राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई किताब ‘मधुरिमा’ में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर में बदलाव किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। किताब के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में इस प्रतिमा की ऐसी तस्वीर प्रकाशित की गई थी, जिसमें उसके नग्न धड़ को ढक दिया गया था।
तस्वीर में प्रतिमा के कंधों से नीचे के हिस्से को छिपाकर ऐसा दिखाया गया था कि मानो उसे कपड़े पहनाए गए हों। इससे प्रतिमा की मूल शारीरिक विशेषताएँ नहीं दिखाई दे रही थीं। दुनिया भर में इतिहास और पुरातत्व की किताबों में यह प्रतिमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई जाती है, इसलिए इस बदलाव की काफी आलोचना हुई।

आलोचना और विरोध के बाद NCERT ने तुरंत फैसला लिया कि प्रतिमा की मूल तस्वीर को फिर से वापस लाया जाएगा। यह बदलाव वेबसाइट पर उपलब्ध डिजिटल संस्करण और अभी तक ना छपी किताबों में किया जाएगा। एक अधिकारी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि अगले साल से छपने वाली हार्ड कॉपी में भी सही तस्वीर ही दिखाई देगी।
शिक्षा मंत्रालय ने भी सोमवार (15 जून 2026) को NCERT से इस मामले में स्पष्टीकरण माँगा था। एक सूत्र ने कहा, “जब यही तस्वीर कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की किताब में पहले से मौजूद है, तो फिर कक्षा 9 की किताब में इसे बदलने का कोई मतलब नहीं बनता।” गौरतलब है कि पिछले लगभग 25 वर्षों से NCERT की किताबों में ‘डांसिंग गर्ल’ की मूल तस्वीर प्रकाशित होती रही है।
हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख प्रतीक
करीब 4,500 साल पुरानी यह कांस्य प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख नगर मोहनजोदड़ो से मिली थी। इसकी ऊँचाई लगभग 10.5 सेंटीमीटर (4.1 इंच) है। मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर था, जो अपनी सुनियोजित नगर व्यवस्था, विशाल इमारतों और दुनिया की शुरुआती शहरी स्वच्छता प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

माना जाता है कि यह प्रतिमा लगभग 2500 ईसा पूर्व की है। इसमें एक युवा लड़की को दिखाया गया है जिसने कई चूड़ियाँ, एक कंगन और तीन लटकनों वाला हार पहन रखा है। उसके बाल सजे हुए हैं और एक कंधे पर बंधे हुए दिखाई देते हैं। उसका एक हाथ कमर पर टिकी हुआ है, जबकि दूसरा नीचे की ओर है। उसकी मुद्रा आत्मविश्वास से भरी नजर आती है।
इस प्रतिमा की खोज 1926 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके ने वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में की थी। उन्होंने ही इसे ‘डांसिंग गर्ल’ नाम दिया था। मैके का मानना था कि यह प्रतिमा उन्हें उस दौर की नृत्यांगनाओं जैसी लगी जो औपनिवेशिक भारत में राजदरबारों में नृत्य प्रस्तुत करती थीं।
प्रतिमा का शरीर पतला है और उसके हाथ-पैर लंबे दिखाई देते हैं। उसका माथा ऊँचा, आँखें बड़ी, नाक चौड़ी और होंठ भरे हुए हैं। उसके दाहिने हाथ में चार चूड़ियाँ और बाएँ हाथ में लगभग 24-25 चूड़ियाँ दिखाई देती हैं। वह अपने दाहिने पैर पर हल्का झुककर खड़ी है और उसका सिर थोड़ा पीछे की ओर झुका हुआ है। उसका दाहिना हाथ कमर के पीछे मुट्ठी बनाकर रखा गया है जबकि बाएँ हाथ में ऐसा लगता है जैसे वह कोई पात्र पकड़े हुए हो।

ब्रिटिश पुरातत्वविद् मॉर्टिमर व्हीलर ने इस प्रतिमा के बारे में कहा था कि यह लगभग 15 साल की लड़की जैसी दिखती है, जो पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी हुई है। उनके अनुसार दुनिया में उसके जैसी दूसरी कोई प्रतिमा नहीं है।
कला और तकनीक का अद्भुत नमूना
यह प्रतिमा सिर्फ एक कलाकृति नहीं बल्कि उस समय की तकनीकी प्रगति का भी प्रमाण मानी जाती है। सिंधु घाटी सभ्यता में अधिकतर मूर्तियाँ मिट्टी (टेराकोटा) से बनाई जाती थीं। कांस्य की ऐसी मूर्तियाँ बहुत कम मिली हैं।
हड़प्पा सभ्यता से मिली महिलाओं की अधिकांश मिट्टी की मूर्तियों में कमर के नीचे कोई वस्त्र या बेल्ट दिखाई देती है लेकिन ‘डांसिंग गर्ल’ पूरी तरह नग्न दिखाई देती है। यही बात इसे अन्य मूर्तियों से अलग बनाती है।

