वामपंथी प्रचार पोर्टल ‘द वायर’ ने दावा किया कि भारत में छात्रों का विरोध प्रदर्शन ‘लंदन तक पहुँच गया है’ और दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई की खबरों के बाद भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए लोगों की तस्वीरें साझा करते हुए कहा है कि यह स्वतःस्फूर्त था।
गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने सीजेपी समर्थकों को संसद मार्च की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद इन लोगों ने बेहद संवेदनशील इस जगह पर मार्च निकाला और संसद तक जाने की कोशिश की। कई जगहों पर प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई। इस दौरान 5 आईपीएस अधिकारी समेत कई पुलिस वाले घायल हुए। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी भी घायल हुए हैं।

‘द वायर’ ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में कहा, “युवाओं का विरोध प्रदर्शन लंदन तक पहुँचा, प्रदर्शनकारी भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए।” उसने दावा किया कि दिल्ली और दूसरे शहरों में पुलिसिया कार्रवाई की खबर मिलने के बाद ‘बड़ी संख्या में’ लोग उच्चायोग के बाहर इकट्ठा हुए।
पोर्टल ने इस जमावड़े को ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया बताया और इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की यूके शाखा ने पहले ही तय समय पर लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान कर रखा था।
एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा पहले ही कर दी थी और इसकी विस्तृत जानकारी उसके सोशल मीडिया पर शेयर किया था। संगठन ने स्थान और समय पहले ही बता दिया था, पोस्टर चिपकाए थे और अपनी माँगों की फेहरिस्त बता कर समर्थकों से इसमें भाग लेने का आह्वान किया था। एसएफआई से जुड़ी शाखा पिछले कई हफ्तों से यूके के दूसरे जगहों मसनल लीड्स और एडिनबर्ग में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।
मैनचेस्टर में हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले एक सोशल मीडिया यूजर ने बाद में पुष्टि की कि वहाँ का प्रदर्शन भी एसएफआई यूके ने ही आयोजित किया था।
द वायर ने एसएफआई के विरोध प्रदर्शन को प्रवासी भारतीयों के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। दरअसल यह लोगों को गुमराह करने का तरीका है। द वायर ने दिल्ली में सीजेपी समर्थकों के साथ हुई पुलिसिया झड़प का लंदन में भारतीय दूतावास के सामने ‘जवाब के रूप में’ प्रस्तुत किया। जबकि इस विरोध प्रदर्शन का ऐलान दिल्ली में हुए घटना से एक दिन पहले यानी 19 जुलाई को ही कर दी गई थी।

