भारत के बिल्कुल बगल में पश्चिम बंगाल से होकर बहने वाली पद्मा नदी के किनारे एक बहुत बड़ा बदलाव आकार ले रहा है। बांग्लादेश अपने पहले न्यूक्लियर पॉवर प्लांट यानी रूपपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना का निर्माण कर रहा है। वहाँ खड़े विशालकाय, हाथीदांत के रंग जैसे कूलिंग टावर्स को देखने के लिए स्थानीय लोग आते हैं और तस्वीरें लेते हैं। लेकिन इस खूबसूरत दिखने वाली तस्वीर के पीछे कई गहरे सवाल, ऐतिहासिक महत्वाकांक्षाएँ और सबसे बढ़कर सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसे डर छिपे हैं, जो सीधे भारत को प्रभावित करते हैं।
एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और रूस द्वारा उसे दी जा रही मदद को लेकर चिंतित है, वहीं भारत के ठीक पड़ोस में एक और पड़ोसी देश परमाणु शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। हालाँकि बांग्लादेश का यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से शांतिपूर्ण नागरिक ऊर्जा के लिए है, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऊर्जा के बहाने शुरू हुए परमाणु कार्यक्रम कब सैन्य महत्वाकांक्षाओं में बदल जाते हैं, इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि देश के दो पड़ोसी पाकिस्तान और चीन पहले से ही घोषित परमाणु हथियार संपन्न देश हैं। ऐसे में तीसरे पड़ोसी का परमाणु क्लब की तरफ बढ़ना रणनीतिक और सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।
रूपपुर प्रोजेक्ट में तकनीकी तौर पर मिल रहा रूस का साथ
ब्लूमबर्ग की ताजी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2028 में पूरी तरह से चलने जा रहा रूपपुर में बांग्लादेश का यह पहला परमाणु बिजली घर रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम की मदद से बनाया जा रहा है। यह कुल 2.4 गीगावाट का प्रोजेक्ट है, जिसमें बारह-बारह सौ मेगावाट के दो आधुनिक रशियन-डिजाइन रिएक्टर लगाए जा रहे हैं।
वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक, रोसाटॉम के साथ हुए मुख्य समझौते के तहत इस प्लांट की शुरुआती लागत करीब 12.65 बिलियन डॉलर आँकी गई थी, जिसमें शुरुआती कुछ सालों का परमाणु ईंधन भी शामिल है।

पहले इस प्लांट की पहली यूनिट को साल 2023 तक शुरू होना था, लेकिन कोविड महामारी, यूक्रेन पर रूस के हमले और मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक संकटों के चलते यह प्रोजेक्ट लेट हो गया। अब उम्मीद है कि पहला रिएक्टर साल 2027 की शुरुआत में और दूसरा उसके एक साल बाद यानी 2028 तक पूरी तरह चालू हो पाएगा। इस परियोजना को प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार आगे बढ़ा रही है, जो साल 2024 में लंबा तानाशाही दौर खत्म होने के बाद लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आई है।
प्रोजेक्ट में देरी से बढ़ गई लागत, परेशान है बांग्लादेश
इस देरी की वजह से बांग्लादेश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बांग्लादेशी मुद्रा ‘टका’ काफी कमजोर हो गई है। स्थानीय मुद्रा के हिसाब से देखें तो पिछले 10 साल में इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग एक-चौथाई बढ़ चुकी है। ब्लूमबर्ग को दिए बयान में ढाका यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद शफीकुल इस्लाम का कहना है कि अगर यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो जाता, तो न केवल लागत बढ़ने से बचती, बल्कि बांग्लादेश को महँगे जीवाश्म ईंधन के आयात से भी राहत मिल जाती।

इसके बावजूद प्लांट के ऑपरेटरों का दावा है कि लंबे समय की सुरक्षा और बिजली की निश्चित आपूर्ति के लिहाज से यह सौदा देश के लिए पूरी तरह फायदेमंद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी साबित होगा।
फुकुशिमा जैसी तबाही हुई तो जिम्मेदार कौन होगा?
