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दिल्ली पुलिस ने कुछ गलत नहीं किया: जानिए कैसे पुलिसवालों के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए झूठ का जाल बुन रहे हैं अभिजीत दिपके

दिल्ली पुलिस अभिजीत दिपके के इस चक्रव्यूह और उनकी गहरी साजिश को अच्छी तरह समझती है। पुलिस जानती है कि दिपके और उनके साथी इसी ताक में बैठे हैं कि कब कोई पुलिसकर्मी उन पर हाथ उठाए या लाठी चलाए, और कब वे उस फुटेज को दुनिया भर में दिखाकर खुद को लोकतंत्र का सिपाही घोषित कर सकें।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र परीक्षाओं में गड़बड़ी के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब पूरी तरह राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अभिजीत दिपके और उनकी संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर शनिवार (20 जून 2026) को तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जबरन सड़क रोकने और दिल्ली पुलिस के खिलाफ दुष्प्रचार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। दिल्ली पुलिस ने नियम के मुताबिक शाम को अनुमति खत्म होने पर प्रदर्शनकारियों को शांति से हटने को कहा था, लेकिन दिपके और उनके साथियों ने वहां से हटने के बजाय सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने रात में उनकी बिजली काट दी और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दीं, जिसे बाद में बहाल कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट डालकर जनता को उकसाते हुए कहा, “पुलिस मुझे गिरफ्तार करने वाली है। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि अगर मुझे गिरफ्तार भी कर लिया जाए, तब भी देश भर में यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन रुकना नहीं चाहिए!” दिल्ली पुलिस ने साफ किया है कि उनकी तरफ से कोई बल प्रयोग या शारीरिक कार्रवाई नहीं की गई है, बल्कि केवल कानून का पालन करने की हिदायत दी गई थी।

जानकारों का मानना है कि यह दिल्ली पुलिस के खिलाफ एक सोची-समझी ‘डॉग व्हिसलिंग’ (भीड़ को उकसाने की नीति) है, ताकि पुलिस को बल प्रयोग के लिए मजबूर किया जा सके। इस फ्लॉप शो को हिट बनाने के लिए अब इसमें परीक्षाओं के मूल मुद्दे को भटकाकर ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे अजीबोगरीब वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए हैं।

यह रणनीति ठीक वैसी ही है जैसी अतीत में किसान आंदोलन के दौरान लाल किले की हिंसा और साल 2020 के दिल्ली दंगों से पहले अपनाई गई थी, जहाँ अफवाहें फैलाकर पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जंतर-मंतर पर टेंट गाड़ने और सड़कों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक करने की इस जिद के सामने दिल्ली पुलिस ने गजब के संयम और पेशेवर रवैये का परिचय दिया है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

दिल्ली पुलिस का बेमिसाल संयम Vs अभिजीत दिपके का खतरनाक विक्टिम कार्ड

दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक, पिछले कुछ दिनों से एक बेहद सोची-समझी स्क्रिप्ट को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। यह स्क्रिप्ट कोई नई नहीं है, बल्कि देश ने इसे पहले भी कई आंदोलनों के दौरान बार-बार देखा है। इस खेल का सीधा सा नियम है- पहले किसी मुद्दे के नाम पर प्रदर्शन की अनुमति माँगो, प्रशासन जब सहयोग करते हुए अनुमति दे दे तो चुपचाप प्रदर्शन करो, लेकिन जैसे ही अनुमति का निर्धारित समय समाप्त हो जाए, तो वहाँ से हटने के बजाय वहीं पर खूँटा गाड़कर बैठ जाओ। इसके बाद जब पुलिस कानून के दायरे में रहकर आपको वहाँ से हटने की हिदायत दे, तो तुरंत मोबाइल का कैमरा ऑन करो, चेहरे पर लाचारी का भाव लाओ और सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए अफवाहें फैलाना शुरू कर दो।

