मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता या उसका विदेशी नाम उसकी हिंदू आस्था का निर्धारण नहीं कर सकता। मामले में टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म उदार है और इसे अपनाने के लिए किसी औपचारिक समारोह या धर्मांतरण प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने तंजावुर के श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर से जुड़े मामले में यह व्यवस्था दी।
यह मामला एक अमेरिकी नागरिक महिला, लौरा फ्रांसिस अयंगर (Laura Frances Iyengar) से जुड़ा है, जिन्हें तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से सिर्फ इसलिए रोक दिया गया था क्योंकि प्रशासन ने उनके विदेशी नाम और अमेरिकी नागरिकता के आधार पर उन्हें ईसाई मान लिया था।
कोर्ट ने अपने आदेश में न केवल महिला के अधिकारों को बहाल किया, बल्कि हिंदू धर्म की व्यापकता, उदारता और इसकी ऐतिहासिक प्रकृति पर भी गहरी टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि लौरा ने पूरी निष्ठा और आचरण के साथ हिंदू धर्म को अपनाया है और उन्हें किसी अन्य हिंदू महिला भक्त की तरह ही मंदिर में पूजा-अर्चना करने का पूरा अधिकार है।
जानिए क्या है पूरा मामला और HC ने तमिलनाडु सरकार को क्यों लगाई फटकार
यह पूरा विवाद तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर से शुरू हुआ। अमेरिकी नागरिक लौरा फ्रांसिस ने हिंदू धर्म के प्रति अपनी गहरी आस्था के कारण कई वर्ष पहले ही इस धर्म को अपना लिया था। सितंबर 2023 में उन्होंने इसी मंदिर में एक हिंदू व्यक्ति, वरधा बालाजी वेंकटकृष्णन से पूरे रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया था।
विवाह के बाद भी वह लगातार वैष्णव संप्रदाय की धार्मिक प्रथाओं का पालन कर रही थीं और एक समर्पित हिंदू की तरह जीवन जी रही थीं। विवाद तब पैदा हुआ जब वर्ष 2024 में लौरा फ्रांसिस ने एक बार फिर इस मंदिर का दौरा किया। वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं ने उनके विदेशी रंग-रूप और नाम को देखकर आपत्ति जताई।
उनका मानना था कि वह हिंदू नहीं हैं और एक गैर-हिंदू को मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। इस विरोध के बाद लौरा के पति वरधा बालाजी ने ‘तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती’ (HR&CE) विभाग के अधिकारियों को एक पत्र लिखा।
उन्होंने विभाग से अनुरोध किया कि उनकी पत्नी को एक हिंदू भक्त के रूप में मंदिर में बिना किसी रोक-टोक और भय के स्वतंत्र रूप से पूजा करने की अनुमति दी जाए। इसके जवाब में HR&CE विभाग ने 10 अगस्त 2024 को एक आधिकारिक आदेश जारी किया। विभाग ने अपने आदेश में लौरा फ्रांसिस को एक ‘अमेरिकी ईसाई महिला’ के रूप में पेश कर दिया।
विभाग का तर्क था कि अन्य भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुँचे, इसलिए लौरा को केवल मंदिर के बाहरी परिसर तक ही जाने की अनुमति दी जा सकती है, उन्हें मुख्य गर्भगृह या आंतरिक हिस्सों में जाने की अनुमति नहीं होगी। इसके बाद लौरा ने मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ का दरवाजा खटखटाया और विभाग को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की।
विदेशी नाम होने से कोई ईसाई नहीं हो जाता: HC ने हिंदू धर्म को बताया सबसे उदार
इस मामले की सुनवाई मद्रास हाई कोर्ट के जज जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती की पीठ ने की। कोर्ट ने HR&CE विभाग के रुख को पूरी तरह से खारिज कर दिया और प्रशासन की कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि चूँकि याचिकाकर्ता एक अमेरिकी नागरिक थीं, इसलिए अधिकारियों ने स्वतः ही यह मान लिया कि वह ईसाई होंगी।
जज ने इस तर्क को पूरी तरह से अतार्किक और तथ्यहीन बताते हुए कहा कि अधिकारियों का यह निष्कर्ष किसी भी पुख्ता सामग्री या सबूत पर आधारित नहीं था और केवल अमेरिकी होने से कोई ईसाई नहीं हो जाता और न ही विदेशी नाम होने से किसी की हिंदू आस्था कम हो जाती है। हिंदू धर्म को रेखांकित करते हुए जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समावेशी और उदार रहा है। अन्य मजहब और पंथों के विपरीत, हिंदू धर्म में किसी को अपने भीतर शामिल करने के लिए किसी अनिवार्य औपचारिक धर्मांतरण समारोह या किसी आधिकारिक धर्मांतरण प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इसे अपनाने के लिए ऐसी कोई पूर्व-शर्त लागू नहीं होती। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ‘पेरुमल नाडार बनाम पोन्नुस्वामी’ मामले का जिक्र किया। कोर्ट ने उस मामले में स्पष्ट किया था कि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से और पूरी तरह से हिंदू बन सकता है, बशर्ते उसके भीतर इस धर्म को अपनाने का सच्चा इरादा हो।
