वैश्विक मंच पर ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की खोज आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। इस दिशा में भारत ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक कदम आगे बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच गुरुवार (09 जुलाई 2026) को यूरेनियम आपूर्ति से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण समझौता संपन्न हुआ है।
यह समझौता न केवल भारत की भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि यह दोनों देशों के बीच मजबूत होते रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों का भी प्रतीक है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए इस समझौते ने उन कानूनी और राजनीतिक बाधाओं को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है, जो दशकों से दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग में रोड़ा बनी हुई थीं।
यह डील भारत को एक ऐसा विश्वसनीय ईंधन स्रोत प्रदान करेगी, जो उसकी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाने और पर्यावरण अनुकूल लक्ष्यों को प्राप्त करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।
भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील: दशकों पुराना गतिरोध कैसे खत्म हुआ?
भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध हमेशा से इतने सहज और मजबूत नहीं रहे हैं, जितने आज दिखाई देते हैं। यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1974 में जब भारत ने ‘पोखरण-1’ के माध्यम से अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, तब ऑस्ट्रेलिया सहित कई पश्चिमी देशों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
इसके बाद साल 1998 में किए गए दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर कड़े अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए गए और यूरेनियम व्यापार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने एक बेहद सख्त नीति अपनाई थी, जिसके तहत वह केवल उन्हीं देशों को यूरेनियम का निर्यात कर सकता था जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए हों।
चूँकि भारत इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता आया है, इसलिए उसने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया ने लंबे समय तक भारत को यूरेनियम देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया था। इस गतिरोध में पहला महत्वपूर्ण मोड़ साल 2007 में आया, जब तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी दी।
हालाँकि उसी वर्ष के अंत में ऑस्ट्रेलिया में सत्ता परिवर्तन हो गया और केविन रड के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी की सरकार ने इस फैसले को पलटते हुए फिर से NPT की शर्त सामने रख दी।
ऑस्ट्रेलिया को हमेशा यह डर सताता था कि भारत इस यूरेनियम का उपयोग बिजली बनाने के बजाय परमाणु हथियार विकसित करने में कर सकता है। लेकिन साल 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद वैश्विक परिदृश्य बदला। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) ने भारत को यूरेनियम खरीदने की छूट दे दी।
भारत के बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड और ‘पहले परमाणु हमला न करने’ की नीति को देखते हुए साल 2011 में ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नीति बदली और 2012 में प्रतिबंध को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया। इसके बाद 2014 में तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबॉट की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौता हुआ।
इसने यूरेनियम आपूर्ति की कानूनी राह खोली। वर्तमान में सुरक्षा गारंटियों और परमाणु दायित्व कानून जैसी तमाम तकनीकी और प्रशासनिक बारीकियों को अंतिम रूप देकर इस व्यवस्था को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है।
IAEA की निगरानी में केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा ईंधन का उपयोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बनीज के बीच हुए इस हालिया समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को दीर्घकालिक यूरेनियम निर्यात का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इस ईंधन का उपयोग सिर्फ और सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।
दोनों देशों द्वारा जारी संयुक्त बयान में स्पष्ट किया गया है कि यूरेनियम का यह पूरा निर्यात अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कड़े सुरक्षा प्रावधानों और निगरानी मानकों के दायरे में होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि आपूर्ति किए गए यूरेनियम की हर मात्रा का हिसाब रखा जाएगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसका उपयोग केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ही हो रहा है।
