दिनचर्या के स्तर पर आए बदलाव, भोजन में परिवर्तन, शारीरिक गतिविधियों में बदलाव और जीवन में स्क्रीन टाइम का बढ़ता प्रभाव, ये कुछ ऐसे परिवर्तन हैं, जो पिछले एक दशक में बहुत तेजी से सामने आए हैं। इससे जहाँ मनुष्य को अनेक क्षेत्रों में लाभ हुआ है, वहीं जीवन में अनेक विकृतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।
एक तरफ तकनीकी प्रगति हुई है, आर्थिक अवसरों में वृद्धि हुई है, कौशल विकास, वैश्विक संपर्क, उद्यमिता और अनेक क्षेत्रों में विकास हुआ है। वहीं दूसरी ओर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, सामाजिक संबंधों में दूरी, कार्य और जीवन के संतुलन का बिगड़ना, कई बार पहचान का संकट, मोटापा (Obesity), एंग्जायटी (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। आज ये सब लगभग सामान्य बातें बनती जा रही हैं।
एक तरफ सब कुछ प्राप्त करने की दौड़ है, तो दूसरी तरफ उसी दौड़ में शामिल होने के दुष्परिणाम भी हैं। ऐसे युग में कुछ तो ऐसा चाहिए, जहाँ मनुष्य अपने मूल से जुड़ा रहे, अपनी जड़ों से स्वयं को जोड़े रखे। ऐसा संतुलन चाहिए, जिससे जीवन में ऊर्जा और समय का सुंदर समन्वय बना रहे।
ऐसी खोज में जब हम निकलते हैं, तो हमें इसका उत्तर अपनी ही परंपरा में मिलता है। वर्षों पहले हमारे ही हिंदू संतों, ऋषियों और मुनियों ने हमें योग का अमूल्य उपहार दिया। यही योग हर प्रश्न का उत्तर है और यही योग हर समस्या का समाधान है।
योग, जिसकी परंपरा वैदिक काल, सिंधु सभ्यता के प्रोटो-शिव (सिंधु सभ्यता की पशुपति मुहर), श्रीमद्भगवद्गीता, बौद्ध एवं जैन परंपराओं से होती हुई महर्षि पतंजलि तथा अनेक योग परंपराओं और पद्धतियों तक विकसित हुई, आज भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानव जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है।
जहाँ एक ओर स्वामी विवेकानन्द ने 19वीं शताब्दी में इस परंपरा का विश्व से परिचय कराया, वहीं 21वीं शताब्दी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखकर योग को विश्व के हर कोने तक पहुँचाने का प्रयास किया। आज 21 जून मात्र एक साधारण तिथि नहीं रह गई है, बल्कि वह दिन बन गया है जब सनातन धर्म रूपी वटवृक्ष से निकले अद्भुत फल योग को सम्पूर्ण विश्व हर्षोल्लास के साथ अपनाता और मनाता है।
इस वर्ष विश्व 12वाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाएगा। भारत ने इस वर्ष की थीम “Yoga for Healthy Ageing” रखी है। वैसे भी योग प्रत्येक आयु वर्ग के लिए समान रूप से लाभदायक है। इस वर्ष का मुख्य कार्यक्रम भी कोलकाता शहर में आयोजित होगा। लंबे समय तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का केंद्र रहे बंगाल की धरती से योग का यह शंखनाद भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में भारतीयता की इस महान परंपरा का संदेश देगा।
श्री रामकृष्ण परमहंस, माँ शारदा, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तथा अनेक योगियों, संतों, क्रांतिकारियों और महर्षियों की यह पावन भूमि इस ऐतिहासिक अवसर की साक्षी बनेगी।
स्वामी विवेकानन्द का वह उद्घोष, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता के बल पर सम्पूर्ण विश्व को जीत लो।”,आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी ने भी योग को एक नवीन आयाम से देखते हुए उसके मूल अर्थ ‘जोड़ने’ पर विशेष बल दिया है, जहाँ व्यक्ति को समाज से जोड़ने की बात कही जाती है। आज के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। एक ओर भागदौड़ भरी जीवनशैली, शहरीकरण, गाँवों और छोटे शहरों से महानगरों की ओर पलायन, संकरे फ्लैटों का जीवन और अनजान वातावरण, इन सबने व्यक्ति को भीड़ के बीच भी अकेला कर दिया है। लोग लाखों की संख्या में साथ रहते हैं, फिर भी अपनापन कहीं खो रहा है।
ऐसे वातावरण में व्यक्ति मानसिक शांति, आत्मीय संबंधों और अपनेपन की तलाश में जुटा है। ऐसे समय में व्यक्ति को समाज से जोड़ने का प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। योग के माध्यम से जहाँ आसन, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और विभिन्न क्रियाओं से शारीरिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं, वहीं उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति समाज से जुड़ता है। योग से जुड़ना केवल अपने शरीर या स्वास्थ्य से जुड़ना नहीं है, बल्कि अपने आप से, अपने परिवार से, अपने समाज से, अपने राष्ट्र से और अंततः सम्पूर्ण विश्व के कल्याण से जुड़ना है। यही वह संदेश है, जिसे भारत सदियों से सम्पूर्ण विश्व को देता आया है।