पोस्टर पर ‘लंदन के कॉकरोच एकजुट हों’ का आह्वान किया गया था और लोगों से 20 जुलाई को शाम 6 बजे लंदन के इंडिया हाउस के बाहर ‘विरोध प्रदर्शन’ करने का आग्रह किया गया था। पोस्टर में तीन बातें थी। इसमें समर्थकों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के साथ खड़े होने, सोनम वांगचुक का समर्थन करने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की गई थी।
सबसे नीचे स्पष्ट रूप से लिखा था कि लंदन में आयोजित यह सभा ‘दिल्ली में संसद तक 20 जुलाई को हुए मार्च के समर्थन में’ आयोजित की जा रही है। लेकिन जैसा कि द वायर ने बताया है उस तरह से लोग विरोध प्रदर्शन के लिए जमा नहीं हुआ थे, बल्कि पहले से विरोध प्रदर्शन के लिए बुलाए जाने पर ये जमा हुआ थे। ये स्वत: स्फूर्त तो कतई नहीं था, जैसा द वायर बताने की कोशिश कर रहा है।
एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन के बाद लिखा कि लंदन में हजारों भारतीयों ने ‘हमारे आह्वान’ का जवाब दिया। उसने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय छात्र आंदोलन के समर्थन में आयोजित किया गया था और भारत में अपने ‘साथियों’ के संघर्ष को सलाम करता है। हालाँकि एसएफआई यूके ने दावा किया कि ‘हजारों’ लोग इकट्ठा हुए थे, लेकिन उसने जो वीडियो शेयर किया, उसमें कुछ लोग एक छोटी सी जगह में ठसाठस भरे हुए दिखाई दिए।
Thousands of Indians in London answered our call for action in solidarity with the Indian student movement. The demand for a just education system echoes across borders, and we salute the fierce struggle of our comrades in India against all forms of brutality ✊ pic.twitter.com/pRWiVsLrOM
— Students' Federation of India – United Kingdom (@sfi_uk) July 20, 2026
ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग एसएफआई के सदस्य थे या नहीं यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन आह्वान, प्रचार, आयोजन स्थल, संदेश और भाषण सभी एसएफआई यूके की ओर से ही किए गए थे। द वायर ने इन सभी संदर्भों को हटाकर एसएफआई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को भारतीय प्रवासी समुदाय के ‘स्वाभाविक समर्थन’ के रूप में प्रस्तुत किया।
एसएफआई यूके कई हफ्तों से समर्थकों को जुटाने में जुटा था
जंतर-मंतर पर हुई झड़प के बाद लंदन में हुआ प्रदर्शन कोई अचानक नहीं था। एसएफआई यूके कम से कम जून की शुरुआत से ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग करते हुए अभियान चला रहा था।
संगठन ने 4 जून को SFI लीड्स समिति के विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें पोस्ट कीं, जिसमें राष्ट्रीय परीक्षाओं, जिनमें NEET, CUET, UGC NET और CBSE परीक्षाएं शामिल हैं, के कुप्रबंधन का विरोध किया गया। संगठन ने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर युवाओं के गुस्से और निराशा को दर्शाता है।

उसी दिन की एक अन्य पोस्ट में कहा गया कि एसएफआई यूके की सचिव सोमिहा समेत दूसरे सदस्यों ने धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की माँग की है। संगठन ने वादा किया कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।
एसएफआई के केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रव्यापी अल्टीमेटम जारी किया था
विदेशों में चल रही यह मुहिम भारत में एसएफआई के केंद्रीय संगठन के अभियान के साथ-साथ चल रही थी। 9 जून को एसएफआई की केंद्रीय कार्यकारी समिति ने केंद्र सरकार को दस दिन का अल्टीमेटम दिया। इसकी माँगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, एनटीए को समाप्त करना और परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण शामिल था।

इसमें सीबीएसई परीक्षाओं में ओएसएम मूल्यांकन प्रणाली को रद्द करने और नीट और सीबीएसई परीक्षा विवादों की स्वतंत्र न्यायिक जाँच कराने की भी माँग की गई थी।
संगठन ने ‘सड़कों पर मिलते है’ कहा
एसएफआई ने 14 जून को दावा किया कि 22 राज्यों में 623 केंद्रों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। संगठन के मुताबिक, 753 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 16 लोगों को जेल भेजा गया। एसएफआई यूके ने इस संदेश को दोबारा साझा करते हुए घोषणा की कि संगठन का ‘साहस’ अभी भी बना हुआ है।

ये पोस्ट लगातार चल रहे एसएफआई के संगठनात्मक अभियान का हिस्सा था। ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन उस व्यापक लामबंदी का हिस्सा था, न कि खुद ब खुद मोदी सरकार के विरोध में आए प्रवासी भारतीयों का प्रदर्शन था।

लीड्स और एडिनबर्ग समितियों ने अलग-अलग प्रदर्शनों का आयोजन किया
एसएफआई यूके की सोशल मीडिया गतिविधि से यह भी पता चलता है कि कैसे इसकी स्थानीय समितियाँ एक ही माँगों को लेकर एकजुट हुईं। 14 जुलाई को इसकी लीड्स समिति ने पार्किंसंस बिल्डिंग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। पोस्टर पर हैशटैग ‘प्रधान गोबैक’ लिखा था और घोषणा की गई थी, ‘पार्किंसंस लीड्स में तिलचट्टे जमा हो रहे हैं।’ प्रचार सामग्री में प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें, एसएफआई के प्रतीक चिन्ह और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग शामिल थी।
एसएफआई यूके ने 18 जुलाई को कहा कि उसकी एडिनबर्ग समिति ने जंतर-मंतर भूख हड़ताल और भारत में छात्र आंदोलन के समर्थन में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। संगठन ने अपने एडिनबर्ग अध्यक्ष को वक्ता के रूप में नामित किया और सभा में सामूहिक और संगठित आंदोलनों की आवश्यकता पर बल दिया।