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इस व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि यह निर्यात भारत को अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता को तेजी से बढ़ाने में सक्षम बनाएगा। दिलचस्प बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का लगभग 28 से 32 प्रतिशत यूरेनियम का विशाल भंडार है, लेकिन वह खुद अपने देश में परमाणु ऊर्जा का उपयोग नहीं करता और न ही परमाणु हथियार बनाता है।
वह अपने पूरे यूरेनियम को निर्यात कर देता है। ऑस्ट्रेलिया अब तक चीन, जापान, ताइवान और अमेरिका जैसे देशों को यूरेनियम की आपूर्ति करता रहा था, लेकिन अब इस सूची में भारत का शामिल होना एक बड़ी रणनीतिक जीत है। दोनों देशों ने इस बात की पुष्टि की है कि ‘ऑस्ट्रेलिया-भारत परमाणु सहयोग समझौते (2015)’ के तहत सभी आवश्यक प्रशासनिक प्रबंध पूरे कर लिए गए हैं।
भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर एनर्जी का रखा है महत्वाकांक्षी लक्ष्य
भारत की आबादी और उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को देखते हुए देश में बिजली की माँग लगातार बढ़ रही है। विज्ञान मामलों के जानकार पल्लव बागला के अनुसार, वर्तमान समय में भारत की कुल परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगभग 8 गीगा वाट (या वर्तमान में सक्रिय रिएक्टरों के आधार पर करीब 8.78 गीगा वाट) है, जो देश के कुल बिजली उत्पादन का महज 3 प्रतिशत ही है।
परमाणु ऊर्जा की इस कम हिस्सेदारी का सबसे बड़ा कारण देश में यूरेनियम ईंधन की भारी कमी रहा है। यद्यपि भारत घरेलू स्तर पर झारखंड और आंध्र प्रदेश की खदानों से यूरेनियम का उत्खनन करता है, लेकिन यह घरेलू उत्पादन प्रति वर्ष केवल 400 से 500 टन ही है, जो देश की कुल जरूरतों का मुश्किल से 20% से 25% ही पूरा कर पाता है।
शेष आवश्यकता के लिए भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2008-09 से 2024-25 तक भारत ने IAEA की निगरानी वाले रिएक्टरों के लिए कुल 18,842.60 मीट्रिक टन यूरेनियम का आयात किया है, जिसमें यूरेनियम अयस्क, प्राकृतिक यूरेनियम डाईऑक्साइड, पेलेट्स और समृद्ध पेलेट्स शामिल हैं।
भारत सरकार ने साल 2047 तक देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगा वाट करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, ताकि लगभग 6 करोड़ भारतीय घरों को निर्बाध बिजली प्रदान की जा सके। इस विशाल लक्ष्य को प्राप्त करने के चरणबद्ध तरीके भी तय किए गए हैं।
इसके तहत वर्तमान क्षमता को साल 2031-32 तक बढ़ाकर लगभग 22 गीगा वाट किया जाएगा और इसके बाद 2032 से 2047 के बीच NPCIL द्वारा 32 गीगा वाट की अतिरिक्त क्षमता स्थापित की जाएगी। जानकारों का कहना है कि वर्तमान में रिएक्टरों को सालाना करीब 2,000 टन यूरेनियम की जरूरत होती है।
हालाँकि जब भारत 100 गीगा वाट के लक्ष्य तक पहुँचेगा, तब यह सालाना जरूरत बढ़कर 23,000 टन तक पहुँच सकती है। चूँकि भारत के पास परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में अपना यूरेनियम मौजूद है, इसलिए उसे बाहरी देशों से यूरेनियम की आवश्यकता केवल और केवल असैन्य ऊर्जा प्रोग्राम को चलाने के लिए है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया का उच्च गुणवत्ता वाला यूरेनियम बेहद मददगार साबित होगा।
SHANTI विधेयक और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी
भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने और 2047 के 100 गीगा वाट के लक्ष्य को समय पर हासिल करने के लिए विधायी स्तर पर भी बड़े कदम उठाए हैं। इसी क्रम में भारतीय संसद द्वारा दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक कानून पास किया गया, जिसका नाम ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांस्फ़ॉर्मिंग इंडिया’ यानी ‘शांति’ (SHANTI) विधेयक है।
यह नया कानून भारत के परमाणु क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करता है, क्योंकि यह देश के परमाणु ऊर्जा इतिहास में पहली बार निजी कंपनियों को बड़े स्तर पर भागीदारी की अनुमति देता है।
इस विधेयक के प्रावधानों के तहत अब देश की निजी कंपनियों को भी परमाणु बिजलीघर या परमाणु रिएक्टर बनाने, उनका मालिकाना हक रखने, उन्हें संचालित करने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बंद करने (डीकमिशन करने) के लाइसेंस दिए जा सकेंगे।
इतना ही नहीं यह कानून निजी कंपनियों को परमाणु ईंधन बनाने की भी अनुमति प्रदान करता है, जिसमें यूरेनियम-235 का रूपांतरण, उसका शोधन और एक निर्धारित सुरक्षित सीमा तक उसका संवर्धन (एनरिचमेंट) शामिल है।
इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने वाले अन्य परमाणु पदार्थों का उत्पादन, उपयोग, प्रसंस्करण और उनका सुरक्षित निपटान भी अब निजी क्षेत्र की कंपनियाँ कर सकेंगी। सरकार का मानना है कि इस कानून के जरिए निजी पूंजी और उन्नत तकनीकों का समावेश होगा, जिससे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण में तेजी आएगी और देश ईंधन के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा।
यूरेनियम का विज्ञान: प्रकृति और ऊर्जा क्षमता
यूरेनियम क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है, इसे समझने के लिए इसके वैज्ञानिक और प्राकृतिक पहलुओं को जानना आवश्यक है। यूरेनियम एक बेहद भारी और उच्च घनत्व वाली धातु है, जिसका गलनांक (मेल्टिंग पॉइंट) 1132 डिग्री सेल्सियस होता है।
