केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 (Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लाने जा रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देना है। प्रस्तावित संशोधन के तहत राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 की धारा 3 में बदलाव किया जाएगा। अभी इस धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गान को गाने से रोकता है या उस दौरान सभा में बाधा डालता है, तो उसे सजा दी जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब इस धारा में ‘राष्ट्रीय गान’ के साथ ‘राष्ट्रीय गीत’ शब्द भी जोड़ा जाएगा।
इसका मतलब है कि संसद से यह संशोधन पारित होने के बाद अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् को गाने से रोकता है या इसे गाने वाली सभा में बाधा डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति इस कानून के तहत दोबारा दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम एक साल की जेल की सजा अनिवार्य रूप से होगी। यह विधेयक 20 जुलाई 2026 से शुरू हुए मॉनसून सत्र के दौरान राज्यसभा में पेश किए जाने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
यह संशोधन ऐसे समय लाया गया है, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए कि राज्य सरकारों के कार्यक्रमों और नागरिक सम्मान समारोहों में वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाया जाए। हालाँकि, प्रस्तावित विधेयक में दी गई सजा का प्रावधान केवल उन लोगों पर लागू होगा जो जानबूझकर वंदे मातरम् को गाने से रोकेंगे या गायन के दौरान सभा में बाधा डालेंगे। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि केवल चुप रहने या वंदे मातरम् न गाने पर किसी व्यक्ति को जेल भेजा जाएगा।
विधेयक के उद्देश्य और कारण में 24 जनवरी 1950 को हुई संविधान सभा की बैठक का भी उल्लेख किया गया है। उस बैठक में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि वंदे मातरम्, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा और उसका दर्जा भी बराबर माना जाएगा।
हालाँकि, इस घोषणा के बावजूद राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को अब तक वह कानूनी सुरक्षा नहीं मिली थी, जो राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय ध्वज, और संविधान को प्राप्त है। मौजूदा कानून की धारा 3 में केवल राष्ट्रीय गान गाने को जानबूझकर रोकने या उस दौरान सभा में बाधा डालने को ही अपराध माना गया है।
इस्लामी संगठनों और वामपंथियों ने वंदे मातरम् पर सरकार के फैसले का किया विरोध
संसद में संशोधन विधेयक पेश होने से पहले ही कई इस्लामी संगठनों, वामपंथी दलों और विपक्ष के कुछ नेताओं ने सरकार के उस फैसले का विरोध शुरू कर दिया, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में वंदे मातरम् के सभी 6 अंतरे गाने का निर्देश दिया गया है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस निर्देश को संविधान के खिलाफ, धार्मिक स्वतंत्रता के विपरीत और मुस्लिमों के लिए अस्वीकार्य बताया। बोर्ड ने कहा कि वह सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती देगा।
AIMPLB के महासचिव मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि वंदे मातरम् के बाद के अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जबकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और को भगवान को न मानने की दीन जाती है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों गुटों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया। मौलाना अरशद मदनी ने इसे पक्षपातपूर्ण बताया और कहा कि यह मुस्लिमों से मजहबी आजादी छीनने की साजिश है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार दबाव बनाकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करना चाहती है।
CPI-M ने भी इस आदेश को वापस लेने की माँग की। पार्टी का कहना था कि सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बेवजह विवाद खड़ा कर रही है। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्यसभा सांसद संतोष कुमार पी ने आरोप लगाया कि सरकार संस्कृति का इस्तेमाल ‘राजनीतिक हथियार’ के रूप में कर रही है। तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी कहा कि केंद्र सरकार वंदे मातरम् के इतिहास और इसके शब्दों को गलत तरीके से पेश कर रही है।
कॉन्ग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी मध्य प्रदेश में वंदे मातरम् के सभी अंतरे गाने के फैसले पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इसे अनिवार्य बनाने से लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
इन तर्कों के आधार पर इस बात पर बहस हो सकती है कि सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का कौन-सा रूप या कितना हिस्सा गाया जाना चाहिए। लेकिन इन तर्कों से यह साबित नहीं होता कि किसी को दूसरे लोगों को वंदे मातरम् गाने से जबरन रोकने, सभा में बाधा डालने, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने या देशभक्ति से जुड़े किसी जुलूस में हिंसा करने का अधिकार मिल जाता है।
प्रस्तावित प्रावधान किसी व्यक्ति के धार्मिक आधार पर शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से अपने आपत्ति जताने को अपराध नहीं मानता। यह केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान करता है, जो जानबूझकर दूसरों को वंदे मातरम् गाने से रोकते हैं या उनके इस अधिकार में बाधा डालते हैं।
याद कीजिए चंदन गुप्ता के साथ क्या हुआ था?
