंत्रालय को टैग करते हुए अपने बेटे आदित्य शर्मा को ढूँढने की गुहार लगाई थी। उन्होंने शिपिंग कंपनी से मिले उस वॉट्सऐप मैसेज को भी साझा किया, जिसमें लिखा था, “खेद के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हमारे पास एक जहाज ‘MT Settebello’ पर अमेरिकी नौसेना ने मिसाइल से हमला किया है और क्रू के तीन सदस्य लापता है।”
@MEAIndia
— Rajesh Sharma (@bobbylakhanpal) June 10, 2026
Vessel Settebello
IMO 9162916
I am father of one of the three crew missing. Aditya Sharma is my son.
Please help to locate and find him.
Below shipping company message to me.
My son has reported exploitation by senior at ship and want to quit this ship in April.
We…
राजेश शर्मा ने आरोप लगाया कि उनका बेटा लंबे समय से जहाज पर अपने सीनियर अधिकारियों द्वारा किए जा रहे शोषण से परेशान था। आदित्य ने अप्रैल में ही इस नौकरी को छोड़ने की इच्छा जताई थी और एक आधिकारिक शिकायत भी दर्ज कराई थी। हालाँकि, वरिष्ठ क्रू मेंबर्स ने दबाव बनाकर उसे वह शिकायत वापस लेने पर मजबूर किया। इसके बाद जहाज पर उसके लिए नरक जैसा माहौल बना दिया गया और उसे रोजाना 20-20 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया गया। पीड़ित पिता का कहना है कि उनके पास इस पूरे शोषण और बातचीत के पुख्ता चैट रिकॉर्ड मौजूद है।
न भारत का झंडा, न भारत का जहाज: एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का सच
समुद्री रिकॉर्ड और जाँच से स्पष्ट होता है कि जिस ‘Settebello’ (या मारिवेक्स/मिरवेक्स) जहाज पर यह हमला हुआ, उसका भारत से कोई सीधा प्रशासनिक संबंध नहीं था। इस जहाज पर ‘पलाऊ’ देश का झंडा लगा हुआ था और इसकी पैरेंट कंपनी ‘अरिहंत शिपिंग इंक’ पनामा में रजिस्टर्ड थी। इस जहाज का इतिहास बताता है कि इसका नाम पहले ‘अरिहंत’ (Arihant) था, जिसे बाद में बदलकर ‘मारिवेक्स’ और फिर ‘सेटीबेलो’ किया गया। हालाँकि, जहाजों की अंतरराष्ट्रीय पहचान संख्या यानी इसका ‘IMO नंबर’ (9464156) हमेशा एक ही रहा। यह पूरी तरह से एक निजी अंतरराष्ट्रीय शिपिंग नेटवर्क का हिस्सा था, जिसमें भारतीय नाविक केवल रोजगार के लिए काम कर रहे थे।
जहाज बनाने वाली कंपनी पर पाबंदी क्यों लगी थी?
बात दिसंबर 2025 की है। अमेरिका के वित्त विभाग ने इस जहाज और इसे चलाने वाली कंपनी ‘अरिहंत शिपिंग’ पर पाबंदी (प्रतिबंध) लगा दी थी। यह कंपनी पनामा देश में रजिस्टर्ड थी। अमेरिका का आरोप था कि यह जहाज जुलाई 2025 से चोरी-छिपे ईरान का तेल और कोलतार यहाँ-वहाँ पहुँचा रहा था। यह काम अमेरिकी नियमों के बिल्कुल खिलाफ था। पाबंदी लगने के बाद भी कंपनी ने चालाकी की। उन्होंने जहाज का नाम तो बदल दिया, लेकिन उसे उसी खतरनाक इलाके में चलाना जारी रखा।
अमेरिकी सेना के मुताबिक, ईरान ने समुद्र का एक मुख्य रास्ता (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) रोकने की कोशिश की थी। इसके जवाब में अमेरिकी नौसेना ने ईरान के सभी बंदरगाहों की ‘नौसैनिक नाकेबंदी’ कर दी। नौसैनिक नाकेबंदी का सीधा मतलब यह है कि कोई शक्तिशाली देश अपनी सेना के दम पर किसी दूसरे देश के समुद्री रास्तों को चारों तरफ से घेर लेता है, ताकि वहाँ कोई भी व्यापारिक जहाज आ-जा न सके।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह जहाज उस समय खाली था। अमेरिकी सेना ने इसे रुकने और उनके निर्देशों को मानने के लिए कहा, लेकिन जहाज ने बात नहीं मानी। उसने नाकेबंदी को तोड़कर ईरानी बंदरगाह की तरफ बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद अमेरिकी सेना के एक F-18 लड़ाकू विमान ने इस जहाज के इंजन और स्टीयरिंग रूम को निशाना बनाते हुए मिसाइल दाग दी।
हमले का वो खौफनाक मंजर और नाविकों का आखिरी संदेश