उसी दिन लीड्स समिति ने लीड्स विश्वविद्यालय में एक और प्रदर्शन आयोजित किया। एसएफआई यूके ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जवाबदेही और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।

इसमें सचिव सोमिहा और लीड्स सचिव गायत्री ने भी अपनी बात रखी। संगठन ने कहा कि माँगें पूरी होने तक एकजुटता जारी रहेगी। ये दिल्ली में हुई घटनाओं की खबर सुनकर स्वतंत्र रूप से एकत्रित हुई भीड़ नहीं थी। ये समिति के नेतृत्व में किए गए प्रदर्शन थे जिनमें नामित पदाधिकारी, एक जैसे बैनर और बार-बार दोहराई जाने वाली राजनीतिक माँगें शामिल थीं।
मैनचेस्टर के प्रदर्शनकारी ने पुष्टि की कि एसएफआई यूके ने ही इस सभा का आयोजन किया था। कमल नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने मैनचेस्टर में हुए प्रदर्शन का फुटेज भी पोस्ट किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।

जब एक अन्य यूजर ने पूछा कि क्या बर्मिंघम में भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जा सकता है, तो कमल ने जवाब दिया कि मैनचेस्टर में आयोजित कार्यक्रम एसएफआई यूके द्वारा आयोजित किया गया था और आगे की जानकारी के लिए उनके इंस्टाग्राम अकाउंट को फॉलो करने का सुझाव दिया।
At Manchester today, Dharmendra Pradhan needs to resign. And next modi pic.twitter.com/PdXUAi3tny
— Kamal (@justthatcool10) July 20, 2026
इससे इस बात की और पुष्टि होती है कि एसएफआई अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कई ब्रिटिश शहरों में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए कर रहा था।
एसएफआई यूके दिल्ली विरोध प्रदर्शन के बाद गठित अनौपचारिक ग्रुप नहीं है
एसएफआई यूके खुद को स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की पहली अंतरराष्ट्रीय समिति बताती है। इसकी वेबसाइट का दावा है कि ब्रिटेन में इसके 600 से अधिक सदस्य और दस से अधिक उपसमितियां हैं। यह ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में सक्रिय इकाइयाँ संचालित करने का दावा करती है और कहती है कि यह नियमित रूप से अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धन जुटाने की गतिविधियाँ और छात्र कल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करती है।
इसके संविधान में कहा गया है कि एसएफआई का उद्देश्य भारत में छात्रों के साथ-साथ विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को एक मंच पर लाना है। यह एक ‘लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज’ के निर्माण को लेकर कटिबद्ध है। छात्रों को श्रमिकों, किसानों और अन्य ‘प्रगतिशील शक्तियों’ के साथ संगठित करने और विश्व भर में समाजवादी आंदोलनों के प्रति एकजुटता दिखाने का आह्वान करता है।
सीपीएम का छात्र संगठन एसएफआई है। सीपीआई(एम) के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी सहित कई वरिष्ठ नेता इसी संगठन से उभरे और पार्टी नेतृत्व में शामिल होने से पहले एसएफआई में वरिष्ठ पदों पर रहे।
इसलिए एसएफआई यूके जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उभरे छात्रों का कोई अनौपचारिक व्हाट्सएप समूह नहीं है। यह सदस्यों, समितियों, पदाधिकारियों और एक वैचारिक कार्यक्रम के साथ एक स्थापित वामपंथी राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा है।
बीबीसी और अल जजीरा ने इस आंदोलन को GEN Z के विद्रोह के रूप में पेश किया
जहाँ एक ओर ‘द वायर’ ने लंदन प्रदर्शन से एसएफआई को हटा दिया, वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने कहा कि दिल्ली में हुआ आंदोलन भारत में जेनरेशन जेड का विद्रोह है।
बीबीसी ने ‘जंतर मंतर: दिल्ली में जनरेशन Z का CJP विरोध प्रदर्शन किस बारे में है?’ शीर्षक से एक वीडियो विश्लेषण प्रसारित किया। साथ ही सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पूछा कि राजधानी में हजारों लोग विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं।
एक दूसरे रिपोर्ट में, बीबीसी ने सीजेपी को शिक्षा और रोजगार सुधारों की माँग करने वाला युवाओं के नेतृत्व वाला विरोध आंदोलन बताया। इसने इस आंदोलन को हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर ‘सबसे बड़ा असंतोष’ बताया।
अल जजीरा ने सनसनीखेज शीर्षक का इस्तेमाल किया , ‘अभी या कभी नहीं : छात्रों ने भारत की संसद की ओर मार्च करने के लिए दिल्ली के लॉकडाउन को तोड़ा’
इस रिपोर्ट में सीजेपी को मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया और दावा किया गया कि हजारों लोगों ने संगठन के आह्वान पर अपनी भागीदारी दी है। रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई पर पूरा जोर दिखा, प्रदर्शनकारियों के बयान शामिल किए गए और मोदी विरोधी खेमे के मशहूर चेहरे की टिप्पणी का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह आंदोलन शिक्षा, रोजगार, महँगाई और गरीबी को लेकर असंतोष का परिणाम है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने दमनकारी कार्रवाई की मनगढ़ंत कहानी बताई
अमेरिका की एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के दमन का आरोप लगाया । अपने बयान में उसने जंतर-मंतर के ‘तस्वीरों और रिपोर्टों’ का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस ने ‘बेवजह और अत्यधिक बल’ का प्रयोग किया। रिपोर्ट में पुलिसिया लाठीचार्ज, आँसू गैस के गोले छोड़े जाने और पत्थरबाजी से आरोपों की जाँच की माँग की।

