Homeरिपोर्टमीडियाInsta से चाइल्ड पोर्न हटाने के आदेश को 'ब्लूमबर्ग' बता रहा META के लिए...

Insta से चाइल्ड पोर्न हटाने के आदेश को ‘ब्लूमबर्ग’ बता रहा META के लिए ‘सिरदर्द’, पड़ी गालियाँ: जानिए कैसे विदेशी मीडिया के लिए बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा भारत का विरोध है जरूरी

बच्चों का शोषण और उनसे जुड़ी अश्लील सामग्री कोई छोटा-मोटा कॉरपोरेट मसला नहीं है, बल्कि यह एक बेहद गंभीर और घिनौना अपराध है। ब्लूमबर्ग ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इस गंभीर अपराध को ऐसे पेश किया जैसे भारत सरकार मेटा कंपनी को कोई फालतू का काम देकर परेशान कर रही हो

भारत को अक्सर मानवाधिकारों, संवेदनशीलता, न्याय, बाल संरक्षण और न जाने किस-किस पर ज्ञान देने वाला पश्चिमी मीडिया अपनी बारी आते ही सारी नैतिकता को भूल जाता है। कुछ दिन पहले जब भारत सरकार ने इंस्टाग्राम से चाइल्ड पोर्नोग्राफी हटाने के लिए अमेरिकी टेक कंपनी मेटा को एक नोटिस जारी किया तो ब्लूमबर्ग ने इस एक्शन की सराहना करने की जगह, इसे अपनी रिपोर्ट में Regulatory Headache बताया, जिसकी वजह से अब उन्हें गाली पड़ रही है।

मामला यह था कि भारत के आईटी मंत्रालय ने मेटा कंपनी को एक नोटिस भेजा था। इसमें इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़ी अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री (Child Pornography) वाले विज्ञापनों को तुरंत हटाने और 7 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था।

इस सीधी और संक्षिप्त खबर को ब्लूमबर्ग ने ‘कानूनी सिरदर्द’ करार दिया और लिखा- “भारत ने मेटा कंपनी को इंस्टाग्राम से बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री हटाने को कहा है, जो इस अमेरिकी कंपनी के लिए एक नया नियामकीय सिरदर्द है।”

गौरतलब हो कि बच्चों का शोषण और उनसे जुड़ी अश्लील सामग्री कोई छोटा-मोटा कॉरपोरेट मसला नहीं है, बल्कि यह एक बेहद गंभीर और घिनौना अपराध है। ब्लूमबर्ग ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इस गंभीर अपराध को ऐसे पेश किया जैसे ये कोई सामान्य बात है और भारत सरकार मेटा कंपनी को कोई बेवजह का काम देकर टेक कंपनी को परेशान कर रही हो।

उनकी इस करतूत ने जाने-अनजाने में बच्चों के साथ होने वाले अपराध से ध्यान भटकाकर पूरा फोकस इस बात पर डाल दिया कि मेटा कंपनी को कितनी ‘असुविधा’ हो रही है, जबकि हकीकत तो यह है कि कंपनी ऐसे घटिया विज्ञापनों से पैसे कमा रही थी।

ब्लूमबर्ग और खबर लिखने वाले पत्रकार ‘संकल्प भरतियाल’ को यह समझने की ज़रूरत है कि बाल यौन शोषण कल्पना से सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। इस खबर से ब्लूमबर्ग की संपादकीय नीति और उनकी नैतिकता पर सीधे सवाल खड़े हुए हैं, जिसकी वजह से उन्हें लोगों का गुस्सा झेलना पड़ रहा है।

ब्लूमबर्ग की ऐसी असंवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए, एक भारतीय एक्स यूज़र ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा- “सिरदर्द? बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को हटाना कहना आपके लिए एक सिरदर्द है?”

एक अन्य यूज़र ने सवाल किया, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बाल यौन सामग्री को हटाना किसी अमेरिकी टेक दिग्गज के लिए रेगुलेटरी सिरदर्द क्यों होगा? क्या अमेरिका मेटा प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन सामग्री की अनुमति देता है?”

एक और एक्स यूज़र ने लिखा, “ब्लूमबर्ग की समस्या यह नहीं है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री मौजूद है- उनकी समस्या यह है कि भारत मेटा को इसे हटाने के लिए मजबूर कर रहा है। वे इस नैतिक जिम्मेदारी को ‘रेगुलेटरी हेडएक’ कहते हैं।

ब्लूमबर्ग का मानसिक स्तर गिर चुका है और वे अब ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे पीडोफिलिया कोई मुद्दा ही न हो।”

गौरतलब है कि ब्लूमबर्ग की यह हरकत देखकर ऐसा लगता है कि ने यह संवेदनहीनता उन्होंने सिर्फ इसलिए दिखाई क्योंकि यह मामला भारत के आदेश से जुड़ा था। और चूँकि ब्लूमबर्ग अक्सर अपने ओपिनियन वाले आर्टिकल के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव चलाने के लिए पहले से ही बदनाम रहा है इसलिए इस बार भी हैरानी की बात नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया। मगर, दुखद यह है कि ब्लूमबर्ग पर ऐसी हरकतें अक्सर भारतीय मूल के लेखकों द्वारा करवाई जाती है।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
Senior Sub-Editor at OpIndia. Email: [email protected]

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ पर फैलाया जा रहा ‘अर्धसत्य’: इसे कानूनी वजहों से ZEE5 ने हटाया, सरकार ने नहीं लगाया कोई बैन; जानिए पूरा...

सतलुज पर सरकार ने बैन नहीं लगाया बल्कि फिल्म पहले IT नियम, 2021 के नियम 9 के तहत ZEE5 पर रिलीज हुई और बाद में उसी व्यवस्था के तहत उसे हटा भी दिया गया।

बाबू जगजीवन राम: वो दलित नेता जिन्हें कॉन्ग्रेस और लेफ्ट से कभी उनका हक नहीं मिला, क्योंकि वे हिंदू धर्म से नहीं करते थे...

डॉ. आंबेडकर ने जाति व्यवस्था से तंग आकर बौद्ध धर्म अपनाया, तो जगजीवन राम जीवनभर हिंदू समाज के भीतर रहकर ही कुरीतियों को सुधारने के पक्षधर रहे।
- विज्ञापन -