चीन तिब्बत के पठार पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना (Hydropower Project) का निर्माण कर रहा है। यह महा-बाँध तिब्बत में यारलुंग सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी पर बनाया जा रहा है। इस परियोजना को लेकर भारत और बांग्लादेश जैसे निचले तटीय देश लंबे समय से पर्यावरण और सुरक्षा कारणों से चिंता जताते रहे हैं। लेकिन दिन पहले आई एक नई जियोलॉजिकल रिपोर्ट में हुए खुलासे ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।
इस बार चेतावनी किसी बाहरी देश या स्वतंत्र संस्था ने नहीं, बल्कि खुद चीन के सरकारी वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों (Geologists) ने दी है। चीनी वैज्ञानिकों की एक आधिकारिक रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि जहाँ यह बाँध बनाया जा रहा है, उसके ठीक नीचे एक बेहद खतरनाक और ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ (Active Fault Line) मौजूद है।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप आता है, तो यह बाँध एक बहुत बड़े ‘टाइम बम’ की तरह फट सकता है, जिससे न केवल चीन बल्कि भारत और बांग्लादेश में अभूतपूर्व तबाही मच सकती है।
क्या है एक्टिव फॉल्ट लाइन और यह ‘पैझेन फॉल्ट’ कितनी खतरनाक है?
इस पूरे विवाद और खतरे को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ यानी सक्रिय भ्रंश रेखा क्या होती है। हमारी धरती के भीतर कई विशाल टेक्टोनिक प्लेट्स होती हैं, जो लगातार बहुत धीमी गति से हिलती-डुलती रहती हैं। जब ये प्लेट्स आपस में टकराती हैं या एक-दूसरे से रगड़ खाती हैं, तो चट्टानों में दरारें पड़ जाती हैं।
इन्हीं दरारों को भूविज्ञान (Geology) की भाषा में फॉल्ट (Fault) या भ्रंश कहा जाता है। ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ उस दरार को कहते हैं जहाँ हाल के भूगर्भीय इतिहास में हलचल हुई हो और भविष्य में भी कभी भी बड़ा भूकंप आने की पूरी संभावना हो। चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में जिस दरार का जिक्र किया है, उसका नाम ‘पैझेन फॉल्ट’ (Paizhen Fault) है।
यह फॉल्ट लाइन उस पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहाँ भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेट के बीच भीषण और निरंतर टकराव हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पैझेन फॉल्ट प्लीस्टोसिन युग (Pleistocene Epoch यानी हिमयुग) से ही अत्यधिक सक्रिय रही है।
आधुनिक वैज्ञानिक जाँच और प्राचीन झील के तलछटों (Lake Sediments) की डेटिंग से पता चला है कि यह फॉल्ट लाइन लगभग 9,500 साल पहले भी सक्रिय थी और वर्तमान होलोसिन (Holocene) युग में भी इसमें लगातार मजबूत हलचल देखी जा रही है।
साल 2017 में तिब्बत के मिलिन क्षेत्र में आया 6.9 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप इसी पैझेन फॉल्ट लाइन के उत्तरी छोर पर आया था, जो इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यह क्षेत्र कभी भी बड़े भूकंप से दहल सकता है।
चीनी सरकारी शोधकर्ताओं ने रिपोर्ट में क्या-क्या खुलासे किए हैं?
चीन के इस महा-बाँध को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है, वह किसी साधारण संस्था की नहीं है। इसे चीन के सरकारी महकमे ‘चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण’ (China Geological Survey) की देखरेख में तैयार किया गया है और पिछले महीने ही इसे चीनी भाषा के प्रतिष्ठित जर्नल ‘सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है।
इस अध्ययन को चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के नागरिक-सैन्य एकीकरण केंद्र और मध्य यारलुंग जांगबो नदी प्राकृतिक संसाधन अवलोकन और अनुसंधान स्टेशन के भूवैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से अंजाम दिया है।
इस सरकारी रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बेहद कड़े शब्दों में चेताया है कि एक्टिव पैझेन फॉल्ट सीधे तौर पर इस मेगा-डैम के बुनियादी ढाँचे की अखंडता को खतरे में डाल रही है। वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में बताया है कि इस एक्टिव फॉल्ट लाइन के कारण आसपास की चट्टानें पूरी तरह टूट चुकी हैं और उनके आंतरिक यांत्रिक गुण (Mechanical Properties) बदल चुके हैं।
इसके कारण जमीन के भीतर की संरचना बेहद कमजोर हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की जमीनी बनावट बेहद ढीली है और चट्टानों के बीच का आपसी जुड़ाव या सामंजस्य (Cohesion) बहुत कमजोर है। चीनी शोधकर्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि जब इस बाँध के विशाल जलाशय (Reservoir) को पानी से भरा जाएगा, तो लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण यहाँ की मिट्टी और चट्टानें पानी सोखकर और कमजोर हो जाएँगी।
ऐसी स्थिति में फॉल्ट लाइन की मामूली हलचल या किसी भी भूकंप के झटके से बाँध के दोनों तरफ की पहाड़ियों पर बेहद आसानी से भयंकर भूस्खलन (Landslides) और चट्टानें खिसकने की घटनाएँ शुरू हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति निर्माण कार्य में लगे कर्मियों और भविष्य में बाँध के पूरे ढाँचे के लिए एक बड़ा सुरक्षा संकट खड़ी कर सकती है।
कहाँ बन रहा है यह दुनिया का सबसे बड़ा बाँध और क्या है इसका पैमाना?