22 साल के चंदन गुप्ता की हत्या का मामला यह दिखाता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति दुश्मनी को हर बार सिर्फ मतभेद, राजनीतिक बयानबाजी या व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 26 जनवरी 2018 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के कासगंज में एक तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा में चंदन गुप्ता, उनके भाई विवेक और कई अन्य युवक शामिल हुए थे। सभी के हाथों में तिरंगा था, और वे ‘भारत माता की जय’ औरर ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे लगा रहे थे।
एफआईआर, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, जिन तक ऑपइंडिया को पहुँच मिली, सरकारी बालिका इंटर कॉलेज के पास हथियारों से लैस एक मुस्लिम भीड़ ने इस यात्रा को रोक लिया। भीड़ में शामिल लोगों ने तिरंगा छीनकर जमीन पर फेंक दिया। इसके बाद उन्होंने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ और ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। साथ ही उन्होंने यात्रा में शामिल लोगों से कहा कि आगे बढ़ना है तो पहले ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाना होगा।
लेकिन चंदन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद भीड़ ने पत्थरबाजी और फायरिंग शुरू कर दी। सलीम नाम के व्यक्ति ने चंदन को गोली मारी, जो उनके फेफड़ों और दिल में लगी। गंभीर रूप से घायल चंदन को तुरंत जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
यह हमला केवल दो समूहों के बीच रास्ते को लेकर हुए विवाद का मामला नहीं था, जैसा कि उस समय मीडिया के कुछ वर्गों ने दिखाने की कोशिश की थी। इस घटना में तिरंगा छीनकर उसका अपमान किया गया, तिरंगा यात्रा को जबरन रोक दिया गया और ‘वंदे मातरम्’ जैसे देशभक्ति के नारों के जवाब में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए। इतना ही नहीं, तिरंगा लेकर चल रहे लोगों पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ बोलने का दबाव बनाया गया। जब चंदन गुप्ता ने इसका विरोध किया, तो उन्हें गोली मार दी गई।
02 जनवरी 2025 को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने चंदन गुप्ता हत्याकांड में 28 लोगों को दोषी ठहराया। इसके अगले दिन, 3 जनवरी को अदालत ने सभी 28 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भीड़ में शामिल लोग बंदूर, लोहे की रॉड और डंडों जैसे हथियारों से लैस थे और उन्होंने तिरंगा यात्रा में शामिल हिंदू लोगों पर सांप्रदायिक हिंसा की। अदालत ने यह भी कहा कि सांप्रदायिकता ऐसी सोच है, जिसमें धर्म के हितों को समाज और राष्ट्र के हितों से ऊपर रखा जाता है।
ट्रायल के दौरान चंदन गुप्ता के परिवार को भी डराने-धमकाने की कोशिशें हुईं। चंदन के पिता सुशील गुप्ता ने अदालत को बताया कि आरोपित मुनाजिर रफी के प्रभाव के चलते कासगंज में ऐसा माहौल बन गया था कि कई वरिष्ठ वकीलों ने उनके परिवार का पक्ष रखने से इनकार कर दिया। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परिवार की आशंकाओं को सही माना और मुकदमे की सुनवाई कासगंज से बाहर ट्रांसफर करने का आदेश दिया।
मजहबी आपत्ति से लेकर कट्टरपंथी हिंसा तक
किसी गीत को अपनी व्यक्तिगत मजहबी मान्यता के चलते न गाने और उस गीत को गाने वाले लोगों पर हमला करने में बड़ा अंतर है। कोई भी नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, सरकार के दिशा-निर्देशों पर सवाल उठा सकता है, वंदे मातरम् के कुछ पदों को शामिल किए जाने का विरोध कर सकता है या फिर शांतिपूर्वक इसे गाने से इनकार कर सकता है। ऐसे सभी कदम संविधान और लोकतांत्रिक बहस के दायरे में आते हैं।
लेकिन कई मामलों में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने अपनी मजहबी आपत्ति को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे दसरों पर भी थोपने की कोशिश की। बात केवल ‘मैं यह गीत नहीं गाऊँगा’ तक नहीं रहती, बल्कि ‘तुम भी यह गीत नहीं गाओगे’ तक पहुँच जाती है। कासगंज की घटना में इसका सबसे हिंसक रूप देखने को मिला, जहाँ हथियारबंद भीड़ ने तिरंगा यात्रा को रोक दिया, तिरंगे का अपमान किया, लोगों पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने का दबाव बनाया और विरोध करने पर एक हिंदू की हत्या कर दी।
इसी वजह से चंदन गुप्ता का मामला यह समझने के लिए जरूरी माना जाता है कि ऐसे संशोधन की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है। अगर किसी राष्ट्रीय प्रतीक को केवल कागजों पर ही संवैधानिक सम्मान मिले, जबकि संगठित समूह उसे गाने से लोगों को जबरन रोक सकें, कार्यक्रमों में बाधा डाल सकें या उसमें शामिल नागरिकों को धमका सकें, तो उस सम्मान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