एमनेस्टी ने सीजेपी को नेतृत्वकर्ता माना और परीक्षा में अनियमितताओं, मुआवजे और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से संबंधित माँगों को दोहराया।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी इस आंदोलन को हाल के वर्षों के सबसे बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों में से एक बताया । उसने अधिकारियों से संयम बरतने, प्रदर्शन स्थल के पास मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बहाल करने और लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने की व्यवस्था करने का आग्रह किया।

एमनेस्टी और एचआरडब्ल्यू के रिपोर्टों में ये बताने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार के खिलाफ युवा सड़कों पर हैं और उनका दमन किया जा रहा है।
भारतीय सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश
एसएफआई यूके, लेफ्ट लिबरल गैंग, अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे गैर-सरकारी संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों को जिस तरह से बताने का प्रयास किया है, उससे लगता है कि भारत सरकार छात्रों के कल्याण के खिलाफ है। इस बात को मानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि इन विरोध प्रदर्शनों को कैसे आयोजित किया गया और कैसे प्रस्तुत किया गया।

जंतर-मंतर पर मौजूद सभी छात्र दुष्प्रचार का हिस्सा नहीं थे, लेकिन गैरकानूनी प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण निर्दोष छात्रों को भी लाठीचार्ज और कानूनी मुकदमों को झेलना पड़ रहा है। अभिजीत दिपके, सौरभ दास और अन्य तथाकथित नेता या तो लाठियों और आँसू गैस से दूर खड़े थे या विरोध स्थलों पर मौजूद ही नहीं थे।
इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचारित-प्रसारित की जा रही विरोध प्रदर्शन के कहानी की गहन जाँच-पड़ताल की आवश्यकता है और उसके पीछे मंशा को सामने लाने की जरूरत है।