चीन इस विशालकाय परियोजना को तिब्बत के मेडोग (Metog) काउंटी में बना रहा है, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘मेडोग हाइड्रोपावर स्टेशन’ (Medog Hydropower Station) नाम दिया गया है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह यारलुंग सांगपो नदी के ‘ग्रेट बेंड’ (Great Bend) के पास स्थित है।
यहाँ नदी अचानक एक बेहद तीखा मोड़ लेती है और करीब 2,000 मीटर गहरी खाई में गिरती है। चीन इसी प्राकृतिक ढलान और पानी के प्रचंड वेग का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए करना चाहता है। यह बाँध स्थल भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश की सीमा से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
इस बाँध के आकार और क्षमता की बात करें तो यह वास्तव में एक विशाल ढाँचा है। यह एक 60,000 मेगावाट की ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ पनबिजली परियोजना है। चीन के सरकारी दावों के अनुसार, इस बाँध से हर साल लगभग 300 बिलियन (30,000 करोड़) किलोवाट-घंटा बिजली पैदा होगी।
यह क्षमता चीन में ही पहले से मौजूद दुनिया के सबसे बड़े बाँध ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ (Three Gorges Dam) की कुल वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता से तीन गुना अधिक है। इस महा-परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1.2 ट्रिलियन युआन (यानी लगभग 137 से 167 बिलियन अमेरिकी डॉलर) आँकी गई है।
चीनी सरकार ने दिसंबर 2024 में इस परियोजना को मंजूरी दी थी, जुलाई 2025 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और इसे साल 2033 तक पूरी तरह से चालू करने का एक बेहद कड़ा और तेज समयबद्ध लक्ष्य तय किया गया है।
इतने बड़े खतरों के बावजूद इस प्रोजेक्ट को पूरा करने पर क्यों अड़ा है चीन?
अब यहाँ एक बड़ा और स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि जब चीन के अपने ही सरकारी वैज्ञानिकों ने इस जगह को एक ‘जियोलॉजिकल टाइम बम’ बता दिया है, तो फिर चीन की सरकार इतने बड़े खतरों को नजरअंदाज करके इस प्रोजेक्ट को पूरा करने पर क्यों अड़ी है? आखिर चीन के लिए इस परियोजना का क्या मतलब है और उसके पीछे उसकी क्या मंशा है? इसके पीछे चीन के कई गहरे रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण छिपे हैं।
सबसे पहला कारण चीन की विशाल ऊर्जा भूख और उसकी वैश्विक कार्बन-तटस्थता (Carbon Neutrality) की घोषणा है। चीन ने दुनिया के सामने वादा किया है कि वह आने वाले दशकों में अपनी कार्बन निर्भरता को कम करेगा और इसके लिए उसे भारी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत है।
यह अकेला बाँध चीन को इतनी बिजली दे सकता है जो उसके कई बड़े शहरों को रोशन कर सके और कोयले पर उसकी निर्भरता को बेहद कम कर दे। दूसरा बड़ा कारण चीन का अति-राष्ट्रवादी इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया के सामने अपनी तकनीकी और इंजीनियरिंग ताकत का लोहा मनवाना चाहती है।
‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से तीन गुना बड़ा बाँध बनाना चीन के वैश्विक दबदबे और उसकी आंतरिक राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा प्रतीक है। तीसरा और सबसे खतरनाक कारण है भू-राजनीतिक हथियार (Geo-political Weapon)। तिब्बत का यह इलाका भारत की सीमा के बेहद करीब है।
इस नदी पर इतना बड़ा बाँध बनाकर चीन पानी के नियंत्रण की चाबी अपने हाथ में लेना चाहता है। भविष्य में भारत या अन्य पश्चिमी देशों के साथ किसी भी टकराव या युद्ध की स्थिति में, चीन इसके जरिए पानी को रोककर या अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़कर निचले इलाकों में कृत्रिम बाढ़ ला सकता है। हालाँकि ऐसा मुश्किल ही है, क्योंकि इससे उसे भी खतरा है।
यही वजह है कि चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रोजेक्ट को बंद करने या रद्द करने की सिफारिश नहीं की है क्योंकि वे जानते हैं कि बीजिंग के राजनीतिक आकाओं के सामने ऐसी बात कहना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। वैज्ञानिकों ने केवल इसके ढलानों को मजबूत करने और कंक्रीट की सुरक्षा दीवारें बनाने जैसी तकनीकी सलाह दी है, ताकि परियोजना को किसी भी तरह जारी रखा जा सके।
भारत और बांग्लादेश के लिए इस बाँध से किस तरह का सीधा खतरा है?