वंदे मातरम् के विरोध से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह है कि इस मामले में विरोध चुनिंदा तरीके से किया जाता है। जो संगठन और लोग धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर वंदे मातरम् का विरोध करते हैं, वे यह नहीं बताते कि दूसरे भारतीयों को राष्ट्रीय गीत गाने की आजादी आखिर उनकी मंजूरी पर क्यों निर्भर होनी चाहिए।
इसी तरह, वामपंथी और उदारवादी राजनीतिक दल भी यह स्पष्ट नहीं करते कि वंदे मातरम् को जानबूझकर बाधित करने या गाने से रोकने के खिलाफ कानूनी सुरक्षा देना धार्मिक विचारों को थोपना कैसे हो गया। राष्ट्रीय गान को ऐसी कानूनी सुरक्षा कई दशकों से मिली हुई है। ऐसे में संविधान सभा द्वारा समान सम्मान दिए गए राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को भी वही सुरक्षा देना न तो कोई नई बात है और न ही असामान्य। वास्तव में यह कदम भारत सरकार को कई दशक पहले ही उठा लेना चाहिए था।
धार्मिक मान्यताओं से परे: वंदे मातरम का इस्लामी विरोध किस तरह राष्ट्रीय प्रतीकों को पूरी तरह नकारने की गहरी सोच को दर्शाता है
अगर यह प्रस्तावित संशोधन कानून बन जाता है, तो भविष्य में ऐसी स्थिति नहीं आएगी कि किसी दूसरे चंदन गुप्ता की हत्या होने के बाद ही कानून उन लोगों से पैदा होने वाले खतरे को गंभीरता से समझे, जो अपनी मजहबी सोच के आधार पर दूसरों को राष्ट्रीय गीत का सम्मान करने से रोकने, उन्हें डराने-धमकाने या उन पर हमला करने का अधिकार अपने पास मानते हैं।
यह प्रस्तावित संशोधन केवल वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देने तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक बड़ा वैचारिक सवाल भी जुड़ा है। इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों का विरोध सिर्फ वंदे मातरम् के कुछ शब्दों या मजहबी आपत्तियों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे ऐसी सोच काम करती है, जिसमें पूरी दुनिया के मुस्लिमों, यानी उम्माह, को राष्ट्र-राज्य से ऊपर माना जाता है।
इस सोच के कारण भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद की अभिव्यक्तियों को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। यही वैचारिक सोच बार-बार वंदे मातरम्, तिरंगे और भारत माता की जय जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों और नारों के विरोध की मुख्य वजह बनती है, न कि केवल मजहबी आपत्ति।
पिछले कई दसकों में वंदे मातरम् को लेकर कई इस्लामी संगठनों का लगातार विरोध इसी सोच को दिखाता है। इस विरोध के पक्ष में दिए जाने वाले कई तर्क कानूनी और ऐतिहासिक रूप से मजबूत नहीं माने जाते। संविधान किसी भी नागरिक को राष्ट्रीय गीत के जरिए किसी विशेष धर्म में आस्था जताने के लिए मजबूर नहीं करता। इसी तरह, प्रस्तावित संशोधन भी किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् न गाने पर अपराधी नहीं मानता।
इसका उद्देश्य केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना है, जो जानबूझकर दूसरों को राष्ट्रीय गीत या उसका सम्मान करने से रोकते हैं। ऐसे में यह बहस अब केवल व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता की नहीं रह जाती, बल्कि इस सवाल की बन जाती है कि क्या संगठित समूह मजहबी आपत्ति का हवाला देकर दूसरे नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से देशभक्ति व्यक्त करने से रोक सकता है।
चंदन गुप्ता की हत्या इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति वैचारिक दुश्मनी केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार हिंसा का रूप भी ले सकती है। जब देशभक्ति से जुड़े जुलूसों पर हमला होता है, तिरंगे का अपमान किया जाता है, वंदे मातरम् गाने वालों को डराया-धमकाया जाता है या लोगों पर किसी दूसरे देश के समर्थन में नारे लगाने का दबाव बनाया जाता, तब मामला केवल धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं रह जाता। यह कानून-व्यवस्था और देश की एकता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। इसी संदर्भ में इस संशोधन के समर्थकों का कहना है कि वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देने का उद्देश्य किसी पर अपनी मान्यता थोपना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नागरिक राष्ट्रीय गौरव व्यक्त करने के अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते समय डर, बाधा या हिंसा का सामना न करे।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)