अब आते हैं सबसे बड़े और सबसे डरावने सवाल पर कि अगर रूपपुर में जापान के फुकुशिमा जैसी कोई परमाणु दुर्घटना या तबाही होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा। यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि रूपपुर प्लांट भारतीय सीमा के बेहद करीब है। परमाणु रेडिएशन सीमाओं को नहीं मानता और हवा-पानी के जरिए यह कुछ ही घंटों में भारत के एक बड़े हिस्से विशेषकर पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों को अपनी चपेट में ले सकता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों और न्यूक्लियर लायबिलिटी के सिद्धांतों के तहत इस स्थिति को समझना जरूरी है।
ऑपरेटर की प्राथमिक जिम्मेदारी (The Operator’s Liability): अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और ‘वियना कन्वेंशन ऑन सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज‘ के मुताबिक, किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में सबसे पहली और सीधी जिम्मेदारी उस देश की एजेंसी की होती है जो प्लांट को चला रही है। रूपपुर के मामले में यह जिम्मेदारी ‘न्यूक्लियर पॉवर प्लांट कंपनी बांग्लादेश लिमिटेड’ (NPCBL) और बांग्लादेश सरकार की होगी। फुकुशिमा आपदा के समय भी पूरी जिम्मेदारी जापानी कंपनी टेपको (TEPCO) और जापान सरकार पर आई थी।
सप्लायर (रूस/रोसाटॉम) की भूमिका: सप्लायर देशों की भूमिका की बात करें तो रूस जैसे बड़े परमाणु निर्यातक अपने समझौतों में एक सुरक्षा कवच शामिल करवाते हैं। इसके तहत तकनीकी खराबी साबित होने पर भी वित्तीय मुआवजे का एक बड़ा हिस्सा ऑपरेटर देश को ही भुगतना पड़ता है। हालाँकि आधुनिक रशियन रिएक्टरों में सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम होते हैं जो पिघले हुए परमाणु ईंधन को बाहर फैलने से रोकते हैं, लेकिन किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में रूस पर सीधी कानूनी जिम्मेदारी डालना अंतरराष्ट्रीय अदालतों में बहुत पेचीदा काम होता है।
भारत के लिए संकट और अंतरराष्ट्रीय हर्जाना: यदि कोई हादसा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत बांग्लादेश को प्रभावित देशों को मुआवजा देना होगा। लेकिन असली संकट यह है कि क्या बांग्लादेश जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के पास अरबों डॉलर का मुआवजा देने की क्षमता होगी। फुकुशिमा की सफाई और मुआवजे में जापान के $200 बिलियन से ज्यादा खर्च हुए थे। बांग्लादेश के पास वित्तीय संसाधनों की कमी है, इसलिए किसी भी बड़ी आपदा का वास्तविक खामियाजा और तात्कालिक मानवीय बोझ भारत को ही उठाना पड़ सकता है।
परमाणु ऊर्जा की तरफ क्यों बढ़ रहा है बांग्लादेश
सुरक्षा के इतने बड़े जोखिमों और भारी-भरकम खर्च के बावजूद बांग्लादेश आखिर परमाणु बिजली के पीछे क्यों भाग रहा है। इसका जवाब उसके मौजूदा बिजली संकट और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में छिपा है। वर्तमान में बांग्लादेश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस, कोयले और फर्नेस ऑयल जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। देश में 42% बिजली प्राकृतिक गैस से, 23% कोयले से और करीब 19% फीसदी फर्नेस ऑयल से आती है। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा भारत से खरीदी जाने वाली बिजली का है।

बीते कुछ सालों में यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव की वजह से जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें लग गईं, गाँवों में कई-कई घंटों के पावर कट होने लगे और फैक्ट्रियों का उत्पादन ठप हो गया। इस बाहरी झटके ने बांग्लादेश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर देश को तरक्की की राह पर ले जाना है, तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा।
रूपपुर प्लांट जब 2028 में पूरी तरह चालू हो जाएगा, तो यह अकेले देश की 15% बिजली की जरूरत को पूरा करेगा। एनर्जी एनालिस्ट शफीकुल आलम के मुताबिक, इससे बांग्लादेश को अगले 5 से 7 साल तक कोई नया कोयला या गैस प्लांट लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे वह पर्यावरण के अनुकूल रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) पर ध्यान दे सकेगा।
भारत के लिए काफी चिंता की बात