इस बार इस पूरी पटकथा के मुख्य सूत्रधार बने हैं सोशल मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे अभिजीत दिपके। इस पूरे ड्रामे के बीच जो सबसे बड़ा सच दबाने की कोशिश की जा रही है, वो यह है कि दिल्ली पुलिस ने पूरे मामले में रत्ती भर भी कुछ गलत नहीं किया है। पुलिस ने तो प्रदर्शनकारियों को पूरा सहयोग दिया, लेकिन दिपके और उनके साथी जानबूझकर कानून व्यवस्था को ऐसी स्थिति में धकेलना चाहते हैं जहाँ पुलिस को मजबूरन बल प्रयोग करना पड़े और इन्हें अपनी फ्लॉप हो चुकी राजनीति को चमकाने का एक नया बहाना मिल जाए।

नियमों को ठेंगा और जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट बनाने की सोची-समझी जिद

हमारा देश और इसकी व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं, बल्कि स्थापित कानूनों और नियमों से चलती है। दिल्ली का जंतर-मंतर भले ही देश में विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख केंद्र रहा हो, लेकिन वहाँ किसी भी आयोजन के लिए दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन से एक निश्चित समय सीमा तक की लिखित अनुमति लेनी अनिवार्य होती है।

अभिजीत दिपके की संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को भी इसी नियम के तहत जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की बकायदा अनुमति दी गई थी। उन्होंने दिनभर वहाँ अपना कार्यक्रम किया भी, लेकिन असली तमाशा तब शुरू हुआ जब अनुमति का समय समाप्त हो गया। जैसे ही शाम को तय वक्त खत्म हुआ, पुलिस ने एक बेहद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें शांतिपूर्वक वहाँ से जाने के लिए कहा।

यह एक ऐसा नियम है जो देश के हर आम और खास नागरिक पर समान रूप से लागू होता है। मगर दिपके ने कानून का सम्मान करने के बजाय वहाँ से हटने से साफ इनकार कर दिया और सोशल मीडिया को अपना नया हथियार बना लिया। उन्होंने इंटरनेट पर यह दुष्प्रचार शुरू कर दिया कि प्रशासन ने उनकी बिजली काट दी है और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दी हैं, जबकि हकीकत यह थी कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ समय की प्रशासनिक मुस्तैदी के बाद सभी आवश्यक नागरिक सुविधाएँ बहाल थीं।

सोचने वाली बात यह है कि जब आपके पास उस जगह पर रुकने की कोई कानूनी वैधता ही नहीं बची, तो आप वहाँ जबरन क्यों डटे हुए हैं? दिपके और उनके मुट्ठी भर साथी अब जंतर-मंतर की उस संवेदनशील सड़क पर क्रिकेट खेल रहे हैं। यह दृश्य अपने आप में हास्यास्पद और गंभीर दोनों है। क्या जंतर-मंतर जैसी संवेदनशील जगह प्रदर्शन के लिए है या उसे किसी पिकनिक स्पॉट या खेल के मैदान में तब्दील कर दिया जाना चाहिए?

असल में प्रदर्शनकारियों की तरफ से यह दलील देना कि “अगर हमें जंतर-मंतर से हटाना है तो प्रदर्शन के लिए कोई स्थायी जगह दो” ये कुछ और नहीं बल्कि वहाँ अवैध रूप से टेंट गाड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। यह ठीक उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है जो कभी अन्ना आंदोलन के शुरुआती दिनों में देखा गया था, जहाँ शुरुआत में प्रशासन प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज करता है, फिर वह जगह एक पिकनिक स्पॉट में बदलती है और देखते ही देखते वहाँ पक्के तंबू तन जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा के सेलिब्रिटी, विपक्ष के तमाम बड़े नेता और खास एजेंडे वाले चेहरे वहाँ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने पहुँचने लगते हैं ताकि किसी न किसी बहाने यह पूरा तमाशा राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना रहे।

झूठी गिरफ्तारी का खौफ पैदा कर दिल्ली पुलिस के खिलाफ डॉग व्हिसलिंग का खेल

अभिजीत दिपके ने हद तो तब कर दी जब उन्होंने सोशल मीडिया पर बाकायदा एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि पुलिस उन्हें किसी भी वक्त गिरफ्तार करने वाली है। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील कर डाली कि अगर वे गिरफ्तार भी हो जाएँ, तो देशव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन थमना नहीं चाहिए।