यह प्रतिमा कांस्य (ब्रॉन्ज) से बनी है जो ताँबा और टिन को मिलाकर तैयार किया जाता है। इससे पता चलता है कि उस समय के कारीगर धातुओं को मिलाकर मजबूत मिश्रधातु बनाने की तकनीक जानते थे। कई पुरातात्विक खोजों से यह भी पता चला है कि वे ताँबे में आर्सेनिक मिलाकर उसे और मजबूत बनाते थे।
सिंधु घाटी सभ्यता में तांबे और कांस्य का इस्तेमाल औजार, हथियार, गहने, घरेलू सामान और धार्मिक वस्तुएँ बनाने में किया जाता था। ‘डांसिंग गर्ल’ को बनाने के लिए ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक’ का उपयोग किया गया था। यह आज भी इस्तेमाल की जाने वाली एक बेहद मुश्किल धातु ढलाई तकनीक है।
इस प्रक्रिया में पहले मोम से प्रतिमा का मॉडल बनाया जाता है। फिर उसे मिट्टी से ढक दिया जाता है और छोटे-छोटे छेद छोड़े जाते हैं। बाद में गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह बने खाली हिस्से में पिघला हुआ कांस्य डाला जाता है। धातु ठंडी होने के बाद मिट्टी हटाई जाती है और अंतिम रूप दिया जाता है।
भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय के अनुसार, “यह प्रतिमा दो महत्वपूर्ण बातों का प्रमाण है। पहली, सिंधु सभ्यता के लोग धातु मिश्रण और ढलाई जैसी उन्नत तकनीक जानते थे। दूसरी, उनके समाज में नृत्य और प्रदर्शन कला जैसी मनोरंजन की विकसित परंपराएँ मौजूद थीं।”
सभ्यता की विरासत को दिखाने वाली प्रतिमा
‘डांसिंग गर्ल’ को हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृतियों में गिना जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह उस दौर के लोगों की धातु विज्ञान, कला और शिल्प कौशल की उत्कृष्ट समझ को दर्शाती है।
प्रतिमा में दिखाई देने वाले गहने बताते हैं कि उस समय आभूषण निर्माण एक विकसित कला और उद्योग था। हड़प्पा सभ्यता के कई स्थलों से हजारों गहने, निर्माण उपकरण, अधूरे आभूषण और उनसे जुड़ा अन्य सामान मिला है। इससे पता चलता है कि गहना बनाना केवल घरेलू काम नहीं बल्कि एक बड़ा पेशा था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रतिमा मोहनजोदड़ो के एक घर के अंदर मिली थी। इससे माना जाता है कि इसे पूजा के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि यह किसी परिवार या व्यक्ति के उपयोग की वस्तु रही होगी। यह उस समय के लोगों की कलात्मक अभिव्यक्ति, सामाजिक पहचान और व्यक्तित्व को दर्शाती है।
दिलचस्प बात यह भी है कि कंधे से कलाई तक चूड़ियाँ पहनने की परंपरा आज भी उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में देखने को मिलती है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ सांस्कृतिक परंपराएँ हजारों वर्षों से चली आ रही हैं।
भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने ‘डांसिंग गर्ल’ और ‘प्रिस्ट किंग’ नामक दूसरी प्रसिद्ध हड़प्पा कलाकृति दोनों पर दावा जताया था। लेकिन भारत केवल एक कलाकृति देने के लिए तैयार था।
बताया जाता है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने ‘प्रिस्ट किंग’ को चुना। इतिहासकार आशीष कुमार के अनुसार, पाकिस्तान में धार्मिक समूहों की प्रतिक्रिया के डर से नग्न किशोरी की प्रतिमा को लेने से परहेज किया गया था। उनके मुताबिक उस समय भी प्रतिमा की नग्नता को कुछ लोग अपनी नैतिक मान्यताओं के खिलाफ मानते थे।
आज ‘डांसिंग गर्ल’ भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की उत्कृष्ट कला, फैशन, शिल्प कौशल और रचनात्मक प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)


