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70 मिनट में एक के बाद एक फटे 21 IED, 57 की मौत और सैकड़ों घायल: पढ़ें- अहमदाबाद ब्लास्ट की कहानी, केरल के जंगलों में ट्रेनिंग कर आए थे SIMI और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी

अहमदाबाद बम ब्लास्ट केस में गुजरात हाईकोर्ट नेन 38 दोषियों को फाँसी और 11 को उम्रकैद की सजा बरकरार रखा है। 2008 में हुए सिलसिलेवार धमाके की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी। जाँच में घटना के तार कई राज्यों से जुड़े मिले।

अहमदाबाद ब्लास्ट केस में 18 साल बाद गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 49 दोषियों में से 11 को उम्रकैद और 38 को फाँसी की सजा दी है। इस मामले में 28 लोगों को पहले ही बरी कर दिया गया था, जबकि एक आरोपित सरकारी गवाह बन गया था।

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक के बाद एक 21 बम धमाके हुए थे, जिसमें 56 लोगों की जान चली गई थी और 240 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। इसके तहत मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए और घायलों को 1 लाख रुपए देने को कहा है।

70 मिनट में 21 जगहों पर बम धमाके

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में शाम करीब 6:45 बजे से 8:00 बजे के बीच करीब 70 मिनट के अंतराल में 21 अलग-अलग जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन आतंकवादी हमलों में 56 लोग मारे गए और 240 से अधिक लोग घायल हो गए। पूरा शहर दहल चुका था। अस्पतालों में भारी अफरा-तफरी मच गई थी। घायलों को अस्पताल लाया गया था।

धमाकों को अंजाम देने से ठीक पहले, इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने कई मीडिया घरानों को ईमेल भेजा था और हमलों की चेतावनी दी थी। उस वक्त इंडियन मुजाहिदीन का नाम आतंकी लिस्ट में नहीं था। उसे 2010 की पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट की जिम्मेदारी लेने के बाद प्रतिबंधित किया गया था। उस हमले में 17 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कुछ धमाके उन अस्पतालों के बाहर हुए जहाँ पहले विस्फोटों के घायलों को इलाज के लिए लाया जा रहा था। इससे अधिक से अधिक जान-माल का नुकसान करने की कोशिश की गई थी। यह हमले शहर के बेहद भीड़-भाड़ वाले और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाकर किए गए थे। इनमें सिविल अस्पताल और एल.जी. अस्पताल मणिनगर, बापूनगर, और नरोडा इलाके के सार्वजनिक बसों, साइकिलों और बाजारों में ब्लास्ट कैसे किए गए।

साइकिल में टिफिन बम में हुआ ब्लास्ट

आतंकवादियों ने साइकिलों पर टिफिन में आईईडी छिपा कर ज्यादातर जगहों पर रखा था और उन्हें टाइमर के जरिए विस्फोट किया। कई जगहों पर दूसरे वाहनों का भी इस्तेमाल किया गया। 21 जगहों को इस तरह चुना गया, जहाँ काफी भीड़ भाड़ होती थी। धमाकों के दो दिन बाद गुजरात पुलिस और आतंकवाद निरोधी दस्ते ने सूरत के अलग-अलग इलाकों से 29 जिंदा बम बरामद किए थे, जो सही सर्किट या डेटोनेटर नहीं जुड़ने के कारण फटे नहीं थे। इन्हें सुरक्षा एजेंसियों ने इनएक्टिव किया।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, आतंकियों ने ईमेल में लिखा था कि यह 2002 के गोधरा के बाद गुजरात हिंसा का बदला लेने के लिए किया गया है।

तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में शांति की अपील की और घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी।

78 पर चला केस, 49 को मिली सजा

इस मामले में एक आरोपित अयाज सैयद सरकारी गवाह बन गया था। केस के दौरान ट्रायल कोर्ट में करीब 1163 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए। कोर्ट में रोजाना 491 दिनों तक हर दिन केस पर सुनवाई हुई और 100 से ज्यादा वकील इसमें शामिल हुए। इस मामले को देश के सबसे बड़े धमाकों में गिना जाता है। अदालत ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस माना।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने स्पेशल जज एआर पटेल ने अपने फैसले में 28 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। जबकि मृतकों के परिजनों को 1-1 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

जाँच के दौरान कई ऐसी घटनाएँ भी घटी, जिसकी चर्चा हुई। 2013 में जेल में बंद कुछ आरोपितों ने सुरंग बनाकर फरार होने की साजिश रची थी, लेकिन सुरक्षाबलों ने नाकाम कर दिया।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने मामले में 49 लोगों को दोषी ठहराया था। गुजरात हाईकोर्ट ने इन सभी 38 दोषियों की फाँसी की सजा और 11 अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा दी थी, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 1 लाख से 5 लाख रुपये तक का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।

सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन ने रची थी साजिश

2008 के अहमदाबाद बम धमाकों की साजिश बहुत गहरी थी, जिसका ताना-बाना देश के अलग-अलग राज्यों में बुना गया था। पुलिस जाँच और अदालती कार्यवाही में इसके मास्टरमाइंड और आतंकियों की ट्रेनिंग से जुड़ी अहम जानकारी सामने आई थी।

प्रतिबंधित संगठन सिमी (SIMI) और इंडियन मुजाहिदीन (IM) के शीर्ष नेताओं की तिकड़ी ने मिलकर इसकी पूरी साजिश रची थी। मुफ्ती अबू बशर को पूरे ब्लास्ट का मुख्य मास्टरमाइंड और वैचारिक मार्गदर्शक माना गया। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले इस मौलवी ने युवाओं को भड़काने और हमले के लिए उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने का काम किया था। सिमी के पूरे धमाकों की योजना को अंतिम रूप दिया।

हैदराबाद ब्लास्ट मामले में दोषी पाया गया यासीन भटकल इस मामले मं भी शामिल था। भटकल बंधु यानी रियाज और यासीन इंडियन मुजाहिदीन के खूंखार आतंकियों में शुमार थे, जो बमों को बनाने, विस्फोटक जुटाने और उन्हें सही समय पर प्लांट करने का तकनीकी काम संभाल रहे थे। सुरक्षा एजेंसियों की जाँच के मुताबिक, धमाकों को अंजाम देने से पहले आतंकियों के लिए घने जंगलों में गुप्त ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए गए थे।

केरल के वागामोन जंगल में दिसंबर 2007 में सिमी का एक बेहद गुप्त और बड़ा ट्रेनिंग कैंप आयोजित हुआ था। सफदर नागौरी की देखरेख में आयोजित इस कैंप में देश के करीब आधा दर्जन राज्यों (जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि) से आए 50 से अधिक कट्टरपंथी युवाओं ने हिस्सा लिया था।

इस कैंप में आतंकियों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के अलावा हथियार चलाने, कमांडो कॉम्बैट, रस्सी पर चढ़ने और आईईडी और टाइमर बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद गुजरात के स्थानीय युवकों जैसे- अयाज सैयद का इस्तेमाल अहमदाबाद में साइकिलों और बसों में बम रखने के लिए किया गया। फिर एक के बाद एक 21 जगहों पर 70 मिनट में धमाके किए गए।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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