अब इस पूरे बयान के पीछे छिपी क्रूर सच्चाई को समझिए। दिल्ली पुलिस ने दिपके या उनके साथियों पर न तो कोई लाठी चलाई, न ही उन्हें शारीरिक रूप से वहाँ से घसीटकर हटाया। पुलिस के जवान बेहद शालीनता से कानून का पालन करने की अपील कर रहे थे, लेकिन दिपके इस बात को बखूबी जानते हैं कि जब तक वे खुद को एक ‘बेचारे’ और ‘सताए हुए’ एक्टिविस्ट के रूप में पेश नहीं करेंगे, तब तक उन्हें सोशल मीडिया पर लाइक्स, शेयर्स और री-ट्वीट्स की वो अटेंशन नहीं मिलेगी जिसके वो भूखे हैं।

यह पूरी कवायद सीधे तौर पर दिल्ली पुलिस के खिलाफ ‘डॉग व्हिसलिंग’ यानी इशारों-इशारों में अपनी हिंसक भीड़ को उकसाने की एक बेहद खतरनाक कोशिश है। जब आप अपने मंच से यह झूठ फैलाते हैं कि पुलिस आपके खिलाफ दमनकारी नीति अपना रही है और आपको जेल में डालने वाली है, तो आप अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर अपने समर्थकों के दिलों में कानून के रखवालों के प्रति नफरत और गुस्से का जहर घोल रहे होते हैं। आप उस भीड़ को इस बात के लिए तैयार कर रहे होते हैं कि वे पुलिसकर्मियों को अपना दुश्मन समझें और उन पर हमला कर दें। इतिहास गवाह है कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी और अफवाहों का अंत हमेशा बेहद हिंसक और दुखद रहा है।

अतीत के खूनी सबक और उकसावे की राजनीति का भुक्तभोगी इतिहास

जब हम दिपके की इस उकसावे वाली रणनीति को देखते हैं, तो हमें अतीत की उन दो बड़ी और भयावह घटनाओं को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने दिल्ली को हिलाकर रख दिया था। सबसे पहला उदाहरण है किसान आंदोलन के नाम पर हुई लाल किले की हिंसा। उस आंदोलन के दौरान भी प्रदर्शनकारियों ने महीनों तक दिल्ली की सीमाओं को बंधक बनाए रखा, सड़कों पर तंबू गाड़े और अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली। दिल्ली पुलिस ने महीनों तक असीम धैर्य का परिचय दिया, लेकिन आंदोलन के तथाकथित नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने लगातार यह झूठ फैलाया कि सरकार और पुलिस किसानों को कुचलना चाहती है।

इस उकसावे का अंतिम परिणाम देश ने 26 जनवरी के पावन दिन देखा, जब दिल्ली की सड़कों पर सरेआम तलवारें लहराई गईं, बैरिकेड्स तोड़े गए और लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर देश के तिरंगे का अपमान करते हुए एक धार्मिक ध्वज फहरा दिया गया। उस दिन सैकड़ों पुलिसकर्मियों को ट्रैक्टरों से कुचलने का प्रयास किया गया, उन्हें ऊँचाइयों से नीचे खाई में धकेल दिया गया, लेकिन पुलिस ने तब भी संयम नहीं खोया।

ठीक ऐसा ही खूनी खेल साल 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भी खेला गया था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में शाहीन बाग जैसी जगहों पर सड़कें रोकी गईं और इंटरनेट पर यह अफवाहें फैलाई गईं कि पुलिस एक खास समुदाय को निशाना बना रही है। मंचों से भड़काऊ और जहरीले भाषण दिए गए जिसका नतीजा उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण हिंदू विरोधी दंगों के रूप में सामने आया।

उस हिंसा में पेट्रोल बमों और अवैध हथियारों से पूरी दिल्ली को दहला दिया गया, जिसमें दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के शरीर पर चाकुओं के अनगिनत घाव कर उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया।

यह दोनों ऐतिहासिक उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि जब-जब दिपके जैसे लोग पुलिस के खिलाफ अफवाहें फैलाकर जनता को उकसाते हैं, तब-तब उसका खामियाजा सड़क पर खड़े आम पुलिस के जवानों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।