यारलुंग सांगपो नदी कोई स्थानीय नदी नहीं है। यह एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। यह तिब्बत के पश्चिमी हिस्से में आंग्सी ग्लेशियर से निकलती है और तिब्बत में 1,625 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहाँ इसे ‘सियांग’ और बाद में असम में ‘ब्रह्मपुत्र’ कहा जाता है।
इसके बाद यह नदी बांग्लादेश में ‘जमुना’ के नाम से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसलिए सीमा से महज 50 किलोमीटर दूर चीन का यह निर्माण सीधे तौर पर भारत और बांग्लादेश की सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। भारत के लिए सबसे बड़ा तात्कालिक खतरा भूगर्भीय विफलता (Geological Failure) का है।
यदि चीनी वैज्ञानिकों की आशंका सच साबित होती है और पैझेन फॉल्ट पर आए किसी भूकंप के कारण यह विशाल बाँध टूट जाता है, तो इसके जलाशय में जमा अरबों क्यूसेक पानी एक साथ किसी महाप्रलय की तरह नीचे की ओर बहेगा।
यह पानी अरुणाचल प्रदेश और असम के पूरे मैदानी इलाकों को कुछ ही घंटों में जलमग्न कर देगा, जिससे लाखों लोगों की जान जा सकती है और अभूतपूर्व तबाही मच सकती है।
हालाँकि कुछ जलविज्ञानी और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन पूरी तरह से ब्रह्मपुत्र का पानी नहीं मोड़ सकता, क्योंकि ब्रह्मपुत्र नदी को अपना 85 से 90 प्रतिशत पानी भारत में प्रवेश करने के बाद उसकी सहायक नदियों और मानसूनी बारिश से मिलता है।
भारत सरकार का इस पूरे मामले पर क्या रुख रहा है?
भारत सरकार चीन की इस खतरनाक गतिविधि पर बहुत बारीक नजर रख रही है। सीमा के इतने करीब दुनिया के सबसे बड़े बाँध का निर्माण भारत के लिए एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। भारत सरकार ने इस विषय को कई बार चीन के सामने राजनयिक स्तर पर उठाया है।
साल 2025 की शुरुआत में जनवरी के महीने में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी अधिकारियों के समक्ष इस बाँध के निचले तटीय इलाकों (Downstream) पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर भारत की गंभीर चिंताओं से अवगत कराया था।
इसके बाद फरवरी 2025 में भी भारत ने चीनी प्रशासन को अपनी आपत्तियाँ भेजी थीं। अगस्त 2025 में भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने देश को आश्वस्त किया था कि भारत सरकार तिब्बत में हो रहे इन सभी घटनाक्रमों और निर्माण कार्यों को लेकर पूरी तरह सतर्क है।
उन्होंने बताया था कि सरकार विभिन्न स्थापित तंत्रों और सैटेलाइट मॉनिटरिंग (Satellite Monitoring) के माध्यम से इस बाँध स्थल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है।
भारत लगातार चीन पर इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि वह एक जिम्मेदार ऊपरी तटीय देश (Upper Riparian State) की तरह व्यवहार करे और नदी के जल स्तर तथा भूगर्भीय अध्ययनों से जुड़े आँकड़ों को भारत के साथ साझा करे, ताकि किसी भी संभावित प्राकृतिक आपदा या बाँध टूटने जैसी आपातकालीन स्थिति से समय रहते निपटा जा सके। लेकिन चीनी वैज्ञानिकों की इस नई रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि यह मुद्दा अब सिर्फ कूटनीति का नहीं, बल्कि पूरी मानवता और पर्यावरण की रक्षा का बन चुका है।