दुनियाभर में बन रहे लगभग 80 परमाणु रिएक्टरों में से ज्यादातर एशिया में हैं और इन पर रूस व चीन का दबदबा है। ये दोनों देश विकासशील देशों को सस्ती दरों पर या लंबे समय के कर्ज (20 से 25 साल की आसान किश्तों) पर अपनी परमाणु तकनीक बेच रहे हैं। इसके जरिए वे इन देशों को अपने ऊपर दशकों के लिए निर्भर बना लेते हैं। बांग्लादेश को रूस द्वारा दिया गया भारी कर्ज उसे लंबे समय के लिए मॉस्को के रणनीतिक प्रभाव में ले आता है।
दक्षिण एशिया में परमाणु होड़ पहले से ही तेज है। भारत 2047 तक अपनी परमाणु क्षमता को 11 गुना बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की योजना पर काम कर रहा है (जिसमें रूस खुद तमिलनाडु के कुडनकुलम में रिएक्टर बना रहा है)। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में चीन ने 6 परमाणु रिएक्टर सप्लाई किए हैं जिनकी क्षमता 3.3 गीगावाट है। ऐसे में बांग्लादेश का इस रेस में शामिल होना उपमहाद्वीप के शक्ति संतुलन को बदलता है।
परमाणु नीति के विशेषज्ञ टोबी डाल्टन (कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस) एक जरूरी चेतावनी देते हैं। उनका कहना है कि किसी भी विकासशील देश को परमाणु ऊर्जा के ‘हाइप’ (चकाचौंध) में आकर जल्दबाजी में फैसले नहीं लेने चाहिए। न्यूक्लियर प्लांट चलाने के लिए केवल रिएक्टर बना लेना काफी नहीं है, इसके लिए एक बेहद कुशल कार्यबल, एक पूरी तरह स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी (नियामक संस्था) और सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल हो चुके परमाणु कचरे (Spent Fuel) को सुरक्षित ठिकाने लगाने की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए। कोई भी देश ऐसी तकनीक की प्रयोगशाला नहीं बनना चाहेगा जो पूरी तरह से जाँची-परखी न हो।
ईस्ट-पाकिस्तान के दौर से जुड़ी है परमाणु जिद
वैसे, यहाँ ये जानना भी जरूरी है कि बांग्लादेश की यह परमाणु महत्वाकांक्षा कोई नई या अचानक पैदा हुई कहानी नहीं है। इसकी जड़ें 1960 के दशक से जुड़ी हैं, जब बांग्लादेश जैसी कोई जगह दुनिया के नक्शे पर नहीं थी और यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। साल 1961 में जब अविभाजित पाकिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की, तब पूर्वी पाकिस्तान के पबना जिले के रूपपुर में एक परमाणु संयंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।
उस समय जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई थी, लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने जानबूझकर इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और सारा ध्यान अपने इलाके (पश्चिमी पाकिस्तान) पर केंद्रित रखा। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के मन में यह बात हमेशा एक कसक की तरह चुभती रही कि उनके साथ भेदभाव किया गया।
साल 1971 में एक खूनी संघर्ष के बाद भारत ने जब बांग्लादेश को आजाद कराया, तो देश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान ने इस सपने को फिर से जिंदा करने की कोशिश की, लेकिन देश की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह योजना दशकों तक फाइलों में दबी रही। अब जब भारत और पाकिस्तान दोनों के पास बड़ी परमाणु क्षमताएँ हैं, तो बांग्लादेश के भीतर एक तरह का राष्ट्रीय गौरव जागा है। वहाँ के आम लोगों और वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर भारत और पाकिस्तान ऐसा कर सकते हैं, तो बांग्लादेश को भी यह क्षमता हासिल करनी चाहिए।
भारत को निगरानी बढ़ाने की जरूरत
बहरहाल बांग्लादेश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए परमाणु बिजली बना रहा है, जो उसका संप्रभु अधिकार है। लेकिन भारत के लिए जो तीन तरफ से बांग्लादेश को घेरे हुए है, यह प्रोजेक्ट एक ऐसी चुनौती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत को बांग्लादेश की नई तारिक रहमान सरकार के साथ मिलकर एक ‘जॉइंट न्यूक्लियर सेफ्टी एंड डिजास्टर मैनेजमेंट प्रोटोकॉल’ (संयुक्त परमाणु सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन समझौता) तैयार करना चाहिए। इसके तहत भारतीय वैज्ञानिकों को रूपपुर प्लांट की सुरक्षा ऑडिट की निगरानी का मौका मिलना चाहिए और रीयल-टाइम रेडिएशन डेटा शेयरिंग की व्यवस्था होनी चाहिए।
आखिरकार पड़ोस में जलने वाला दीया अगर रोशनी दे सकता है, तो हवा का रुख बदलने पर उसकी एक चिंगारी हमारे घर को भी झुलसा सकती है। सुरक्षा की मुस्तैदी ही इस परमाणु महत्वाकांक्षा के बीच भारत के हित सुरक्षित रख सकती है।