फ्लॉप शो को हिट बनाने का आखिरी पैंतरा और भटकता हुआ एजेंडा

दरअसल, अभिजीत दिपके और उनके सहयोगियों की असली हताशा और बौखलाहट इस बात से पैदा हो रही है कि उनका यह पूरा आंदोलन जनता के बीच बुरी तरह ‘फ्लॉप’ साबित हुआ है। इस आंदोलन की शुरुआत में रणनीतिकारों को यह पूरी उम्मीद थी कि दिल्ली पुलिस पहले ही दिन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर देगी, जिससे उन्हें तुरंत हंगामा करने, खुद को पीड़ित दिखाने और मीडिया की सुर्खियाँ बटोरने का मौका मिल जाएगा।

लेकिन दिल्ली पुलिस ने बेहद समझदारी दिखाते हुए उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्हें नियमपूर्वक प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी, जिसके कारण उनका पहला प्रदर्शन पूरी तरह बेअसर रहा। इसके बाद उन्होंने लखनऊ, पुणे, नागपुर और जयपुर जैसे अन्य बड़े शहरों में भी इस तरह के प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश की, लेकिन देश के जागरूक युवाओं और आम जनता ने इस नौटंकी को पूरी तरह खारिज कर दिया।

जब दिपके ने देखा कि छात्र आंदोलन और परीक्षाओं की पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुआ यह तमाशा पूरी तरह बिखर रहा है, तो उन्होंने इस आंदोलन के मूल मुद्दे को ही बदल दिया। जो प्रदर्शन देश के छात्रों की परीक्षाओं और उनके भविष्य को लेकर शुरू हुआ था, उसमें अचानक ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’, ‘मेरा जेंडर, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे बेहद अजीबोगरीब और भटकाने वाले वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए।

जब देश के आम छात्रों ने देखा कि उनके नाम पर कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत और वैचारिक राजनीति चमका रहे हैं, तो उन्होंने इस आंदोलन से पूरी तरह दूरी बना ली। अब जब इस आंदोलन के पास न तो भीड़ बची है और न ही जनता का समर्थन, तो इनके पास सिर्फ एक ही आखिरी पैंतरा बचा है कि जैसे भी हो, पुलिस को उकसाकर बल प्रयोग करने पर मजबूर किया जाए ताकि गिरती हुई राजनीतिक साख को दोबारा जिंदा किया जा सके।

क्या दिल्ली पुलिस इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदने के लिए तैयार है?

यह पूरा मामला अब किसी कानून व्यवस्था की समस्या से ज्यादा एक विशुद्ध राजनीतिक मसला बन चुका है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी व्यक्ति या समूह विरोध प्रदर्शन के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों या सरकारी जगहों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक नहीं कर सकता।

कानून के मुताबिक, यदि कोई प्रदर्शनकारी समय सीमा खत्म होने के बाद भी स्वेच्छा से उस जगह को खाली नहीं करता है, तो प्रशासन के पास कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हल्का बल प्रयोग करने का पूरा अधिकार है।

लेकिन दिल्ली पुलिस अभिजीत दिपके के इस चक्रव्यूह और उनकी गहरी साजिश को अच्छी तरह समझती है। पुलिस जानती है कि दिपके और उनके साथी इसी ताक में बैठे हैं कि कब कोई पुलिसकर्मी उन पर हाथ उठाए या लाठी चलाए, और कब वे उस फुटेज को दुनिया भर में दिखाकर खुद को लोकतंत्र का सिपाही घोषित कर सकें।

यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने गजब के धैर्य, पेशेवर रवैये और प्रशासनिक सहयोग का परिचय दिया है। पुलिस ने बिना किसी बल प्रयोग के केवल संवाद और कानून के दायरे में रहकर स्थिति को संभाला है। अब देश के युवाओं और जागरूक नागरिकों को यह तय करना होगा कि क्या वे सोशल मीडिया पर बैठकर देश में अराजकता फैलाने वाले ऐसे फ्लॉप नेताओं के भड़काऊ वीडियो के बहकावे में आएँगे या फिर धरातल पर मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही दिल्ली पुलिस के इस बेमिसाल संयम और सच का साथ देंगे।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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