इसका उपयोग पिछले 60 से अधिक वर्षों से ऊर्जा के एक अत्यंत सघन और शक्तिशाली स्रोत के रूप में किया जा रहा है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के आँकड़ों के अनुसार, यूरेनियम पृथ्वी की ऊपरी परत में पाया जाने वाला एक सामान्य तत्व है, जो टिन, टंगस्टन और मोलिब्डेनम जितना ही आम है।
यह ज्यादातर चट्टानों में 2 से 4 पार्ट्स प्रति मिलियन (यानी 20 से 40 लाखवें हिस्से) की सूक्ष्म मात्रा में मौजूद होता है। इसके अलावा, यूरेनियम समुद्री पानी में भी घुली हुई अवस्था में प्रचुर मात्रा में मौजूद है, जहाँ से इसे उन्नत तकनीकों के जरिए निकाला जा सकता है।
ऐतिहासिक रूप से, यूरेनियम की खोज साल 1789 में जर्मन रसायन वैज्ञानिक मार्टिन क्लापरोथ ने ‘पिचब्लेंड’ नामक एक खनिज में की थी। उन्होंने इसका नाम उस समय से आठ साल पहले खोजे गए सौर मंडल के ‘यूरेनस’ ग्रह के नाम पर रखा था।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम का निर्माण आज से लगभग 6.6 अरब साल पहले अंतरिक्ष में हुए भीषण सुपरनोवा विस्फोटों के दौरान हुआ था। यद्यपि यह पूरे सौर मंडल में बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध नहीं है, लेकिन पृथ्वी के भीतर इसका धीमा रेडियोधर्मी क्षय (रेडियोएक्टिव डिके) आज भी हमारे ग्रह के आंतरिक हिस्से में गर्मी का मुख्य स्रोत है।
इसी आंतरिक ऊष्मा के कारण ही पृथ्वी के भीतर महाद्वीपों का खिसकना, जिसे ‘कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट’ कहा जाता है, संभव हो पाता है। अपने अत्यधिक घनत्व के कारण, परमाणु ऊर्जा के अलावा इसका उपयोग विमानों के नियंत्रण तंत्र (कंट्रोल सिस्टम) में और खतरनाक रेडिएशन से सुरक्षा के लिए शील्डिंग सामग्री के रूप में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।
वैश्विक साझेदारी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरण
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ यह ऊर्जा समझौता केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे भू-राजनीतिक और रणनीतिक कारण भी छिपे हैं। दोनों देश ‘व्यापक रणनीतिक साझेदार’ (कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रेटेजिक पार्टनर्स) हैं और एक स्वतंत्र, खुले, सुरक्षित और समृद्ध हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र का साझा दृष्टिकोण रखते हैं।
हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में जो अभूतपूर्व करीबी आई है, उसकी एक बड़ी वजह चीन की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर नजर बनाए रखना और वैश्विक व्यापार को किसी एक देश पर निर्भर रहने से बचाकर नए मजबूत साझेदार विकसित करना भी है।
दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा पर एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर वैश्विक स्तर पर चल रहे व्यवधानों, विशेषकर मध्य पूर्व की स्थिति और उसके कारण ऊर्जा, संसाधनों तथा अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं और कीमतों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर गहरी चिंता जताई है।
इस व्यवधान के बीच दोनों देशों ने खुले बाजारों और नियम-आधारित व्यापार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जो उनकी आर्थिक सुरक्षा का मूल आधार है। भारत ने इसके पूर्व फ्रांस, रूस और कजाकिस्तान जैसे देशों से भी परमाणु ईंधन आयात के समझौते कर रखे हैं और अब ऑस्ट्रेलिया इस कड़ी में एक सबसे मजबूत और दीर्घकालिक स्तंभ बनकर उभरा है।
इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच आपसी कूटनीतिक गर्मजोशी भी साफ देखी गई, जहाँ दोनों नेताओं ने एक खुशनुमा सेल्फी ली। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की भी खुलकर सराहना की।
इस मजबूत रिश्ते का एक सामाजिक आधार ऑस्ट्रेलिया में तेजी से बढ़ता भारतीय प्रवासी समुदाय भी है। वर्ष 2026 के आँकड़ों के अनुसार, इतिहास में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में विदेश में जन्मे प्रवासियों का सबसे बड़ा समूह भारत में जन्मे लोगों का हो गया है, जिसने लंबे समय से चले आ रहे ब्रिटिश मूल के समुदाय को भी पीछे छोड़ दिया है।
इस रणनीतिक साझेदारी को और विस्तार देते हुए दोनों देशों ने हिंद महासागर में स्थित ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीपसमूह पर एक ‘अस्थायी अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल’ स्थापित करने पर भी सहमति जताई है, जो भारत के भविष्य के अंतरिक्ष उड़ान प्रोजेक्ट्स को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेगा।
इसके अलावा, दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की सप्लाई चेन को मजबूत करने, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG), कोयला, डीजल और कम कार्बन वाले ईंधनों के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने भारत की ‘ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस’ (GBA) पहल का भी स्वागत किया है।
यह समग्र साझेदारी भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता और वैश्विक पटल पर उसके बढ़ते प्रभाव को एक नई और सुरक्षित दिशा प्रदान करती है।