कोर्ट ने कहा था कि व्यक्ति का आचरण भी समाज में ऐसा होना चाहिए जो उसकी इस धार्मिक निष्ठा को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता हो। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि हिंदू धर्म में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार के औपचारिक शुद्धिकरण या प्रायश्चित समारोह की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि महिला का नाम ‘लौरा फ्रांसिस’ है, उन्हें एक हिंदू के रूप में मान्यता देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने HR&CE विभाग के 10 अगस्त 2024 के आदेश को उस सीमा तक अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया जहाँ उन्हें ‘अमेरिकी ईसाई महिला’ कहा गया था।
कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि उनके पति के दादा पहले उक्त मंदिर के न्यासी के रूप में कार्य कर चुके थे, जिससे हिंदू धर्म में उनका सामाजिक और धार्मिक एकीकरण सिद्ध होता है।
अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि लौरा फ्रांसिस को पूरी तरह से एक हिंदू भक्त माना जाए और उन्हें वे सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे जो किसी भी अन्य हिंदू महिला भक्त को मिलते हैं। मंदिर के रीति-रिवाजों, आगमों, परंपराओं और नियमों के दायरे में रहते हुए, उन्हें किसी भी हिस्से में जाने से नहीं रोका जा सकता।
महिला ने प्रस्तुत किए थे अपने हिंदू होने के प्रमाण
कोर्ट में मामले की पैरवी के दौरान लौरा फ्रांसिस अयंगर ने ऐसे कई ठोस सबूत पेश किए, जिससे यह साबित हुआ कि उनका हिंदू धर्म की ओर झुकाव कोई क्षणिक विचार नहीं था, बल्कि वह वर्षों से इस धर्म को जी रही थीं। लौरा ने कोर्ट को विस्तार से बताया कि उन्होंने किसी दबाव में नहीं, बल्कि स्वेच्छा से कई साल पहले हिंदू धर्म को आत्मसात किया था।
वह लंबे समय से लगातार हिंदू देवी-देवताओं की पूजा कर रही हैं और उनकी जीवनशैली सनातन धर्म के पूर्णतः अनुरूप है। सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में उन्होंने अपने सरकारी दस्तावेजों को पेश किया, जिसके तहत भारत आने के लिए दिए गए अपने वीजा आवेदनों में भी उन्होंने विवाह से पहले ही स्वयं को ‘हिंदू’ के रूप में घोषित किया था।
इसके साथ ही उन्होंने अपनी शादी से पहले और बाद में भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित कई प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों की यात्राएँ की थीं और हिंदू रीति-रिवाजों से तीर्थयात्राएँ संपन्न की थीं। एक हिंदू व्यक्ति से शादी करने के बाद, वह लगातार वैष्णव संप्रदाय के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों और त्योहारों का श्रद्धापूर्वक पालन कर रही थी।
महिला का विवाह सितंबर 2023 में इसी श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इन तमाम साक्ष्यों के आधार पर ही कोर्ट ने माना कि उनका आचरण और उनकी आस्था उनके हिंदू होने का प्रमाण हैं, जिसे महज एक विदेशी पासपोर्ट या नाम के आधार पर झुठलाया नहीं जा सकता।
श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर का इतिहास
तमिलनाडु के तंजावुर जिले के पसुपति कोइल में स्थित श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर लगभग 900 वर्ष पुराना है। यह मंदिर भगवान वरदराज पेरुमाल (भगवान विष्णु) को समर्पित है। इस मंदिर का इतिहास श्री रामानुजाचार्य, उनके गुरु पेरिया नंबी और उनके एक शिष्य से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना से संबंधित है।
मान्यता है कि चोल राजा कुलोत्तुंग ने अपने राज्य के लोगों को यह लिखकर देने का आदेश दिया कि भगवान शिव सबसे श्रेष्ठ हैं। जब श्री रामानुजाचार्य को दरबार में बुलाया गया, तब उनके एक शिष्य अपने गुरु का वेश धारण करके स्वयं दरबार में पहुँचे। उनके साथ श्री रामानुजाचार्य के गुरु पेरिया नंबी भी थे।
राजा ने दोनों से अपने आदेश पर हस्ताक्षर करने को कहा, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। राजा इस बात से बहुत क्रोधित हो गया और उसने उनकी आँखें निकालने का आदेश दे दिया। शिष्य ने किसी और से अपनी आँखें निकलवाने के बजाय स्वयं अपने नाखूनों से अपनी आँखें निकाल लीं।
वहीं सैनिकों ने 105 वर्षीय पेरिया नंबी की आँखें फोड़ दीं। इसके बाद पेरिया नंबी बड़ी कठिनाई से पसुपति कोइल पहुँचे। यहीं भगवान वरदराज पेरुमाल ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। मान्यता है कि इस घटना के बाद श्री रामानुजाचार्य ने इस स्थान पर भगवान वरदराज पेरुमाल के मंदिर का निर्माण कराया।
तभी से यह मंदिर भगवान के दिव्य दर्शन और पेरिया नंबी को प्राप्त मोक्ष के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।