मिसाइल लगते ही जहाज के इंजन रूम में भयंकर आग लग गई। जहाज में पानी भरने लगा और वह धीरे-धीरे समुद्र में डूबने लगा। यह हादसा ओमान के तट से सिर्फ 28 किलोमीटर दूर हुआ था। इस बड़े संकट के बीच, जहाज पर मौजूद भारतीय नाविकों ने अपनी जान बचाने के लिए ‘फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया’ (FSUI) को एक बहुत ही डरावना इमरजेंसी मैसेज (डिस्ट्रेस कॉल) भेजा।
जहाज के एक क्रू मेंबर ने डर से काँपते हुए संदेश में कहा, “सर, हम मोटर टैंकर ‘मारिवेक्स’ से बोल रहे हैं… हमारे जहाज पर आग लग गई है और यह डूब रहा है। अमेरिकी नौसेना ने हमारे इंजन रूम पर मिसाइल मारी है। जहाज के नीचे एक बड़ा छेद हो गया है। यहाँ मौजूद सभी 24 क्रू मेंबर्स भारतीय हैं। कृपया जल्दी मदद भेजिए, हमें तुरंत सहायता की जरूरत है।”
यह संदेश मिलते ही ओमान की रॉयल एयरफोर्स तुरंत एक्शन में आई। उन्होंने मसीरा द्वीप से अपना एक मिलिट्री हेलीकॉप्टर रवाना किया। ओमान के सैनिकों ने बेहद सूझबूझ दिखाई और समुद्र में डूबते जहाज से 21 भारतीय नाविकों को सुरक्षित हवा में लिफ्ट (एयरलिफ्ट) कर लिया। लेकिन अफसोस, इस भयानक हमले में हिमाचल के आदित्य शर्मा समेत 3 भारतीय नाविकों को नहीं बचाया जा सका।

भारत सरकार का सख्त कदम और कड़ा विरोध
इस हमले के बाद भारत सरकार ने बहुत सख्त रुख अपनाया है। दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राजदूत जेसन मीक्स को अपने दफ्तर बुलाया (तलब किया)। भारत ने इस हमले पर गहरी चिंता जताई और अमेरिका के सामने अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में साफ कहा कि समुद्र में व्यापार करने वाले आम जहाजों पर बार-बार होने वाले ये हमले बेहद चिंताजनक हैं।
यह इस इलाके में चल रही लड़ाई का बहुत बुरा नतीजा है। भारत ने माँग की है कि आम जहाजों और रास्तों को निशाना बनाना तुरंत बंद होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से सभी जहाजों को समुद्र में बिना किसी रोक-टोक के आने-जाने की आजादी मिलनी चाहिए। इसके साथ ही, भारत के जहाजरानी मंत्री ने अधिकारियों को बड़े आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि सुरक्षित बचे 21 भारतीय नाविकों को जल्द से जल्द देश वापस लाया जाए। साथ ही, जिन नाविकों की इस हादसे में मौत हुई है, उनके पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ उनके परिवारों तक पहुँचाया जाए ताकि उनका अंतिम संस्कार हो सके।
पश्चिम एशिया की लड़ाई और भारतीयों पर मंडराता खतरा
इस हादसे से एक बहुत ही दुखद बात सामने आई है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के देशों में जो लड़ाई चल रही है, उसमें बिना किसी गलती के हमारे बेकसूर भारतीय मजदूर और कामगार मारे जा रहे हैं। दुनिया भर में समुद्र के रास्ते जो व्यापार होता है, उसमें भारतीयों का बहुत बड़ा रोल है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है जो जहाजों के लिए नाविक (नाव चलाने वाले लोग) भेजता है। दुनिया के सभी व्यापारिक जहाजों पर काम करने वाले कुल लोगों में से लगभग 10% अकेले भारतीय हैं। यही वजह है कि जब भी किसी विदेशी जहाज पर हमला होता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान हमारे भारतीय भाइयों को ही उठाना पड़ता है।
यह खतरा सिर्फ समुद्र तक ही सीमित नहीं है। खाड़ी (मिडिल ईस्ट) देशों की धरती पर भी जो मिसाइल और ड्रोन हमले हो रहे हैं, उनकी वजह से वहाँ काम करने वाले भारतीय मजदूर और नौकरीपेशा लोग लगातार परेशान हो रहे हैं। आँकड़ों को देखें तो इस लड़ाई और अशांति की वजह से अब तक कुल 8 भारतीयों की मौत हो चुकी है। इसमें हाल ही में कुवैत में जान गँवाने वाले एक और भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब किसी शिपिंग कंपनी पर पहले से पाबंदी लगी हो और खतरा साफ दिख रहा हो, तो क्या अपने थोड़े से मुनाफे के लिए इन बेकसूर नौजवानों की जान दांव पर लगाना सही है?


